नस्लवादी हमलों पर अमेरिकी दोहरापन
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अमेरिका में श्वेत वर्चस्ववादी समूहों की आतंकी गतिविधियों को लेकर अब चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही हैं। पिछले दिनों अमेरिका के शिकागो शहर की सड़क पर एक सिख ड्राइवर पर, जो अमेरिकी नागरिक भी हैं, अचानक जानलेवा हमले की खबर आई। हमले के बाद अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए सक्रिय तमाम समूहों ने इसकी निंदा की और सरकार को कड़े कदम उठाने के लिए कहा। विडंबना यह है कि जहां अमेरिकी सरकार एवं उसकी विभिन्न एजेंसियां आतंकी संगठनों को निशाने पर रखने में खरबों डालर खर्च करती हैं, वहीं घरेलू श्वेत वर्चस्ववादी समूहों को नस्लवादी विचारधारा प्रसारित करने की पूरी आजादी मिली है। अक्सर जब उनके खूनी कारनामों का खुलासा होता है, तब उन्हें ‘इक्का-दुक्का’ हमलावरों के रूप में या सिरफिरे अतिवादियों के रूप में पेश किया जाता है, जबकि हाशिये पर दिखने वाले ऐसे समूह सुसंगठित होते हैं।
सिख ड्राइवर पर हुए हमले को अब ‘नफरत भरे अपराध’ की श्रेणी में शुमार कर मामला दर्ज तो किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर वह क्या पैमाना है, जिसके तहत समुदाय को निशाना बनाकर की गई सुनियोजित हिंसा को, सुविधा के हिसाब से नफरत भरे अपराध या आतंकवाद में शुमार किया जाता है। अमेरिका के साउथ कैरोलिना में अश्वेतों के ऐतिहासिक चर्च के अंदर श्वेत वर्चस्ववादी युवक द्वारा की गई गोलीबारी के बाद भी, जिसमें नौ लोगों की मौत हुई थी, यह सवाल उठा था। डायलन रूफ नामक वह युवक अश्वेतों को देश निकाला देने की हिमायत करता था।
यह अमेरिका का दोहरापन ही है कि जब-जब ऐसे हत्यारे श्वेत समुदाय से जुड़े होते हैं, तब-तब पुलिस उसे इन्हीं धाराओं के तहत पेश करती है। इससे हत्यारों को अदालत में यह दावा करने का मौका मिल जाता है कि वे किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं, ताकि बेदाग छूट सकें या मामूली सजा पाकर रिहा हों। मगर जब ऐसा हत्यारा अश्वेत होता है या मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखता है, तो पुलिस उन्हें आतंकी कहने में संकोच नहीं करती।
उदाहरण के तौर पर हम 2013 में बोस्टन मैराथन के दौरान हुई बमबारी को याद करें, जिसमें चेचेन इस्लामिस्टों की आतंकी कार्रवाई में तीन लोग मारे गए थे, या मई, 2015 में टेक्सास में आयोजित एक इस्लाम-विरोधी सम्मेलन पर हमला करने आए आतंकियों का मामला देखें, जिसमें दोनों अतिवादियों को पुलिस ने वहीं मार गिराया था। पुलिस ने इन्हें आतंकवादी घटनाएं माना था। वहीं हम विस्कान्सिन में 2012 में एक गुरुद्वारे पर श्वेत वर्चस्ववादी वाडे माइकेल पागे द्वारा किए गए हमले को याद करें, जिसमें छह सिख मारे गए थे, तो अमेरिकी पुलिस ने उसे ‘नफरत भरे अपराध’ की श्रेणी में शुमार किया था।
श्वेत वर्चस्ववादी समूहों की गतिविधियों को लेकर जिस तरह आधिकारिक मौन बरता जाता है, वह भी देखने लायक है। अप्रैल, 2009 में एक रिपोर्ट आई कि आर्थिक मंदी और पहले अफ्रीकी-अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव से किस तरह दक्षिणपंथी अतिवादीकरण और भर्ती में तेजी आई है। उसमें यह भी संकेत दिया गया था कि इराक और अफगानिस्तान से लौट रहे फौजी भी ऐसे घृणा समूहों के चंगुल में फंस सकते हैं। हंगामा होने पर उस रिपोर्ट को वापस लिया गया। कुल मिलाकर, अमेरिका के पक्षपाती रवैये के कारण भी वहां दूसरे समुदायों के खिलाफ हिंसा बढ़ रही है।