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राजा भगीरथ की अनूठी भक्ति

Thu, 14 Nov 2013 07:48 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Thu, 14 Nov 2013 07:48 PM IST
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Unic devotion of king Bhagirath

राजा भगीरथ सांसारिक सुखों एवं राजकीय ऐश्वर्य से ऊब गए थे। वह अपने गुरुदेव महात्मा त्रितल की शरण में पहुंचे और उन्हें अपने हृदय की वेदना बताई। महात्मा त्रितल ने कहा, राजन, किसी भी प्रकार के सांसारिक आकर्षण, लालसा या अहंकार से मुक्त होने के बाद ही इस वेदना से मुक्ति मिल सकेगी।

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राजा भगीरथ ने अपनी सभी संपत्ति लुटा दी और अपना राज्य शत्रु के हवाले कर वन में जाकर तपस्या करने लगे। कुछ दिनों बाद वह भिक्षा लेने राजधानी पहुंचे। कभी उनके शत्रु रहे राजा और मंत्री तुरंत उनके सामने पहुंचे। राजा ने अत्यंत आदर से भिक्षा दी और उनकी विरक्ति से अभिभूत होकर प्रार्थना की, आप अपना राज्य वापस ले लें।
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तपस्वी भगीरथ ने कहा, मैं भगवान की कृपा से आनंद में सराबोर होकर पूर्ण संतुष्ट हूं।

भगीरथ एक बार दूसरे राज्य पहुंचे। अचानक उस राज्य के संतानहीन राजा की मृत्यु हो गई। प्रजा राजा के न रहने से कष्ट में जीवन बिताने लगी। एक दिन भगवान ने स्वप्न में भगीरथ से कहा, भगीरथ तुम विरक्ति की चरम स्थिति में पहुंच चुके हो। इस समय प्रजा का कल्याण करना ही तुम्हारा धर्म है।
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मंत्रियों के अनुरोध पर वह पुनः राजा बने, लेकिन कुछ ही वर्ष बाद उन्होंने राज्य त्याग दिया। घोर तपस्या कर पृथ्वी का उद्धार करने के उद्देश्य से उन्होंने गंगा को धरती पर प्रवाहित कराया और अमर हो गए।

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