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तीसरे पायदान का सफर
मधुरेन्द्र सिन्हा
Updated Fri, 12 Jan 2018 11:11 AM IST
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मधुरेन्द्र सिन्हा
नब्बे के दशक में भारत ने आर्थिक उदारीकरण को गले लगाया जिसके दूरगामी प्रभाव हुए। हमारी अर्थव्यवस्था ने छलांगें लगानी शुरू कर दी जिसका फल हमें देखने को मिला। इस सदी में हमारी अर्थव्यवस्था के विकास की दर कई वर्षों तक नौ प्रतिशत रही जिसने हमें ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया और आज भारत दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं में आठवें नंबर पर है।
लेकिन बात यहीं तक खत्म नहीं हो रही है। माना जा रहा है कि भारत 2028 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। वह जर्मनी और जापान जैसे औद्योगिक देशों को पीछे छोड़ता हुआ तीसरे पायदान पर जा पहुंचेगा। उस समय भारत की अर्थव्यवस्था का आकार सात खरब डॉलर का होगा। वर्तमान में यह दो खरब डॉलर से जरा अधिक (2.3) है।
ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 भारत के लिए बेहतरीन होगा और वह पांचवें पायदान पर पहुंच जाएगा। इस साल वह इंग्लैंड, फ्रांस वगैरह से भी आगे निकल जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि डॉलर के रूप में यह उन दोनों से आगे हो जाएगा। यह हम भारतीयों के लिए बहुत बड़ी बात होगी, क्योंकि हमने 70 साल पहले ही आजादी पाई है और तमाम कमजोरियों तथा कमियों के बावजूद हम उस ऊंचाई पर पहुंचने जा रहे हैं।
आज से 20 साल पहले तो हम यह सोच भी नहीं सकते थे, लेकिन ऐसा अब संभव हो चुका है। भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से छलांग लगाती जा रही है। इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था इस समय धीमी पड़ गई है और यूरोपीय संघ से अलग होने की आशंका से वहां अभी ऊहापोह की स्थिति है। हालांकि ऐसा लंबे समय तक नहीं रहेगा और इंग्लैंड फिर से आगे बढ़ने लगेगा। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था को नोटबंदी और जीएसटी से काफी झटका लगा।
उसकी गति धीमी हो गई और लोगों की आय पर असर पड़ा। लेकिन अब यह पटरी पर आने लगी है। नोटबंदी का असर खत्म हो गया है और जीएसटी सामान्य कारोबार का हिस्सा हो गया है। गुजरात में जीत के बाद सरकार अब आर्थिक सुधार करेगी और अर्थव्यवस्था को मदद पहुंचाने वाले कदम उठाएगी। इतना ही नहीं, आने वाले बजट में कई ऐसी चीजें देखने को मिल सकती हैं, जिनसे जनता को फायदा होगा।
रिसर्च एजेंसी सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स ऐंड बिजनेस रिसर्च कंसल्टेंसी की 2018 की रिपोर्ट से पता चलता है कि नई टेक्नोलॉजी और तेल की गिरती कीमतों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ेगी। भारत की विकास दर अगले साल तेज हो जाएगी और उसका असर साफ दिखाई देगा।
कुछ आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत की जीडीपी की दर अगले साल सात फीसदी तक रह सकती है। लेकिन विश्व बैंक के ताजा सर्वेक्षण में कहा गया है कि 2018 में भारत की जीडीपी की प्रगति की दर 7.3 प्रतिशत रहेगी। उसका मानना है कि मध्यम काल में जीएसटी कॉरपोरेट्स का मददगार होगा। इससे उत्पादन लागत में कमी आएगी और देश में टैक्स वसूली बढ़ेगी, क्योंकि उसकी चोरी रुकेगी। इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा खर्च किए जाने का सकारात्मक असर भी दिखेगा। भारत की अर्थव्यवस्था चीन से अलग तरह की है।
उसकी पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था निर्यात पर निर्भर है और उसने बड़ी उत्पादन क्षमता तैयार की है, जिसे हर समय ग्राहकों की तलाश रहती है। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था घरेलू उपभोग पर आधारित है और उसे 55 करोड़ खरीदारों, उपभोक्ताओं का सहारा है। भारत का सर्विस सेक्टर और बड़ा होगा, जो अर्थव्यवस्था का सहारा होगा। यहां उत्पादन के बढ़ने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का आकार भी बढ़ेगा।
