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अमेरिका में ट्रंप युग की शुरुआत
सुरेंद्र कुमार
Updated Thu, 19 Jan 2017 07:34 PM IST
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सुरेंद्र कुमार
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आज डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ लेने वाले हैं। लेकिन ट्रंप की लोकप्रियता की दर मुश्किल से 48 फीसदी है, जबकि पहले कार्यकाल में ओबामा की लोकप्रियता दर 75 फीसदी थी। जाहिर है, ट्रंप को उन लाखों अमेरिकियों का दिल जीतना पड़ेगा, जो उन्हें पसंद नहीं करते, हालांकि वे हाल ही में गोल्डन ग्लोब अवार्ड पाने वाली मेरिल स्ट्रीप की तरह उनकी खुलकर आलोचना भी नहीं करते।
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ट्रंप का रूपांतरण हॉलीवुड के ऐक्शन फिल्मों के टीजर की तरह लगता है, जिसमें उन्होंने हर दिन दोस्तों और दुश्मनों, दोनों पर लगातार हमले किए। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपनी अपमानजनक टिप्पणियों से मुसलमानों और अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय के एक बड़े तबके को नाराज कर दिया था।
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जन अधिकार नेता और सांसद जॉन लुइस के बारे में उनकी एक हालिया ट्वीट ने उस अश्वेत समुदाय के साथ उनके फासले को और बढ़ा ही दिया है, जिसने पिछले दो वर्षों में बढ़ते नस्लीय हमलों का सामना किया है। ओबामा केयर (स्वास्थ्य सेवा से संबंधित कार्यक्रम) को रद्द करने की ट्रंप की धमकी से वैसे दो करोड़ अमेरिकियों को सदमा लगा है, जो उससे लाभान्वित हो रहे हैं। उनका मंत्रिमंडल सफल अरबपति व्यावसायियों और वाल स्ट्रीट अधिकारियों के एक क्लब की तरह लगता है, जिनकी संयुक्त संपत्ति 12 अरब अमेरिकी डॉलर है! भारत में मीडिया एक दामाद के कथित कारनामों का राग अलापता रहता है, लेकिन अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति को इस संदर्भ में किसी तरह की नैतिक दुविधा का कष्ट नहीं भुगतना पड़ रहा । उन्होंने अपने दामाद जारेड कशनर को अपना वरिष्ठ सलाहकार नामित किया है, जो मौजूदा भाई-भतीजावाद कानून के खिलाफ है! इसके अलावा अपने ट्रस्टों से खुद को अलग रखने का भी उनका कोई इरादा नहीं है।
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रूस को लेकर सभी तीन शीर्ष खुफिया एजेंसियों से मतभेद और मीडिया के साथ बदतर सार्वजनिक विवाद इस निर्वाचित राष्ट्रपति के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है। दूसरे देशों में रोजगार का निर्यात करने वाली कंपनियों को दंडित करने की उनकी धमकी चिंता का विषय है। भारतीय आईटी कंपनियों-टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो और एचसीएल को भी उसी तरह परेशान किया जा रहा है। सख्त एच1बी वीजा और वीजा शुल्क में बढ़ोतरी से उन पर बुरा असर पड़ेगा। वह दंडात्मक आयात शुल्क और सीमित बाजार पहुंच की धमकी देकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। ट्रंप ने मैक्सिको से लगने वाली सीमा पर दीवार बनाने की अपनी योजना दोहराई है, चीन पर मुद्रा के साथ गड़बड़ी करने का आरोप लगाया है और धमकी दी है कि वह अमेरिका की वन चायना पॉलिसी की रक्षा नहीं करेंगे। हालांकि चीन-अमेरिकी रिश्ते में भारी आर्थिक हित और संघर्ष के गंभीर परिणाम ट्रंप को चीन के साथ सौदा करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
