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आंबेडकर को हमने कितना समझा है: अब दूसरों को दोष देने की आदत बढ़ी, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की आदत चरम पर

Sun, 26 Jan 2025 07:16 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 26 Jan 2025 07:16 AM IST
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सार
संविधान को अपनाए जाने की 75वीं वर्षगांठ पर भी अपनी समस्याओं के लिए दूसरों को दोष देने की आदत आंबेडकर के समय की तुलना में कहीं अधिक प्रचलित है। वर्तमान शासन में जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने की आदत चरम पर है।
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understanding Ambedkar Now habit of blaming others has increased shirking responsibility is at its peak
भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

हम भारतीय संविधान लागू होने की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। यह वर्षगांठ सत्ता में बैठे राजनेताओं के लिए एक शानदार शो और आत्मसम्मान दिखाने का अवसर हो सकता है। मैं संविधान को अपनाए जाने के कुछ समय अध्यक्ष डॉ. बीआर आंबेडकर की कुछ चेतावनियों को याद कर इस माहौल को देखना चाहता हूं।



संविधान के सिद्धांतों और उपदेशों को लेकर हुई बहस में डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में कई महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किए। उन्होंने दो महत्वपूर्ण भाषण भी दिए थे- पहला, 4 नवंबर, 1948 को संविधान का मसौदा पेश करते हुए और दूसरा संविधान का अंतिम प्रारूप पेश होते समय। आंबेडकर ने लोगों से कहा  था कि वे लोकतंत्र को लेकर जॉन स्टुअर्ट मिल की अपील- "अपनी स्वतंत्रता को किसी ऐसे महान व्यक्ति के चरणों में न तो सौंपें और न ही उसकी शक्तियों का भरोसा करें, जो उनकी संस्थाओं को नष्ट करने का कारण बने।" का पालन करें। 


आंबेडकर आगे कहते हैं, "दुनिया के किसी भी देश की तुलना में भारत में ये सावधानियां अधिक जरूरी हैं। जिसे भक्ति या नायक-पूजा का मार्ग कहा जा सकता है, उसकी भूमिका दुनिया के किसी देश की राजनीति में निभाई जाने वाली भूमिका से बड़ी है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि "धर्म में भक्ति का मार्ग आत्मा को मोक्ष तक पहुंचा सकता है, लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक पूजन की मानसिकता या तो उसे पतन के रास्ते पर ले जाती है या फिर तानाशाह बना देती है।"

1970 के दशक में इंदिरा गांधी और आज नरेन्द्र मोदी के काम करने के तरीके को देखा जाए तो लगता है कि आंबेडकर की टिप्पणी दूरदर्शितापूर्ण थी। इस तरह के व्यक्तित्व ने भारतीय लोकतंत्र को नीचे गिराया है, भले ही उनका तरीका अलग हो। आंबेडकर खुद राजनीति के अलावा अन्य क्षेत्रों में इस तरह की नायक पूजन वाली प्रवृत्ति से आश्चर्यचकित नहीं हुए होंगे। सफल क्रिकेटरों, फिल्मी सितारों और व्यापारियों को भी भगवान जैसा दर्जा दिया जाता रहा है, लेकिन आज अपने ही अनुयायियों द्वारा इस तरह के महिमामंडन से आंबेडकर भी बहुत शर्मिंदा महसूस होंगे।

उनके अंतिम भाषण में दी गई दूसरी चेतावनी भी आज बेहद प्रासंगिक है। उनका अनुरोध था, "हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना चाहिए। 26 जनवरी, 1950 को हम विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हम बराबरी की बातें करेंगे, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमान रहेंगे। राजनीति में तो हम एक व्यक्ति एक वोट, एक मूल्य के सिद्धांत को मान्यता देंगे, जबकि सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को लगातार नकारते रहेंगे। कब तक हम विरोधाभासी जिंदगी जीते रहेंगे? कब तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे?"

आंबेडकर जानते थे कि जातीय असमानता के कराण भारतीय समाज कितना बिखरा हुआ है। वह अपने समय के पुरुष राजनेताओं से लैंगिक असमानता के प्रति भी अधिक सचेत थे। सभी वयस्कों, दलितों और महिलाओं को मताधिकार प्रदान कर संविधान ने एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को कायम रखा, लेकिन 75 साल बाद भी एक व्यक्ति एक मूल्य का सिद्धांत वास्तविकता से कोसों दूर है। हर दिन दलितों के साथ भेदभाव होता है। परिवार और समुदाय में महिलाओं को पुरुषों से नीचा माना जाता है। व्यापार और पेशे में उच्च जाति के पुरुषों का दबदबा है। दलितों और महिलाओं को अक्सर उन्नति के अवसरों से वंचित रखा जाता है।

