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कम से कम 'उर्दू' को तो सांप्रदायिक चश्मे से मत देखिए

Fri, 25 Mar 2016 11:08 PM IST
राहुल सांकृत्यायन/ अमर उजाला, दिल्ली
राहुल सांकृत्यायन/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Fri, 25 Mar 2016 11:08 PM IST
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urdu language and communalization
- फोटो : Getty Images

शायर हसन काजमी का एक शेर है - 

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सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं ,
मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं।  


काजमी साहब का ये शेर मुल्क में उर्दू के हालात बयां करने के लिए नाकाफी नहीं माना जा सकता। यूं तो हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उर्दू बोलते, लिखते और सुनते जरूर होंगे लेकिन वो भाषा जो आपके बोलने और लिखने की खूबसूरती को बढ़ा देती है वो अब धीरे-धीरे हाशिए पर जाने की ओर है। यूं तो आज भी कई सत्र और जिला अदालतें उर्दू में समन जारी करती हैं। उनकी कार्यवाही में उर्दू का खासा प्रयोग होता है लेकिन सिर्फ इतने भर से तो उर्दू का भला नहीं ही होने वाला है। समय के इस चक्र में उर्दू की उत्पत्ति जानने से बेहतर है कि हम समाज में उसका मौजूदा हिस्सा और भविष्य में उसके हालात क्या होंगे इस पर चर्चा करें। जानकारों का मानना है कि उर्दू के गर्त में जाने की सबसे बड़ी वजह यह भी है कि वो सार्वजनिक अथवा उस लिपि में मौजूद नहीं है जिसमें लोग पढ़ने और लिखने में खुद को आसान महसूस करते हैं।

किसी भी भाषा का सबसे ज्यादा फैलाव उसके छपने से होता है। शायद आपको न पता हो लेकिन भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक का कार्यालय (आरएनआई) द्वारा हाल ही में जारी की गई पुस्तक प्रेस इन इंडिया 2014-15 के अनुसार पूरे देश में प्रकाशित होने वाले उर्दू दैनिक अखबारों की कुल संख्या 1,121 है जो सर्वमान्य भाषा अंग्रेजी (790) से  ज्यादा है। इतना ही नहीं आरएनआई के इस पुस्तक के अनुसार उर्दू के अखबार संख्या में भाषाई आधार पर सिर्फ हिन्दी (12,516) और अंग्रेजी (2,219) से पीछे हैं। उर्दू भाषा में प्रकाशित होने वाले कुल अखबारों की संख्या 1,661 है जो अन्य भारतीय भाषाओं के मुकाबले बहुत आगे है, लेकिन ये केवल आंकड़े हैं असल में हालात उर्दू के लिए बद से बद्तर हैं। देश की राजधानी से उर्दू के कुल 241 अखबार प्रकाशित होते हैं, तो वहीं मुल्क में आबादी के मामले में सबसे बड़े प्रदेश, उत्तर प्रदेश से कुल 786 उर्दू अखबार प्रकाशित होते हैं। यही नहीं उर्दू का दबदबा देश के चार महानगरों में भी है जहां से कुल 278 समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं। ये आकंड़े हैं।
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संविधान की आठवीं अनुसूची की कुल 22 सूचित भाषाओं में उर्दू भी शामिल है। आंध्र प्रदेश और बिहार दो ऐसे राज्य हैं जहां उर्दू को राजभाषा का दर्जा मिला हुआ है। उत्तर प्रदेश में उर्दू दूसरी सरकारी जुबां है। वहां से अच्छी संख्या में उर्दू अखबार प्रकाशित होते हैं लेकिन हाल ही में प्रदेश में आरटीआई के दस साल पूरे होने पर सरकार द्वारा गई प्रथम परिनियमावली में सूचना मांगने की भाषा हिंदी और अंग्रेजी कर दी गई है और दूसरी भाषा में उर्दू स्वीकार नहीं किया जाएगा। कहने को सरकारें उर्दू के प्रोत्साहन के लिए अपनी विज्ञापन नियमावलियों में भी इसको खासी इज्जत बख्शते हैं लेकिन ये अखबारों के मालिकानों के लिए केवल कमाई का जरिया बनती चली जा रही हैं। ये तो रही अखबारों की बात, अगर हम उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति और उनके पढ़ाने का हक देखें तो यह बात किसी से छिपी नहीं है कि उर्दू के नाम पर नियुक्त होने वाले शिक्षक उर्दू पढ़ा ही नहीं पाते। जी हां! पढ़ा ही नहीं पाते से सीधा मतलब यह कि मदरसों को छोड़ दें तो शायद ही कहीं और उर्दू पढ़ाई जाती हो। भारतीय साहित्य में प्रेमचन्द उर्दू का संस्कार लेकर हिन्दी में आए थे और हिन्दी के महान लेखक बने, लेकिन अब शायद ही कोई हिन्दी का लेखक उर्दू को समाज के सामने लाने की हिम्मत रखता हो। उसकी दो वजहें हैं पहला कि वह उर्दू जानता नहीं, दूसरा कि वो अपने संप्रदाय से ऊपर उठ कर सोच ही नहीं पा रहा। दूसरी बात आपको कड़वी जरूर लगी होगी लेकिन ये सच है। बावजूद इसके कि कुछ लोगों को सही से हिन्दी न आती हो तब भी वो चाहते हैं कि एक मुस्लिम को उर्दू जरूर आए। हालांकि हिन्दी और उर्दू दोनों किसी संप्रदाय विशेष की भाषा नहीं है लेकिन अब लोग यही सोचते हैं कि वो हिन्दू धर्म से हैं इसलिए उन्हें उर्दू सीखने या जानने की कोई जरूरत नहीं है। ये किसी भाषा को दरकिनार कर देने का कोई मानक तो नहीं है लेकिन क्या कर सकते हैं। जब हम किसी चीज को सीखने के लिए भी  धर्म और संप्रदाय  की आड़ लेने लगें तो वो चीज सीखने लायक बचती ही कहां हैं।
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ये तो आम इंसान के जीवन की कहानी है जो उर्दू को किसी संप्रदाय और धर्म विशेष से जोड़कर देखता है लेकिन सरकारें तो सबकी होती हैं न? और जब वही उर्दू के साथ सौतेला व्यवहार करे तो? बीते साल नवंबर में  केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद द्वारा किए गए 18वें राष्ट्रीय उर्दू पुस्तक मेले के आयोजन में स्टाल खाली दिखे। नौ दिवसीय इस कार्यक्रम में लोग आए ही नहीं या उर्दू उन्हें आकर्षित नहीं कर पाई ये शोध का विषय बन सकता है। खैर लोगों की संख्या कम ज्यादा हो सकती है लेकिन क्या किसी ऐसे राज्य का स्टॉल खाली हो सकता था जहां उर्दू को दूसरी सरकारी जुबां माना जाता है? इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के स्टॉल में किताबें थी ही नहीं। मेले में आने वाले प्रकाशक इंतजामों पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि आस पास के लोगों को ही इस आयोजन के बारे में पता नहीं था। ये तो बीते साल के कार्यक्रम की बात है। इस साल जनवरी में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में पूरे देश के 14 उर्दू अकादमियों में से केवल 2, क्रमशः दिल्ली और पश्चिम बंगाल की अकादमियों ने हिस्सा लिया। यूं तो उर्दू अकादमियां सरकारों के लिए उनका सियासी तीर साधने के लिए अच्छा रास्ता होती हैं लेकिन वो इस रास्ते को भी सही नहीं करना चाहते। विश्व पुस्तक मेले में भी उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों राज्य गायब रहे जहां की वो सरकारी जुबां है।

