राजनीति के ढलते-उगते सूरज
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बीते साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारी सफलता पाने के बाद मुलायम सिंह का अनुमान था कि लोकसभा चुनाव समय से पहले होंगे। उस अनुमान में उनकी राजनीति भी छिपी थी। उन्हें लगता था कि आने वाला वक्त लोकसभा में उनकी पार्टी को स्थापित करेगा। इसी उम्मीद में उन्होंने खुद को केंद्रीय राजनीति से जोड़ा। ऐसा अनुमान ममता बनर्जी और जयललिता का भी था। छह महीने पहले तक लगता था कि केंद्र सरकार विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव भी कराएगी। ऐसा नहीं हुआ, तो सरकार के लिए दिक्कत पैदा होगी। दीवार पर लिखा था कि उत्तर भारत की विधान सभाएं कांग्रेस के लिए अच्छा संदेश लेकर नहीं आने वालीं। झटका लगा, तो फिर ‘रिपल इफैक्ट’ रुकेगा नहीं। शायद कांग्रेस अपने ‘गेम चेंजर’ का असर देखने के लिए कुछ समय चाहती थी।
राजनीतिक अनुमान सट्टे की तरह होते हैं। लग गए तो पौ बारह। वर्ष 2007 में मुलायम सिंह को नहीं लगता था कि उनकी भारी हार होने वाली है। इसी तरह 2012 में मायावती को इसका अंदेशा नहीं था। उन्होंने उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े करने वाले प्रस्ताव पर दांव खेल दिया था, जबकि वह कोई मसला ही नहीं था। वर्ष 1977 में इंदिरा गांधी ने इमर्जेंसी खुद हटाई और खुद चुनाव कराए। इस उम्मीद के साथ कि इस सदाशयता को जनता पसंद करेगी। वर्ष 2004 में भाजपा के नेतृत्व ने शानदार सफलता की उम्मीद में वक्त से छह महीने पहले चुनाव करा लिए। बहरहाल अब चार राज्यों के विधान सभा चुनावों ने जो सूरते हाल पैदा किया है, वह यह कि दिल्ली की कांग्रेस सरकार अब ‘लेम-डक’ है। निवर्तमान चौकीदार, जिसे नए आने वाले का इंतजार है।
अन्ना हजारे का अनशन शुरू होने के बाद से जन लोकपाल कानून अचानक महत्वपूर्ण विषय बनकर सामने आया है। इसके अलावा ऑगस्टा-वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर डील के बारे में ताजा जानकारियां सरकार को परेशान करने वाली हैं। विधानसभा चुनाव के सदमे में डूबती-उतराती कांग्रेस अचानक एक नए भंवर में फंस गई है। पिछले तीन-चार साल के अप्रिय प्रसंगों की फिल्म अचानक संसद के इस सत्र में चलने का अंदेशा पैदा हो गया है। तेलंगाना को लेकर अपनी ही पार्टी के सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव पेश करके सरकार को परेशान कर दिया है। भाजपा चाहती थी कि 2-जी घोटाले की जेपीसी रिपोर्ट पर लोकसभा में बहस हो। अध्यक्ष मीरा कुमार ने इस मुद्दे पर किसी भी तरह की बहस की अनुमति नहीं दी। इस बात का विरोध केवल भाजपा ने नहीं किया, बल्कि द्रमुक, कम्युनिस्ट, तृणमूल, बीजद और अकाली दल भी नाराज हैं। इस वक्त सभी बहती गंगा में हाथ धोना चाहेंगे।
अपने काम-काज के अंतिम छोर पर आ चुकी कांग्रेस सरकार को दूर से आते तूफान की आवाज सुनाई पड़ रही होगी। उसका रथ अलोकप्रियता की गहरी ढलान में उतर गया है। अब उसे लगता है कि लुढ़कते पत्थरों की गति बढ़े, इसके पहले ही चुनाव करा लेने चाहिए। यूपीए की सारी योजनाएं अस्त-व्यस्त हैं। डैमेज कम करने के रास्ते खोजे जा रहे हैं। एक विचार है कि जनवरी में अगले वित्तीय वर्ष के लिए अनुदान मांगों को पास कराकर मार्च-अप्रैल में चुनाव करा लिए जाएं। चलते-चलाते सरकार राजनीतिक और आर्थिक सुधार के विधेयकों को भी पास कराना चाहेगी। इनमें लोकपाल और सिटिजन चार्टर बिल शामिल हैं। राजनीतिक नजरिये से अनुसूचित जाति-जनजाति के सरकारी कर्मचारियों की प्रोन्नति से जुड़ा बिल महत्वपूर्ण है और आर्थिक दृष्टि से डायरेक्ट टैक्स कोड विधेयक। परमाणु सुरक्षा विनियमन और भारत-बांग्लादेश सीमा समझौते से जुड़ा विधेयक भी पास होना चाहिए। इस वक्त महत्वपूर्ण संसदीय कार्यों के लिए सरकार को भाजपा के सहयोग की जरूरत है, जो बदले में संसद का समय चाहेगी, ताकि वह सरकार की धुलाई कर सके।
वर्ष 1991 में बनी कांग्रेस की पीवी नरसिंह राव सरकार 1996 तक अल्पमत में रही। उसने सबसे मुश्किल दौर में काम किया। आर्थिक उदारीकरण का सबसे अलोकप्रिय काम उस दौर में हुआ। बाबरी मस्जिद मसले का सामना, दूरसंचार क्रांति का सूत्रपात, विश्व व्यापार संगठन में भागीदारी, शीत-युद्धोत्तर विश्व राजनीति में नई भूमिका, अमेरिका से रिश्तों में बदलाव वगैरह। उस चुनाव में कांग्रेस को लोकसभा में 232 सीटें मिलीं थीं। राजीव-हत्या के बाद पैदा हुई हमदर्दी के बावजूद। वर्ष 2009 के चुनाव ने 206 सीटें देकर पार्टी में जान डाल दी। उत्तर प्रदेश में उसका पुनर्जीवन हो रहा था। पर कांग्रेस सरकार का यह दौर सबसे निराशाजनक साबित हुआ। सफलता की बेस लाइन ऊंची हो, तो उसका नीचे जाना विफलता मानी जाती है। पर अंदेशा है कि कांग्रेस की सीटें आधी हो जाएंगी। यह सामान्य विफलता नहीं होगी।
चुनाव के नजरिये से देखें, तो कांग्रेस न्यूनतम स्तर को छूने वाली है। कर्नाटक के अलावा कोई राज्य नहीं, जहां सुधार की गुंजाइश हो। उसके अपने राज्यों आंध्र प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तराखंड और हिमाचल से भी अच्छी खबर नहीं है। सूरज अस्ताचल में जा रहा है। अगले तीन-चार महीने ‘नई राजनीति’ के नाम हैं। इसका मतलब अनिवार्य रूप से ‘आप’ नहीं है, बल्कि वह संभावना है जो ‘आप’ के नाम से दिल्ली में दिखाई दी। ‘नई गटर राजनीति’ के लिए भी तैयार रहें। कोई सूरज डूबता है, तो कोई उगता भी है।