राजनीति में समानता और सामाजिक-आर्थिक जीवन में असमानता के अंतर को रेखांकित करते समय आंबेडकर के दिमाग में प्रमुख रूप से दलितों और महिलाओं के अधिकार थे। हालांकि आदिवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर आंबेडकर ने भी बहुत कम ध्यान दिया। जैसा कि वर्जिनियस जाक्सा, नंदिनी सुंदर और फेलिक्स पेडल जैसे मानव विज्ञानियों के काम से पता चलता है। मध्य भारत में रहने वाले आदिवासी समुदायों को इन 75 सालों के ‘संवैधानिक’ लोकतंत्र से सबसे कम लाभ मिला है। उनकी जमीनें, जंगल, घर, मंदिर औद्योगिक और खनन कंपनियों के साथ काम करने वाले राजनेताओं की चपेट में आए हैं। आदिवासियों ने जिस बेदखली और भेदभाव का अनुभव किया है, वह सही मायनों में दलितों से भी अधिक है, हालांकि इस पर उतना ध्यान नहीं दिया गया है।

धार्मिक अल्पसंख्यक खासकर भारतीय मुसलमान आजादी के समय किए गए वादों की वजह से ठगा महसूस करते हैं। पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद लाखों मुसलमान तत्कालीन सरकार द्वारा नागरिकता के पूर्ण अधिकार के आश्वासन पर भरोसा करते हुए भारत में ही रह गए, लेकिन पिछले कुछ दशकों में खासकर मई 2014 के बाद से इन अधिकारों को लगातार कम किया गया है।

संविधान सभा में आंबेडकर के आखिरी भाषण में नायक पूजन और सामाजिक असमानता के बारे में जो चेतावनियां थीं, उनके परिप्रेक्ष्य में आज एक भारतीय खुद को कहां पाता है? विशेष रूप से उस चीज को विकसित करने की आवश्यकता के बारे में सोचता हूं, जिसे उन्होंने ‘संवैधानिक नैतिकता’ कहा था। हाल के दशकों की भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच पक्षपातपूर्ण स्थिति पैदा हुई है। उसमें दोनों एक-दूसरे के इरादों के प्रति समान रूप से अविश्वास रखते हैं। यह इस बात को दर्शाता है कि आज भारत उस लोकतांत्रिक आदर्श से कितना दूर है। आंबेडकर ने नवंबर 1948 के भाषण में कहा था, "संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है। इसकी खेती करनी होगी। हमें इस बात को समझना चाहिए कि हमारे लोगों को अभी भी इसे सीखना बाकी है। भारत में लोकतंत्र केवल दिखावा मात्र है, जो मूलतः अलोकतांत्रिक है।"

आंबेडकर ने आगे कहा कि संविधान के साथ छेड़छाड़ करना, उसके मूल स्वरूप को बदले बिना इसे असंगत और संविधान की भावना के विपरीत बनाना पूरी तरह से संभव है। यह इंदिरा गांधी की कांग्रेस ही थी, जिसने ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ और ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ को बढ़ावा देने की मांग कर एक रास्ता बनाया। इन खतरनाक विचारों को मोदी सरकार ने 2014 के बाद और बढ़ाया, जिसमें सिविल सेवाओं, पुलिस, जांच एजेंसियों, नियामक निकायों, न्यायपालिका और चुनाव आयोग को स्वतंत्रता से वंचित कर अपने राजनीतिक एजेंडे के अधीन लाने के लिए काम किया है।

मैं अंत में वही कहूंगा कि, जो आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था "हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस आजादी ने हमारे ऊपर बड़ी जिम्मेदारियां डाली है। आजादी के साथ हमने कुछ भी गलत होने के लिए अंग्रेजों को दोषी बताने का बहाना खो दिया है। अगर इसके बाद भी चीजें गलत होती हैं तो उसके दोषी हम खुद होंगे।" 75 साल बाद अपनी समस्याओं के लिए दूसरों को दोष देने की आदत आंबेडकर के समय की तुलना में कहीं अधिक प्रचलित है। मुगलों का शासन सदियों पहले खत्म हो गया था। अंग्रेजों ने 1947 में देश छोड़ दिया था और जवाहरलाल नेहरू का 1964 में निधन हो गया- इन तीन विलुप्त कारकों को ही हर विफलता के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है, क्योंकि कथित तौर पर स्वदेशी और आत्मनिर्भर सरकार खुद करने में विफल रही है।

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