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टीपू सुल्तान का सच : क्या वह स्वतंत्र भारत के नायकों में से एक हैं? 

Sun, 18 Jul 2021 08:11 AM IST
Balbir Punj बलबीर पुंज
Updated Sun, 18 Jul 2021 08:11 AM IST
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Truth of Tipu Sultan: Is he one of the heroes of independent India?
Tipu Sultan

क्या मैसूर का शासक रहा टीपू सुल्तान स्वतंत्र भारत के नायकों में से एक है? इस प्रश्न के गर्भ में वह हालिया प्रस्ताव है, जिसे देश के सबसे समृद्ध बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) की एक समिति के समक्ष समाजवादी पार्टी द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इसमें मांग की गई थी कि मुंबई के एक उद्यान का नाम टीपू सुल्तान पर समर्पित किया जाए। यह ठीक है कि कुछ हिंदू संगठनों के विरोध के पश्चात इस पर निर्णय टल गया। किंतु देश में टीपू के महिमामंडन का प्रयास पहली बार नहीं हुआ है। गत माह आंध प्रदेश के प्रोद्दुतुर में भी सत्तारुढ़ वाईएसआर कांग्रेस के विधायक द्वारा इस शासक की मूर्ति स्थापित करने की कोशिश हुई थी। कर्नाटक में मुख्य विपक्षी दल जद(स) और कांग्रेस टीपू सुल्तान की जयंती राजकीय स्तर पर मनाने की पक्षधर है और सत्ता में रहने पर वह ऐसा कई बार कर भी चुके हैं।


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मैसूर पर टीपू सुल्तान का 17 वर्षों (1782-1799) तक राज रहा था। स्वघोषित सेक्यूलरिस्ट, एक सामुदायिक वर्ग (जनप्रतिनिधि सहित) और वाम इतिहासकारों के एक कुनबे ने ऐतिहासिक साक्ष्यों को विकृत करके टीपू सुल्तान की छवि एक राष्ट्रभक्त, स्वतंत्रता सेनानी और पंथनिरपेक्ष मूल्यों में आस्था रखने वाले महान शासक के रूप में गढ़ी है। यदि टीपू वाकई भारतीय स्वतंत्रता सेनानी था, जो देश के लिए अंग्रेजों से लड़ा और इस आधार पर उसे मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहिब पेशवा-2 आदि महान योद्धाओं और राजा-रजवाड़ों के साथ गांधीजी, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस आदि राष्ट्रवादियों की पंक्ति में खड़ा किया जाता है, तो पाकिस्तान का दिल टीपू सुल्तान जैसे शासकों के लिए ही क्यों धड़कता है? क्यों पाकिस्तान में गांधी, पटेल, बोस आदि का गुणगान 'हराम' है? क्या यह सत्य नहीं कि कासिम, गजनवी, गौरी, बाबर, औरंगजेब और टीपू सुल्तान आदि को भारतीय उपमहाद्वीप का एक वर्ग इसलिए नायक मानता है, क्योंकि वे सभी उसी मानसिकता के साथ भारतीय सनातन संस्कृति और उसके प्रतीक-चिन्हों से घृणा करते थे, जिसके गर्भ से 1947 में पाकिस्तान का जन्म हुआ था?

विडंबना है कि भारतीय समाज के उस वर्ग को टीपू सुल्तान बहुत पसंद है, जिसके लिए प्रकटतः हिटलर घृणा का पर्याय, मानवता-बहुलतावाद विरोधी और फासीवाद का प्रतीक है। यह ठीक है कि टीपू ने ब्रितानी साम्राज्य से लोहा लिया था। किंतु यक्ष प्रश्न यह है कि उसने ऐसा क्यों किया?

वास्तव में, टीपू एक 'गाजी' था, जिसने अपने अन्य प्रेरक पूर्ववर्तियों की भांति भारत में इस्लामी साम्राज्य कायम करने का सपना देखा था और अंग्रेज उसमें रोड़ा बन गए। अपने उसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उसने फ्रांस के अतिरिक्त फारस, अफगानिस्तान, तुर्की और अन्य मुस्लिम देशों से सैन्य सहायता मांगी थी। इन तथ्यों को एक पूरा कुनबा अक्सर ब्रितानियों का झूठा प्रचार बताता है। इस कुनबे द्वारा टीपू सुल्तान के भ्रामक नैरेटिव की पृष्ठभूमि में मैं टीपू के कुछ पत्रों को उद्धृत करना चाहूंगा, जो उसने अपने शासनकाल में सैन्य अधिकारियों को भेजे थे। इन सभी को इतिहासकार सरदार के.एम पनिक्कर ने लंदन स्थित भारत कार्यालय पुस्तकालय से प्राप्त किया था।

अब्दुल कादिर को 22 मार्च, 1788 को टीपू लिखता है, '12 हजार हिंदुओं (ब्राह्मण सहित) को इस्लाम से सम्मानित किया गया है। हिंदुओं के बीच इसका व्यापक प्रचार होना चाहिए। एक भी नंबूदिरी (ब्राह्मण) को बख्शा नहीं जाना चाहिए।'

इसी तरह 14 दिसंबर, 1788 को कालीकट में अपने सेना प्रमुख को टीपू ने लिखा था, 'मैं अपने दो अनुयायी मीर हुसैन अली के साथ भेज रहा हूं। उनकी सहायता से, आपको सभी हिंदुओं को पकड़कर मारना है। जो लोग 20 वर्ष की आयु से कम हैं, उन्हें जेल में रख दिया जाए, जबकि शेष 5,000 को पेड़ से लटकाकर मार दिया जाए। यह मेरा आदेश है।'

19 जनवरी, 1790 को बदरुज जुम्मन खान को भेजे पत्र में टीपू ने लिखा था, 'क्या आपको पता नहीं कि मैंने हाल ही में मालाबार में बड़ी फतह हासिल की है और चार लाख से अधिक हिंदुओं को इस्लाम में मतांतरित किया है।'

क्या पत्रों की इस विषाक्त शृंखला से टीपू सुल्तान के वास्तविक चरित्र और उसके मजहबी चिंतन का आभास नहीं होता है? यदि देशभक्ति इस देश की बहुलतावादी सनातन संस्कृति, उसके मान-बिंदुओं और परंपराओं को सम्मान देने का पर्याय है, तो निर्विवाद रूप से उस कसौटी पर आततायी टीपू सुल्तान को राष्ट्रभक्त और सहिष्णु कहना सच्चे राष्ट्रीय नायकों- जिसमें सिख गुरुओं की परंपरा से लेकर मराठा, राजपूत, स्वामी विवेकानंद, गांधीजी, सरदार पटेल और सुभाष चंद्र बोस आदि महापुरुष भी शामिल है- उन सभी का अपमान ही कहा जाएगा।

लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं।

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