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परवरिश : वंचित बच्चों के लिए अनोखा स्कूल, पति की प्रेरणा पाकर 'आशाओं' को दिए पंख 

Sat, 30 Apr 2022 06:19 AM IST
Ruby Sarkar रूबी सरकार
Updated Sat, 30 Apr 2022 06:19 AM IST
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सार
इसी स्कूल से सात साल तक पढ़कर रोहित टीसीएस कंपनी में डाटा एंट्री की नौकरी पा चुके हैं और सीता यादव बुटीक चलाती हैं। इसी तरह एक लड़की विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई कर चुकी है। कई बच्चे उच्च शिक्षा में दाखिला ले चुके हैं। रोहित के पिता किसी संस्थान में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं, जबकि मां घर-घर बर्तन आदि का काम करती हैं।
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Upbringing: Unique school for underprivileged children, inspired by husband, gave wings to Hopes
स्कूल - फोटो : self

विस्तार

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की रहने वाली शिबानी घोष एक ऐसी महिला हैं, जिन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद न सिर्फ अपने परिवार के लिए, बल्कि वंचित समुदाय के बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। उनके इस संकल्प को पूरा करने में उनके पति प्रदीप घोष ने भी साथ दिया। दरअसल बीएड की पढ़ाई खत्म होते ही पति ने उनसे कहा, क्या आप सिर्फ अपने परिवार के लिए नौकरी करेंगी या फिर जीवन में कुछ ऐसा करना चाहेंगी, जिससे समाज व देश का भला हो? यहीं से 'म्यूजियम स्कूल परवरिश' की परिकल्पना मूर्त रूप लेने लगी। 



हालांकि यह काम इतना आसान नहीं था, इसमें काफी चुनौतियां रहीं। इन बच्चों को उनके काम से अलग करना, परिजनों की सहमति लेकर उन्हें शिक्षित करना-इसके लिए शिबानी को सबसे पहले तो मलिन बस्तियों में उन बच्चों को चिह्नित करना पड़ा, जिनकी पढ़ाई किसी न किसी वजह से छूट चुकी थी। चाहे वह आर्थिक कारणों से हो या पढ़ाई में रुचि न होने के कारण हो या फिर छोटी उम्र में काम पर लग जाने के चलते स्कूल से ड्रॉप आउट हो जाना या कोई और कारण। इन बच्चों में दोबारा पढ़ाई के प्रति रुचि पैदा करना मुश्किलों से भरा काम था। 


ऐसे बच्चे चिह्नित हो जाने के बाद शिबानी ने उसकी एक लिस्ट तैयार की। पहले दस बच्चे, उसके बाद बीस, फिर पचास और अब तो सौ से अधिक बच्चे हो गए हैं। शिबानी ने पहले अपनी जमा पूंजी से किराए पर बस लेकर घर-घर जाकर उन बच्चों को संग्रहालयों में लाना शुरू किया तथा उन्हें बिना किसी किताब-कॉपी के प्रकृति के खुले माहौल में मध्य प्रदेश बोर्ड स्तर की पढ़ाई के लिए तैयार करने लगीं। वह कहती हैं कि शिक्षा का अधिकार यानी राइट टू एजुकेशन पर बातें, तो समाज में खूब होती हैं, परंतु इन बच्चों के लिए इस तरह के अधिकार का कोई मतलब नहीं है। 

बहरहाल, इन बच्चों की बेहतरी के लिए उन्होंने नेशनल म्यूजियम ऑफ मैनकाइंड, द रीजनल साइंस सेंटर और द रीजनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के साथ मिलकर परवरिश म्यूजियम स्कूल शुरू किया, जहां एक भी क्लासरूम नहीं है और न ही शिबानी चाहती थीं, कि बच्चे चारदीवारी में बंद हो जाएं। हर दोपहर, एक बस में शहर भर की झुग्गियों से बच्चों को समेटकर भोपाल के किसी एक संग्रहालय में जाना शुरू हुआ, जहां दो घंटे तक उन्हें पढ़ाया जाता है। इन बच्चों के शिक्षक भी इन्हीं झुग्गी के लड़कियां व लड़के होते हैं, जो इन्हें बुनियादी शिक्षा देते हैं। 

शिबानी ने इन बच्चों को चार श्रेणियों में बांटा है। पहला नन्हा, दूसरा बचपन, तीसरा खिले और चौथा यौवन। श्रेणियों को उम्र के हिसाब से बांटा गया है। नन्हा में पांच से सात वर्ष के बच्चे, बचपन में आठ से दस साल के बच्चे, खिले में ग्यारह से तेरह व यौवन में चौदह से अठारह वर्ष के किशोर-किशोरियों को जोड़ा गया है। इस तरह संग्रहालय में प्रदर्शनी के माध्यम बच्चे पढ़ाई करते हैं और राज्य की वनस्पतियों और जीवों के बारे में सीखते हैं। क्षेत्रीय विज्ञान केंद्र में लाइव प्रयोग भी बच्चों को दिखाया जाता है। 

इस तरह बच्चे इस स्कूल में प्रवेश कर या तो एमपी बोर्ड के पाठ्यक्रम या फिर व्यावसायिक प्रशिक्षण के बाद स्व-रोजगार के लिए तैयार हो जाते हैं। इसी स्कूल से सात साल तक पढ़कर रोहित टीसीएस कंपनी में डाटा एंट्री की नौकरी पा चुके हैं और सीता यादव बुटीक चलाती हैं। इसी तरह एक लड़की विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई कर चुकी है। कई बच्चे उच्च शिक्षा में दाखिला ले चुके हैं। रोहित के पिता किसी संस्थान में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं, जबकि मां घर-घर बर्तन आदि का काम करती हैं। स्कूल के हर बच्चे की लगभग यही कहानी है, लेकिन उनकी प्रतिभा में कोई कमी नहीं है। 

केवल उन्हें अवसर मिलना चाहिए। शिबानी ने बताया कि जब 2016 में म्यूजियम स्कूल परवरिश को यूनेस्को अवार्ड मिला, तब उसकी सारी प्राइज मनी उन्होंने स्कूल में लगा दी। उसके बाद से पीपुल्स फंडिंग पर सारा काम चल रहा है, जिसमें शिक्षकों का मानदेय, बच्चों का पोषण, कॉपी, बस का खर्चा इत्यादि शामिल है। म्यूजियम स्कूल परवरिश में सबसे प्रभावित करने वाली बात बच्चों की जिजीविषा है, जो पढ़-लिखकर कुछ अलग करना चाहते हैं। (चरखा फीचर)

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