कुछ तो सीखते हमारे जनप्रतिनिधि
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बीते सप्ताह उत्तर प्रदेश के कुछ मंत्री-विधायकों ने जो फैसला लिया, उसकी तारीफ नहीं की जा सकती। करीब तीन सप्ताह के विदेशी स्टडी टूर पर वे निकल गए ऐसी शान से, जैसे कोई अति संपन्न, अति समृद्ध, अति खुशहाल राज्य के राजनेता हों। वे गए इस बहाने कि संसदीय परंपराओं का उन्हें ज्ञान हासिल करना था इस स्टडी टूर पर, लेकिन यह भूल गए कि आज इन परंपराओं के बारे में स्कूल के बच्चे ज्ञान हासिल कर सकते हैं गूगल के जरिये। उत्तर प्रदेश के इन मंत्री-विधायकों ने ऐसा किया होता, तो शायद जाने से पहले ही मालूम पड़ गया होता कि संयुक्त अरब अमीरात में संसदीय परंपराएं नाम के वास्ते भी नहीं हैं। यह भी शायद मालूम पड़ गया होता कि यूनान और तुर्की में लोकतांत्रिक परंपराएं हाल में स्थापित हुई हैं, यानी अगर अपने यहां ही दूसरे राज्यों का अगर दौरा करते, तो लोकतांत्रिक परंपराओं का ज्यादा ज्ञान मिलता।
इत्तफाक से उत्तर प्रदेश के मंत्री-विधायकों का यह दल जब रवाना हुआ, ठीक उसी समय सैफई महोत्सव चल रहा था। वहां बॉलीवुड के सितारे नाचने-गाने आए थे। मुफ्त में तो आते नहीं हैं ये सितारे, सो इस उत्सव पर भारी खर्च तो हुआ ही होगा। इस खर्च को अगर आप जोड़ें मंत्रियों-विधायकों के स्टडी टूर के खर्च के साथ, तो इतने पैसे बन जाते हैं, जिनसे आसानी से खरीदे जा सकते थे दंगा पीड़ितों के लिए ऐसे तंबू, जो सर्दियों में काम आते हैं। ऐसा पहले अगर किया गया होता, तो राहत शिविरों में ठंड से बच्चे नहीं मरते।
रही बात लोकतांत्रिक परंपराओं के बारे में सीखने की, तो भारतीय लोकतंत्र की स्टडी करते अगर ये मंत्री-विधायक, तो देखते कि बड़ा अजीब पौधा है यह। एक तरफ तो इस पौधे की जड़ बहुत मजबूत है, और दूसरी तरफ संस्थाएं इतनी कमजोर, कि जनता का वोट हासिल करने के बाद इस देश के जनप्रतिनिधि अपने आपको राजा-महाराजा समझने लग जाते हैं। हमारे पैसों से मिलते हैं उनको सरकारी मकान, हमारे पैसों से मिलती है उनको सरकारी गाड़ी और हमारे पैसों से उनको मिलती है सस्ती गैस, सस्ती बिजली और सस्ती रेल और विमान सेवाएं।
इन सुविधाओं को त्यागना वे लोग भी नहीं चाहते, जो अपने आपको आम आदमी कहलाना पसंद करते हैं। अरविंद केजरीवाल जब बने थे दिल्ली के मुख्यमंत्री, मुझे बेहद खुशी हुई। तब भी खुशी हुई, जब उन्होंने यह कहा कि वह सरकारी मकान नहीं लेंगे और न ही सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल करेंगे। एक हफ्ते में पता लग गया कि सिर्फ नाटक था उनका मेट्रो से जाना शपथ ग्रहण करने। सिर्फ नाटक था उनका आम आदमीपन, क्योंकि अगले दिन ही बातें शुरू हो गई थीं कि उनके मकान की, और अगले दिन ही मिल गई थी उनके मंत्रियों को सरकारी गाड़ियां। मुख्यमंत्री के आलीशान सरकारी मकान पर जब लोगों ने ऐतराज किया, तो केजरीवाल साहिब ने ऐलान कर दिया कि वह उस मकान में नहीं रहेंगे और उसके बदले में ढूंढ रहे हैं एक और छोटा मकान। वाह, क्या बात है! कितनी सादगी, कितना त्याग!
क्या केजरीवाल जानते नहीं हैं कि छोटा सरकारी मकान भी दिल्ली में बना है ऐसी जमीन पर, जिसके न्यूनतम दाम हैं सौ करोड़ प्रति एकड़? क्या जानते नहीं हैं ये जनता के सेवक कि अगर दिल्ली सरकार अपनी शहरी जमीनों का व्यावसायिक इस्तेमाल करती है, तो इतने पैसे बन जाएंगे कि न सिर्फ हर बेघर के लिए होगा रैन बसेरा, बल्कि कमजोर वर्गों के लिए बन जाएंगे पर्याप्त मकान।
यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि अन्य लोकतांत्रिक देशों में जनप्रतिनिधियों को नहीं मिलते हैं सरकारी मकान। न ही मिलती हैं उनको वे सुविधाएं, जो हम इतने प्यार से उपलब्ध करते हैं अपने सांसदों-विधायकों को। इसी को अगर सीखकर वापस लौटते हैं उत्तर प्रदेश के मंत्री-विधायक अपने स्टडी टूर से, तो उनके जाने का फायदा होगा। लेकिन इसे वे क्यों सीखकर आएंगे, जब जानते हैं अच्छी तरह कि वे राजनीति में आए हैं राजा-महाराजा की तरह रहने के लिए? यही तो मुख्य कारण है उनका अपने वारिसों को राजनीति में लाने का। यही तो मुख्य कारण है चुनाव क्षेत्रों को विरासत में दिए जाने का। बोलो, मेरा भारत महान!