सरकारी निवेश के साथ-साथ अगर निजी निवेश में तेजी आती है, तो इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। निजी निवेश से देश में रोजगार भी बढ़ेगा और उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। आर्थिक उदारीकरण के दौर में हमने हजारों वर्षों से हमारा साथ दे रहे कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की और उसका नकारात्मक पहलू भी देखा।
लेकिन अब सरकार ने इस ओर ध्यान देना शुरू किया है। अगर इस क्षेत्र में पर्याप्त निवेश किया गया और किसानों की समस्या के हल की दिशा में काम किया गया, तो इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। कृषि क्षेत्र में निवेश करने और किसानों की समस्याओं को सुलझाने से विकास दर में अच्छी बढ़ोतरी होगी। अब तक यह सेक्टर उपेक्षित रहा है और समय आ गया है कि इसमें और निवेश किया जाए। किसानों की आय बढ़ेगी, तो इसका सीधा असर मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ेगा। किसानों की आर्थिक और तकनीकी मदद देश की अर्थव्यवस्था के हित में है। खेती में आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल इस दिशा में एक बड़ी चुनौती होगा।
कागज में देखने पर यह संभव लगता है कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। जो सपना 90 के दशक में देखा गया वह पूरा हो गया है, लेकिन अभी जो सपना देखा जा रहा है वह कैसे पूरा होगा? इस राह में बहुत सारी चुनौतियां हैं और सबसे बड़ी है निजी निवेश तथा खपत में भारी बढ़ोतरी।
यह इतना आसान भी नहीं हैं। उद्योगपति और निवेश तभी करेंगे, जब उन्हें इस बात का यकीन होगा कि उन्हें उसका फल मिलेगा। सरकार ने जीएसटी के रूप में टैक्स रिफॉर्म का बड़ा कदम उठाया है। इस तरह के कई कदम उठाने की जरूरत है। और विदेशी निवेशक भी तभी आएंगे, जब उनके लिए यहां काम करना आसान होगा। एक बड़ी चुनौती है बैंकिंग सेक्टर को सुधारना और उसे पूरी तरह से मजबूत बनाना। अभी यह एनपीए की मार से लड़खड़ा रहा है। सरकारी बैंकों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना बेहद जरूरी होगा, क्योंकि निजी निवेशकों को कर्ज बैंकों से ही मिलेगा। वैसे सरकार ने उन्हें एक बड़ा वित्तीय पैकेज भी दिया है।
लेकिन इन सबसे बड़ी चुनौती होगी राजनीतिक नेतृत्व की इच्छा शक्ति की। देश को आने वाले समय में सही दिशा देना एक बड़ी चुनौती होगा और उसके लिए जरूरी है कि राजनीतिक अस्थिरता न हो। राजनीतिक रूप से सुदृढ़ देश ही उन ऊंचाइयों पर पहुंच सकेगा।
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लेकिन बात यहीं तक खत्म नहीं हो रही है। माना जा रहा है कि भारत 2028 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। वह जर्मनी और जापान जैसे औद्योगिक देशों को पीछे छोड़ता हुआ तीसरे पायदान पर जा पहुंचेगा। उस समय भारत की अर्थव्यवस्था का आकार सात खरब डॉलर का होगा। वर्तमान में यह दो खरब डॉलर से जरा अधिक (2.3) है।
ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 भारत के लिए बेहतरीन होगा और वह पांचवें पायदान पर पहुंच जाएगा। इस साल वह इंग्लैंड, फ्रांस वगैरह से भी आगे निकल जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि डॉलर के रूप में यह उन दोनों से आगे हो जाएगा। यह हम भारतीयों के लिए बहुत बड़ी बात होगी, क्योंकि हमने 70 साल पहले ही आजादी पाई है और तमाम कमजोरियों तथा कमियों के बावजूद हम उस ऊंचाई पर पहुंचने जा रहे हैं।
आज से 20 साल पहले तो हम यह सोच भी नहीं सकते थे, लेकिन ऐसा अब संभव हो चुका है। भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से छलांग लगाती जा रही है। इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था इस समय धीमी पड़ गई है और यूरोपीय संघ से अलग होने की आशंका से वहां अभी ऊहापोह की स्थिति है। हालांकि ऐसा लंबे समय तक नहीं रहेगा और इंग्लैंड फिर से आगे बढ़ने लगेगा। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था को नोटबंदी और जीएसटी से काफी झटका लगा।
उसकी गति धीमी हो गई और लोगों की आय पर असर पड़ा। लेकिन अब यह पटरी पर आने लगी है। नोटबंदी का असर खत्म हो गया है और जीएसटी सामान्य कारोबार का हिस्सा हो गया है। गुजरात में जीत के बाद सरकार अब आर्थिक सुधार करेगी और अर्थव्यवस्था को मदद पहुंचाने वाले कदम उठाएगी। इतना ही नहीं, आने वाले बजट में कई ऐसी चीजें देखने को मिल सकती हैं, जिनसे जनता को फायदा होगा।
