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ट्रंप का टैरिफ और ब्रिटिश स्टील का संकट: 150 साल के इतिहास की उल्टी गिनती शुरू, उत्पादन खत्म होने के कगार पर
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सार
है, जिसने कभी दुनिया में रेल बिछाई, जहाज तैराए, साम्राज्य खड़ा किया और अब? जी-7 का इकलौता मुल्क बनने जा रहा है, जो अपना स्टील भी नहीं बना सकता।
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विस्तार
क्या डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ ब्रिटेन का फौलादी इतिहास मिटा देंगे? अखबारों की सुर्खियां चीख रही हैं। स्कनथॉर्प में ब्रिटिश स्टील की फर्नेस यानी भट्ठियां ठंडी होने वाली हैं। ट्रंप ने अमेरिका में स्टील की आमद पर टैरिफ थोप दिया है। इसके बाद ब्रिटिश स्टील के चीनी मालिक जिंगये ने इस प्लांट के लिए कोकिंग कोल की आपूर्ति रोक दी है। इस इकाई ने लोहे की सप्लाई का पैसा भी नहीं चुकाया है। कोल और आयरन ओर नहीं, तो स्कनथॉर्प की इकाई बंद। 2,700 नौकरियां गईं! चीनी मालिक जिंगये फुफकार रहे हैं, 'हर दिन सात लाख पाउंड का घाटा! टैरिफ ने कमर तोड़ दी।' सरकार कह रही है, '50 करोड़ पाउंड लो, पर्यावरण के लिए सुरक्षित स्टील बनाओ।' पर जिंगये को एक अरब पाउंड चाहिए।
बात बन नहीं रही है। ब्रिटेन का 150 साल पुराना स्टील उत्पादन खत्म होने के कगार पर है। यह वही ब्रिटेन है, जिसने कभी दुनिया में रेल बिछाई, जहाज तैराए, साम्राज्य खड़ा किया और अब? जी-7 का इकलौता मुल्क बनने जा रहा है, जो अपना स्टील भी नहीं बना सकता।
बर्तानवी स्टील इतिहास की करवट बड़ी सनसनीखेज है और इसका भारत से बड़ा पेचीदा रिश्ता है। तो आइए, टाइम मशीन में विराजिए! हम उस दौर में चलते हैं, जब ब्रिटिश स्टील दुनिया का सपना था।
टाइम मशीन की खिड़की से झांकिए।
यह 1780 का दशक है। हम फांटले हैम्पशायर में हैं। यहां हेनरी कॉर्ट नाम का एक बंदा कुछ गजब का जादू दिखा रहा है। कार्ट लोहार है। लैंकास्टर का निवासी है और रॉयल नेवी में अपनी नौकरी के दौरान लोहे का हुनर सीख कर आया है। ‘लोहा तो बनता है, पर इसे साफ और मजबूत कैसे करें?’ इस सवाल का जवाब तलाशते हुए उसने ‘पडलिंग प्रोसेस’ का आविष्कार किया। वह लोहे को कोयले की आग में पकाकर, उसे लुढ़का कर मजबूत बनाता है। यह छोटा-सा कमाल आगे चलकर ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति की नींव रखने वाला है। हेनरी स्टील किताबों में चमकेगा, पर उसकी जिंदगी गुमनामी में खो जाएगी।
अब हम 1856 में लंदन में हैं। यह सेंट पैनक्रास का इलाका है। बेक्सटर हाउस की अपनी प्रयोगशाला में काम कर रहे हैं हेनरी बेसेमर। उनकी शुरुआती कोशिशों को बड़ी आलोचना झेलनी पड़ी है। वह तोप के गोले बना रहे हैं। लेकिन लोहा सस्ता और मजबूत कैसे हो? बेसेमर ने एक भट्ठी बनाई है, जिसमें हवा फूंककर लोहे की गंदगी जलाकर उसने ‘बेसेमर प्रोसेस’ खोज लिया है। अब स्टील घंटों में बनेगा, हफ्तों में नहीं! लोहा पिघलता है, आग की लपटें उठती हैं, और स्टील तैयार। यह कमाल ब्रिटेन को स्टील का बादशाह बना देगा। आखिरकार, हेनरी बेसेमर सर हेनरी बेसेमर होंगे और स्टील के जादूगर कहे जाएंगे।
अब टाइम मशीन एक दशक आगे (1859) स्कनथॉर्प आ गई है। सामंत और जागीरदार रॉलैंड विन ने लौह अयस्क खोज लिया है। लोहा मिलते वह रेल की पटरियां बिछवाकर कारखाने बनाने लगा है। ट्रेंट आयरन वर्क्स और फ्रॉडिंगम आयरन वर्क्स की चिमनियां धुआं उगल रही हैं। स्कनथॉर्प की किस्मत चमक उठी है।
