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कमजोर सरकार, किस्मत कमाल
मार्क टुली (वरिष्ठ पत्रकार)
Updated Wed, 22 May 2013 02:22 AM IST
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यूपीए सरकार को चार बरस हो गए हैं, लेकिन इस सरकार का दुर्भाग्य यह है कि इसके बारे में आम राय ही यह बन चुकी है कि यह एक कमजोर सरकार है।
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आम जनता तो यह भी मानने लगी है कि यह सरकार नीतियों को पूरा नहीं कर सकती। यह सरकार की कमियों की वजह से ही हुआ है। इसके बाद अगर दूसरी बड़ी कमी देखें, तो सरकार आर्थिक मोर्चे पर असफल रही है।
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खासकर तब, जब विश्व के जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह खुद प्रधानमंत्री हैं। जब वह प्रधानमंत्री बने थे, तो जनता ने यही सोचा था कि अब भारत आर्थिक ताकत बन जाएगा, लेकिन हुआ उल्टा।
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आर्थिक शक्ति तो दूर, भारत सरकार अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण ही नहीं रख पाई। महंगाई दर बढ़ती रही, जीडीपी की रफ्तार धीमी की धीमी ही रही। कृषि उत्पादन बढ़ा नहीं और उद्योगों में भी कोई खास तरक्की नहीं दिखी।
इन सब कारणों ने लोगों के बीच सरकार की छवि को खराब किया। फिर एक के बाद एक घोटालों से भी सरकार को काफी बदनामी झेलनी पड़ी है।
एक साल बचा है और प्रदेशों के चुनाव परिणाम को देखकर कह सकते हैं कि सरकार चुनाव में कमजोर नहीं पड़ेगी। इसके लिए सरकार के सहयोगी दलों का समर्थन काफी अहम होगा।
इसके अलावा गरीबी दर भी दो फीसदी कम होना सरकार के लिए राहत भरी खबर हो सकती है, पर इस तरह के आंकड़ों से सरकार को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। भारत में आज सबसे बड़ी कमजोरी है, यहां की कार्यप्रणाली का कमजोर होना।
मनमोहन सिंह ने पहले ही कहा था कि अगर सिस्टम कमजोर होगा, तो तरक्की नहीं होगी, लेकिन खुद उन्होंने इस दिशा में कुछ खास नहीं किया। अब सरकार के पास एक साल हैं। इसमें अगर वह फूड एक्ट जैसे बिल पास कर देती है और डायरेक्ट कैश स्कीम को बढ़ावा देती है, तो जनता का कुछ भला हो सकता है।
इस सरकार की एक बड़ी कमजोरी यह भी है कि यह अब तक अपने पीएम पद के उम्मीदवार को सामने नहीं ला पाई। अगर जल्दी ही यूपीए ने अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की, तो इसका खामियाजा अगले लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ जाएगा।