रिसर्च एजेंसी सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स ऐंड बिजनेस रिसर्च कंसल्टेंसी की 2018 की रिपोर्ट से पता चलता है कि नई टेक्नोलॉजी और तेल की गिरती कीमतों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ेगी। भारत की विकास दर अगले साल तेज हो जाएगी और उसका असर साफ दिखाई देगा।
कुछ आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत की जीडीपी की दर अगले साल सात फीसदी तक रह सकती है। लेकिन विश्व बैंक के ताजा सर्वेक्षण में कहा गया है कि 2018 में भारत की जीडीपी की प्रगति की दर 7.3 प्रतिशत रहेगी। उसका मानना है कि मध्यम काल में जीएसटी कॉरपोरेट्स का मददगार होगा। इससे उत्पादन लागत में कमी आएगी और देश में टैक्स वसूली बढ़ेगी, क्योंकि उसकी चोरी रुकेगी। इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा खर्च किए जाने का सकारात्मक असर भी दिखेगा। भारत की अर्थव्यवस्था चीन से अलग तरह की है।
उसकी पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था निर्यात पर निर्भर है और उसने बड़ी उत्पादन क्षमता तैयार की है, जिसे हर समय ग्राहकों की तलाश रहती है। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था घरेलू उपभोग पर आधारित है और उसे 55 करोड़ खरीदारों, उपभोक्ताओं का सहारा है। भारत का सर्विस सेक्टर और बड़ा होगा, जो अर्थव्यवस्था का सहारा होगा। यहां उत्पादन के बढ़ने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का आकार भी बढ़ेगा।
सरकारी निवेश के साथ-साथ अगर निजी निवेश में तेजी आती है, तो इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। निजी निवेश से देश में रोजगार भी बढ़ेगा और उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। आर्थिक उदारीकरण के दौर में हमने हजारों वर्षों से हमारा साथ दे रहे कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की और उसका नकारात्मक पहलू भी देखा।
लेकिन अब सरकार ने इस ओर ध्यान देना शुरू किया है। अगर इस क्षेत्र में पर्याप्त निवेश किया गया और किसानों की समस्या के हल की दिशा में काम किया गया, तो इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। कृषि क्षेत्र में निवेश करने और किसानों की समस्याओं को सुलझाने से विकास दर में अच्छी बढ़ोतरी होगी। अब तक यह सेक्टर उपेक्षित रहा है और समय आ गया है कि इसमें और निवेश किया जाए। किसानों की आय बढ़ेगी, तो इसका सीधा असर मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ेगा। किसानों की आर्थिक और तकनीकी मदद देश की अर्थव्यवस्था के हित में है। खेती में आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल इस दिशा में एक बड़ी चुनौती होगा।
कागज में देखने पर यह संभव लगता है कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। जो सपना 90 के दशक में देखा गया वह पूरा हो गया है, लेकिन अभी जो सपना देखा जा रहा है वह कैसे पूरा होगा? इस राह में बहुत सारी चुनौतियां हैं और सबसे बड़ी है निजी निवेश तथा खपत में भारी बढ़ोतरी।
यह इतना आसान भी नहीं हैं। उद्योगपति और निवेश तभी करेंगे, जब उन्हें इस बात का यकीन होगा कि उन्हें उसका फल मिलेगा। सरकार ने जीएसटी के रूप में टैक्स रिफॉर्म का बड़ा कदम उठाया है। इस तरह के कई कदम उठाने की जरूरत है। और विदेशी निवेशक भी तभी आएंगे, जब उनके लिए यहां काम करना आसान होगा। एक बड़ी चुनौती है बैंकिंग सेक्टर को सुधारना और उसे पूरी तरह से मजबूत बनाना। अभी यह एनपीए की मार से लड़खड़ा रहा है। सरकारी बैंकों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना बेहद जरूरी होगा, क्योंकि निजी निवेशकों को कर्ज बैंकों से ही मिलेगा। वैसे सरकार ने उन्हें एक बड़ा वित्तीय पैकेज भी दिया है।
लेकिन इन सबसे बड़ी चुनौती होगी राजनीतिक नेतृत्व की इच्छा शक्ति की। देश को आने वाले समय में सही दिशा देना एक बड़ी चुनौती होगा और उसके लिए जरूरी है कि राजनीतिक अस्थिरता न हो। राजनीतिक रूप से सुदृढ़ देश ही उन ऊंचाइयों पर पहुंच सकेगा।