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अपराध, न्याय और सजा का त्रिकोण

Thu, 12 Sep 2013 08:00 PM IST
कुमार प्रशांत
कुमार प्रशांत Updated Thu, 12 Sep 2013 08:00 PM IST
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Triangle of crime, justice and punnishment

एक ऐसे आदमी के लिए जो हमेशा से ही फांसी की सजा को खत्म करने के पक्ष में काम करता रहा है और जो आज भी इस सजा को खत्म किए जाने का हिमायती है, फांसी की मांग के समर्थन में लिखना कठिन काम है। लेकिन आज मैं वह कठिन काम करने बैठा हूं। मुझे लग रहा है कि दिल्ली गैंगरेप कांड के अपराधियों को अदालत चाहे जो सजा सुनाए, हमें इस मामले में मुख्य बात से भटकना नहीं चाहिए। भटकाव दो तरह का होता है; एक वह जब हम इसलिए भटकते हैं कि हमें रास्ता मालूम नहीं है; दूसरा वह जब हम इसलिए भटकते हैं कि हम सही रास्ते पर चलते हुए घबराते हैं। दोनों ही स्थितियों में परिणाम एक ही होता है- हम जाना चाहते कहीं हैं, पहुंचते कहीं हैं!

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हम साफ समझ लें कि किसी भी अपराध में सजा देने के पीछे मंशा क्या होती है- समाज को बदलना या व्यक्ति को बदलना या ऐसी परिस्थिति बनाना कि कोई अपराध करे ही नहीं। मुझे लगता है कि इसमें से कुछ भी, किसी भी सजा का हेतु नहीं होता है, या हम यह कहें कि सजा देकर हम इनमें से कुछ भी हासिल नहीं कर पाते हैं। आप एक सजा से एक व्यक्ति को काबू में कर सकते हैं, व्यापक समाज को काबू में नहीं कर सकते। सजा देने से इससे अधिक या इससे अलग कुछ प्राप्त होता हो, तो वह अवांतर उपलब्धि है, जो सजा के कारण नहीं, व्यक्ति की ग्रहणशीलता के कारण मिलती है। अपराध, न्याय और सजा का त्रिकोण बस इतनी ही जगह घेरता है।
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व्यक्ति असंभव संभावनाओं का पुतला है। इसलिए अपने विकास के क्रम में वह इस मुकाम पर पहुंचा कि अपराध की सजा ऐसी होनी चाहिए कि अपराधी मनुष्य की असीम संभावनाओं का अंत न हो जाए, बल्कि उसके साकार होने की संभावना बनी रहे। फांसी की सजा इस बुनियादी संभावना के खिलाफ जाती है, इसलिए इसका चलन खत्म होना चाहिए। अपराध हुआ, उसकी सजा हुई और अपराधी को एक लंबा कालखंड ऐसा मिला कि जिसमें वह बारंबार तन्हाई में, अपने किए पर विचार कर सके। संभव है कि उसकी चेतना उसमें प्रायश्चित के भाव जगा सके और वह एक बेहतर इन्सान बन सके।
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लेकिन एक पहलू और भी है और वह बहुत महत्वपूर्ण पहलू है। हम एक आदमी के खूनी होने और हिटलर के खूनी होने में फर्क क्यों करते हैं? इसलिए न कि एक ने उन्माद में अपराध किया है, जबकि हिटलर ने योजना बनाकर, लोगों को तिल-तिल जलाकर उन्हें खत्म करने का अपराध किया है। हिटलर का सबसे बड़ा अपराध विश्वयुद्ध छेड़ना नहीं है। उसका सबसे बड़ा अपराध खुद को छोड़ कर, दूसरे सारे मनुष्यों को तुच्छ समझने और उन्हें हीनतर अवस्था में पहुंचाकर, उन्हें मनुष्यता से नीचे गिराने में है। उसके अपराध की वीभत्सता और उसकी क्रूरता ऐसी है कि समाज में उसकी उपस्थिति सहन करना असंभव की हद तक कठिन है और जीवित हिटलर हमेशा ही दूसरों में हिंसक प्रवृत्ति को उभारने का कारण बना रहेगा। इसलिए कोई हिटलर, कोई फ्रैंको, कोई याह्या खान, कोई बिन लादेन अपने सारे अपराधों के बाद भी समाज में जीवित रहे, चले-बोले-हंसे तो यह मनुष्यता की ऊर्ध्वगामी यात्रा को बाधित करता है। ऐसे लोग मनुष्यता की पराजय के प्रतीक बन जाते हैं और इसलिए इनकी सजा का एक ही मकसद होता है- इन्हें समाज की चेतना से दूर करना!