यात्रीगण कृपया ध्यान दें, 2025 में हमारी यात्रा इसी स्कनथॉर्प से ही शुरू हुई थी।
अब ब्रिटेन का स्टील ब्रिटिश साम्राज्य की रगों में दौड़ने लगा है। रेल क्रांति शुरू हो गई है। पटरियां भारत तक बिछ रही हैं। स्टील के जहाज समंदर पार कर रहे हैं। नौसेना को ताकत मिल रही है।
अरे! हम तो उड़ते-उड़ते भारत आ गए हैं। 1907 का साल। जमेशद जी टाटा की टाटा स्टील की फर्नेस स्टील उगल रही है। भारत का पहला स्टील प्लांट, ब्रिटिश स्टील की गुलामी से बगावत का परचम बन गया है। ब्रिटिश रेल वाले क्वालिटी को लेकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। टाटा का स्टील ठुकरा दिया गया है। अब जरा वक्त की करवट देखिए, पहली बड़ी जंग छिड़ गई है, ब्रिटिश स्टील सेना को मिलने लगा है। टाटा को मौका मिल गया है, क्वालिटी सुधरती है, और ब्रिटिश रेल अब टाटा स्टील की पटरियों पर दौड़ रही है। हम फिर स्कनथॉर्प आ गए हैं। जॉन लायसाग्ट्स का स्टीलवर्क्स खुल गया है और दुनिया के उत्पादन में ब्रिटेन के स्टील की हिस्सेदारी 10 फीसदी तक पहुंच गई है।
टाइम मशीन 1974 में आ गई है। क्वीन एलिजाबेथ ‘एंकर प्रोजेक्ट’ का रिबन काट रही हैं। आयरन एंड स्टील एक्ट के तहत ब्रिटेन में स्टील उद्योग का राष्ट्रीयकरण हो गया है। स्कनथॉर्प की फैक्टरियां ब्रिटिश स्टील कॉरपोरेशन (बीएससी) में मिला दी गई हैं। मगर सरकारीकरण का यह उत्साह लंबा नहीं टिकेगा।
उबासी छोड़िए, 1980 आ गया है। यह ब्रिटेन के औद्योगिक इतिहास का निर्णायक मोड़ है और टाइम मशीन आपको इसका गवाह बना रही है। मारग्रेट थैचर ने प्राइवेटाइजेशन की यलगार की है। यह 1988 का साल है। ब्रिटिश स्टील कॉरपोरेशन प्राइवेट होकर ब्रिटिश स्टील पीएलसी बन गई है। पुनर्गठन हुआ है। प्लांट बंद, मजदूर कम, और घाटा खत्म-बस।
सुर्खियां चीख रही हैं। यूरोप में स्टील का नया सिकंदर तैयार हो गया है। नई मशीनें, सस्ता माल, और दुनिया में धाक जम गई। यह 1999 का साल है। ब्रिटिश स्टील डच कंपनी कोनिंक्लिज्के हूगोवेंस में मिला दी गई है। अब ब्रिटेन के फौलादी इतिहास का नया नाम कोरस ग्रुप है।
खबरों पर निगाह जमाइए। मुसीबतों का कोरस तेज हो रहा है। अब यह 2007 है। टाटा स्टील ने कोरस को खरीद लिया है। यह वही टाटा है, जिसे कोरस के बर्तानवी पूर्वज स्टील बनाने लायक मानते ही नहीं थे। अलबत्ता कोरस फिर भी संकट में है। पहला सस्ता चीनी स्टील, फिर 2008 की मंदी और बढ़ती लागत। कंपनी की किस्मत खराब है।
अब हम 2016 में हैं। ब्रिटिश स्टील का स्कनथॉर्प वाला हिस्सा ग्रेबुल कैपिटल को बिकता है। ब्रिटिश स्टील लिमिटेड फिर जन्म ले रही है, मगर यह 2019 में दिवालिया हो गई। अब चीनी जिंगये कंपनी बचाने आई है, जिसने अब ट्रंप के टैरिफ के बाद ब्रिटिश सरकार की सब्सिडी योजना को नकार दिया है। ब्रितानी बजट में इतना पैसा नहीं है कि इस पुरानी कंपनी को नया और पर्यावरण के लिए सुरक्षित तकनीक से लैस किया जा सके।
यह लीजिए, हम लौट कर स्कनथॉर्प आ गए हैं। यहां हर दिन सात लाख पाउंड का नुकसान, टैरिफ की चोट और पर्यावरण के नियमों की मार के कारण नौकरियों पर बन आई है। ट्रंप के टैरिफ ने दुनिया के स्टील कारोबार की चूलें हिला दी हैं। स्कनथॉर्प की भट्ठियां शांत होने को हैं। टाइम मशीन लंदन में उतर रही है, जहां की राजनीतिक आबोहवा में ब्रितानी स्टील के 150 साल के इतिहास की उल्टी गिनती चल रही है। क्या ब्रिटेन अब अपना स्टील नहीं बना पाएगा? कुछ पता चले, तो बताइएगा। हम फिर मिलते हैं, जल्द ही...