अगर वह अमेरिकी दूतावास को यरूशलम में स्थानांतरित करने के अपने विचार पर अमल करते हैं, तो पूरा अरब जगत नाराज हो जाएगा। फ्रेंच राष्ट्रपति ओलांद ने इसके खिलाफ चेतावनी दी है। इसी तरह ईरान के साथ परमाणु समझौते और जलवायु परिवर्तन पर पेरिस 20 समझौते को रद्द करने के किसी भी कदम का वैश्विक स्तर पर विघटनकारी प्रभाव पड़ेगा। राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने के पुतिन के प्रयासों को लेकर उठे उग्र विवादों के बावजूद रूस ही अकेला देश है, जिसके साथ ट्रंप के कार्यकाल में द्विपक्षीय रिश्ते बेहतर होने की आशा है। हालांकि अमेरिका और रूस के बीच रिश्तों में जमी बर्फ के पिघलने से सीरिया में हालात स्थिर हो सकते हैं और इस्लामिक स्टेट को कमजोर किया जा सकता है।
भारतीय आईटी कंपनियों की चिंता के बावजूद भारत के साथ रिश्ते बेहतर रहने की संभावना है। हाल ही में ट्रंप ने आर्थिक सुधारों और व्यवसाय के लिए अनुकूल माहौल बनाने के प्रयासों के कारण प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा की। उन्होंने इस पर जोर दिया कि राष्ट्रपति पद संभालने के बाद वह भारत के सबसे अच्छे मित्र होंगे। एक व्यवसायी होने के नाते वह भारत के साथ व्यावसायिक संबंध बनाने में सक्षम हैं। लेकिन इसके लिए अमेरिकी संसद का द्विदलीय समर्थन जरूरी है। अमेरिका की कुल आबादी का एक फीसदी भारतीय-अमेरिकी समुदाय है, जो अभी अमेरिकी संसद में भी एक फीसदी प्रतिनिधित्व करता है। नवनिर्वाचित चार सांसदों और एक सीनेटर अमेरिका और भारत के बीच मजबूत पुल साबित हो सकते हैं। पिछले पांच वर्षों में दोनों देशों के बीच 15 अरब डॉलर का रक्षा सौदा हुआ है, जो लॉजिस्टिक एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर की भारत की घोषणा के साथ और बढ़ने की संभावना है। मोदी का मेक इन इंडिया कार्यक्रम अमेरिकी कंपनियों को खास तौर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर, रक्षा उत्पादन, आईटी, स्मार्ट सिटी, जल प्रबंधन, ऊर्जा, स्वच्छ ऊर्जा आदि क्षेत्रों में व्यवसाय के अवसर देता है। परस्पर आर्थिक लाभ और चीन द्वारा पेश सामरिक चुनौतियां भारत और अमेरिका को रणनीतिक भागीदार बने रहने के लिए प्रेरित करेगी। यदि ट्रंप ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप को उलट देते हैं और एशिया में बहुप्रचारित अमेरिकी पुनर्संतुलन अधर में रहता है, तो चीन की बढ़ती आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए एकमात्र उपाय अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक चतुर्भुज साझेदारी है, जिसमें दक्षिण कोरिया के भी शामिल होने की संभावना है।
भारत-अमेरिकी रिश्तों की परीक्षा पाकिस्तान के प्रति ट्रंप के नजरिये और अफगानिस्तान की स्थिति पर निर्भर करेगी। फोन पर शरीफ के साथ बातचीत में उनके जोशीले संदर्भ से भारत में अच्छा संदेश नहीं गया है। पारंपरिक समझ बताती है कि प्रचलित आशंकाओं के विपरीत, सांस्थानिक संतुलन और अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों की पेशेवर सलाह के साथ उन्हें एक परिपक्व और जिम्मेदार प्रशासन की शुरुआत करनी चाहिए। उम्मीद करनी चाहिए कि ट्रंप की जीत अमेरिका और बाकी दुनिया के लिए अच्छा हो।