कुल मिलाकर यह देखा जा सकता है कि जिस उर्दू के नाम पर राजनीतिक दल सियासी चाल चलते हैं उन्हें उसका तनिक भी भान नहीं है। हाल ही में एक खबर आई थी। मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से यह कहा गया था कि उर्दू लेखकों को यह बात लगभग साबित करनी होगी कि उनकी किताब सरकार और राष्ट्र के खिलाफ नहीं है। सवाल ये है कि यह शक केवल उर्दू के ही लेखकों पर क्यों? क्या और भाषाओं में लेखक नहीं है या फिर जिस उर्दू जुबां में सेना और कई बार नेता भी सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां गाते हैं, उसकी धुन पर बीटिंग रिट्रीट में पूरा राजपथ झूमता है , वही आपकी निगाह में राजद्रोही क्यों हो रहा है। ऐसी खबरें केवल उर्दू ही नहीं बल्कि आने वाले समय में अन्य भाषाओं के लेखकों के लिए भी खतरा है। बड़े मजे की बात यह भी है कि ये आदेश उसी परिषद ने जारी किया है जिस पर उर्दू के प्रसार प्रचार का जिम्मा हैं। परिषद, मानव संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत काम करता है।


कोई लेखक यह क्यों चाहेगा कि उसके लिखे पर राष्ट्र में किसी भी तरह का तनाव पैदा हो और अगर हो भी तो आखिर सारा इल्जाम सिर्फ उर्दू पर ही क्यों? भले ही सरकार कथित तौर पर राष्ट्रवादी हो। देववाणी संस्कृत की समर्थक हो लेकिन किसी अन्य भाषा को इस तरह द्रोह के निगाह से देखना मेरी नजर में सिर्फ निजी दुश्मनी निकालना और कुंठित मानसिकता का प्रतीक है। हालांकि ऐसा तो नहीं लगता कि किसी की उर्दू से कोई निजी दुश्मनी होगी लेकिन इस तरह के फरमान जारी होने से आप एक भाषा, उसको पढ़ने और लिखने वालों पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं। बेहतर हो कि हमारा रुख उर्दू के लिए सिर्फ किसी सांप्रदायिक भाषा तक सीमित न हो। भाषाओं के खिलाफ और समर्थन में सरकारों के फरमान आते जाते हैं फिर भी इन्हें ध्यान में लाया जाना आवश्यक है। उर्दू सीखिए, सीख न पाइए तो कम से कम उसे बुरा भला मत कहिए। न उसके बारे में किसी सीमा के भीतर सोचिए।

आखिर में मुनव्वर राणा की गजल का एक शेर है

'लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में गजल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है।'

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