बलात्कार भयंकर स्तर का मनोरोग है, जिसका इलाज सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर खोजना होगा। इसका इलाज ढूंढते समय हमें यह भी ध्यान में रखना ही होगा कि स्त्री-पुरुष के बीच शारीरिक आकर्षण और प्यार का जो रहस्यमय अंश है, वह मनुष्यगत है, अलौकिक है। हम व्यक्ति के स्तर पर भी और समाज के स्तर पर भी इतने अनुशासित व सांस्कृतिक नहीं हो पाए हैं कि काम-भावना का सौंदर्य समझ और जी सकें। इसलिए वह कुरूप व कामी बनकर यहां-वहां प्रकट होता रहता है।

अब हम दिल्ली गैंगरेप की तरफ आते हैं। ये चारों अपराधी, जिनके मुकदमे की इतनी चर्चा होती रही और जिन्हें मिलने वाली सजा को लेकर देश में एक बहस उठ खड़ी हुई है कि अदालत को क्या फैसला लेना चाहिए, बलात्कार के अपराधी भर नहीं हैं। एक लड़की के साथ जबर्दस्ती करना, उसका बलात्कार करना बीमार अपराधी का एक चेहरा है; पर एक लड़की को योजनापूर्वक जाल में फंसाना, उसे निरुपाय कर, उसकी शारीरिक मर्यादा को विच्छिन्न करते हुए, उससे दुर्व्यवहार करना और फिर उसकी हत्या कर डालने की नृशंसता दिखाना बीमार अपराधी का चेहरा नहीं, हत्यारे का चेहरा है। उसके मन में लड़की के प्रति ही नहीं, मनुष्य के प्रति श्रद्धा या सम्मान का भाव नहीं है। अब वह लड़की नहीं है, लेकिन लड़कियां तो हैं; वह लड़की नहीं है, लेकिन उसके परिजन तो हैं; वह लड़की नहीं है, लेकिन हम-आप तो हैं। सवाल यह है कि ये चारों अगर जीवित रहते हैं, समाज में आते-जाते हैं, तो क्या उसकी कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्तिश: और समूहत: हमारे मन पर होगी। इनका जिंदा रहना हमें बार-बार उस लड़की का और सारी ही लड़कियों का विद्रूप करता दिखाई देगा।


जेल में अपराधियों की जरखेज फसल पैदा होती है। हमारे अपराधी राजनेताओं ने जेल और समाज के बीच की दूरी इतनी कम कर दी है कि यह मानना कि आजीवन कारावास देना अपराधी को समाज से काट देना होता है, यथार्थ नहीं है। इनको फांसी देने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि अब समाज में इनकी जगह बची नहीं है। सुधारना, बदलना, प्रायश्चित का मौका देना आदि बातों से अलग, इस मामले में इनको दृश्य से हटा देना ही एकमात्र रास्ता बचता है। ईश्वर से हम यह भी कहें कि हे परमपिता परमेश्वर, हमें माफ करना, क्योंकि हम नहीं जानते हैं कि हमें ऐसे मामलों में दूसरा क्या करना चाहिए।

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