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नौजवानों की निराशा को समझिए

Sun, 27 Oct 2013 06:08 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 27 Oct 2013 06:08 PM IST
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Understand the problem of Youth

राहुल गांधी के भाषण मैंने पिछले सप्ताह बड़े ध्यान से सुने। इसलिए कि उनके राजस्थान दौरे से तीन दिन पहले मैं कानपुर गई थी नरेंद्र मोदी की उत्तर प्रदेश में पहली आम सभा देखने। विशाल जलसा था, जैसे जनता का सैलाब उमड़ आया हो और घंटों तक वह चमचमाती धूप में इंतजार करती रही मोदी का। इतने लोग आए थे उनको सुनने और मोदी जब मंच पर पहुंचे, तो इतना जोश दिखाया उन्होंने कि अपना भाषण मोदी ने यह कहकर शुरू किया कि कानपुर की जनता ने उनको 'जीत लिया'। इसके बाद मोदी ने तकरीबन अपना सारा भाषण विकास से जुड़े मुद्दों पर दिया और लोगों के सामने एक नए भारत, एक नए सपने का रंग दिखाने की कोशिश की। मोदी के कई भाषण देखे-सुने हैं मैंने और मेरी राय में उनका यह भाषण सबसे अच्छा था।

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इसलिए देखना चाहती थी कि इसके जवाब में क्या कहेंगे राहुल गांधी और कांग्रेस के अघोषित प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी। राजस्थान का उनका दौरा शुरू होते ही बैठ गई मैं टीवी के आगे उनके चुरू और अलवर वाले भाषण सुनने, और सुनने के बाद हैरान रह गई। इसलिए कि राहुल ने देश की वर्तमान कठिनाइयों को अनदेखा करके पुरानी यादें ताजा करने पर ज्यादा ध्यान दिया। उन्होंने कहा, मेरी दादी को मार दिया, मेरे पापा को मार दिया। फिर कहा शायद किसी दिन मुझे भी मार देंगे।
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ऐसी बातें करके उनको अगर लगता है कि आम जनता में उनके लिए हमदर्दी पैदा हो जाएगी, तो शायद वह समझ नहीं पाए हैं कि जनता इन दिनों कितनी दुखी है। आम आदमी पिस रहा है महंगाई के बोझ तले, नौजवान निराश हैं बेरोजगारी के कारण और देश बेहाल है आर्थिक मंदी को लेकर। इन चीजों का जिक्र तक नहीं था राहुल की तकरीरों में। ऊपर से राहुल गांधी ने जनता के गुस्से को झूठा बताया। 'गुस्सा होता नहीं है, डाला जाता है। ये लोग गुस्सा डाल देते हैं और फिर पूछते हैं आतंकवाद क्यों है।' क्या उनके कहने का मतलब यह है कि सीमा पार से जो जेहादी आतंकवादी आते हैं इस देश के बाजारों, मंदिरों और होटलों में बेगुनाह लोगों को मारने, उनमें गुस्सा भारत की विपक्षी दलों ने 'डाला' है? क्या ऐसा कहने से वह एक तरह से आतंकवाद को जायज नहीं ठहरा रहे हैं? अगर वह यह बात नहीं कहना चाह रहे थे, तो उनको समझाना पड़ेगा कि वह कहना क्या चाहते हैं। यह भी समझाना होगा कि नियंत्रण रेखा पर इस देश के जो बहादुर जवान इन दिनों मारे जा रहे हैं, उनको मार कौन रहा है और कौन हैं वे घुसपैठिए, जो सीमा पार करके आ रहे हैं। कौन थे वे लोग, जिन्होंने हाल में जम्मू की एक छावनी में एक भारतीय कर्नल की हत्या की थी?
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राहुल के भाषण सुनकर मैं हैरान इस बात से भी हुई कि किस तरह हमारी एंटी-सेक्यूलर कांग्रेस पार्टी के युवराज ने चुनावी मुद्दों को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। मुज्जफरनगर के दंगों का जिक्र करते हुए कहा कि उनको खबर दी गई थी किसी खुफिया एजेंसी के अधिकारी द्वारा कि वहां के दंगे पीड़ित मुसलमान अब पाकिस्तान जाना चाहते हैं।
राजनीति में नादान हैं राहुल, वरना बहुत पहले ही जान गए होते कि इस तरह की बातें करने से तल्खियां कितनी पैदा हो सकती हैं हिंदुओं और मुसलमानों के बीच। राजनीति में गलतियां माफ हो सकती हैं, क्योंकि गलतियां तो बड़े से बड़े राजनेता भी कर सकते हैं, लेकिन नादानी माफ नहीं की जा सकती।


कितना अजीब हाल है 'सेक्यूलरिज्म' का, कि जो लोग गर्व करते हैं सेक्यूलर होने पर, वही सांप्रदायिक मुद्दे उठाना चाहते हैं और जो तथाकथित सांप्रदायिक हैं, वह उठा रहे हैं विकास के मुद्दे। गुजरात के मुख्यमंत्री, जिनको राहुल की मम्मी जी ने कभी 'मौत का सौदागर' कहा था, बदनाम हैं इतने कि विकास की भी जब बातें करते हैं, तो सेक्यूलर राजनेता कहते हैं कि उनका गुप्त 'एजेंडा' राम मंदिर का है। और राहुल गांधी अपनी टिप्पणी से फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं, फिर भी उनको सांप्रदायिक कहने को तैयार नहीं हैं हम जैसे सेक्यूलर राजनीतिक पंडित। उनकी सांप्रदायिक तकरीरों को हम उदार नजरों से देखते हैं, क्योंकि उनकी सांप्रदायिकता में है मुसलमानों की तरफदारी। वाह रे सेक्यूलरिज्म, तेरा क्या कहना! वाह रे भारत महान, तेरा क्या कहना!

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