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परंपरा और आधुनिकता दो संघर्षरत ध्रुव नहीं, हमें तलाशने होंगे अंतःसंवाद एवं अंतःसंबंध

Sun, 01 Sep 2019 01:08 AM IST
बद्री नारायण बद्री नारायण
बद्री नारायण Published by: बद्री नारायण Updated Sun, 01 Sep 2019 01:08 AM IST
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Tradition and modernity are not two struggling poles  We need to explore interconnection
मौखिक इतिहास को दर्ज (रिकार्ड) करने की परंपरा को भी फिर से शुरू करने के भी निर्देश - फोटो : Demo Pic.

कहते हैं कि ज्ञान की दुनिया शक्ति से परे होती है। सत्ता एवं शक्ति का ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता। किंतु अब नए शोधों से लगभग साबित हो चला है कि शक्तिवान ज्ञान की दुनिया पर भी शासन करता है या यों कहें, शक्ति ज्ञान संरचना के पूरे ढांचे को गहरे प्रभावित करती है।


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कहते हैं कि ज्ञान की दुनिया शक्ति से परे होती है। सत्ता एवं शक्ति का ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता। किंतु अब नए शोधों से लगभग साबित हो चला है कि शक्तिवान ज्ञान की दुनिया पर भी शासन करता है या यों कहें, शक्ति ज्ञान संरचना के पूरे ढांचे को गहरे प्रभावित करती है।

उपनिवेशवाद ने पश्चिम को शक्तिवान बनाया। अतः पश्चिम को सिद्धांतों का जनक माना जाता है। माना जाता है कि समाज विज्ञान एवं विज्ञान की दुनिया में पश्चिम सिद्धांत रचता है और हम लोग पूरब के वासी या एशियाई मूल्कों के निवासी, उस सिद्धांत रचना के लिए अपने शोधों से आंकड़े उपलब्ध कराने का काम करते हैं। 

अर्थात समाज विज्ञान की दुनिया में भारतीय समाज विज्ञानी दोयम दर्जे के माने जाते हैं। हालांकि पिछले कई दशकों में भारतीय समाज विज्ञानी जो पश्चिम के विश्वविद्यालयों में कार्यरत हैं, सिद्धांत रचना में भी लगे हैं। अमर्त्य सेन, रणजीत गुहा, गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक, दीपेश चक्रवर्ती का नाम उत्तर औपनिवेशिक सिद्धांतकारों, चिंतकों एवं विचारकों के रूप में अत्यंत आदर से लिया जाता है।

पश्चिमी चिंतक देरिदा, या ओरियन्टलिज्म से जुड़े अनेक विद्वान हालांकि भारतीय चिंतन के स्रोतों को अपनी सिद्धांत रचना में महत्वपूर्ण सिद्धांत उत्तक के रूप में उपयोग करते हैं। वे लोग बौद्ध चिंतक नागार्जुन या अनेक अन्य वैशेषिक चिंतकों से अपनी ज्ञान रचना के क्रम में संवाद करते दिखते हैं। किंतु हम लोग औपनिवेशिक पराधीनता के कारण ऐसी आत्मग्लानि से भरे हैं कि अपने ही ज्ञान स्रोतों के महत्व को या तो समझते नहीं या समझना नहीं चाहते।

प्राक् औपनिवेशिक भारत में सिद्धांत रचना एवं ज्ञान रचना का काम उच्च स्तर का था, तब भारतीय ज्ञान की सैद्धांतिकी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती थी। किंतु उपनिवेशवाद ने आने के बाद हमारी ऐसी मानसिक दशा बनाई कि हम एक ऐसे एम्नेसिया का शिकार हो गए, कि अपने ही ज्ञान शक्ति को भूल गए। आज जब देरिदा बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन के सिद्धांतों की चर्चा करते हैं या हमारे शून्यवाद के विमर्शों को जब पश्चिमी चिंतक महत्व देते हैं तब उनके महत्व का हमें पता चलता है।

भारतीय दार्शनिक जगत में बौद्ध दार्शनिकों जैन चिंतकों, वैदिक विमर्शकारों न्याय वैशेषिक सिद्धांतकारों ने तर्क, अनुभूति, ज्ञान इन्टीयूशन, के आधार पर अनेक सिद्धांत प्रतिपादित किए, जिन्हें हम जानते भी नहीं हैं।

सयास या अनायास रूप से भारत के नए शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक बार-बार भारतीय ज्ञान सिद्धांतों पर बहस छेड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिन पर थोड़ा रुककर सोचने के बजाय उन्हें खारिज करने की प्रवृति हममें बढ़ती जा रही है। उन्होंने भारतीय ज्ञान विमर्श में न्यूटन के पूर्व गुरुत्वाकर्षण विमर्श के मौजूद होने की बात कही तो उस पर अनेक नकारात्मक प्रतिक्रियाएं आईं। 

जबकि अगर भारतीय पारंपरिक ज्ञान कोषों को देखें तो वहां भी न्याय वैशेषिक विमर्शों में गुरुत्वाकर्षण विमर्श न्यूटन के सिद्धांत के काफी पहले से ही मौजूद रहा है। सिद्धांत शिरोमणि गोलाध्याय भुवन कोश-6 में एक प्रसंग है-भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती उनसे पूछती हैं-यह पृथ्वी किस पर टिकी हुई है। तो वह बताते हैं-अगर कोई कहता है कि यह पृथ्वी शेषनाग के फण, कछुआ या हाथी की पीठ पर टिकी हुई तो गलत कहता है। 

अगर यह मान भी लिया जाए कि यह पृथ्वी किसी वस्तु पर टिकी है, तो प्रश्न उठता है कि वह वस्तु किस पर टिकी है और इस प्रकार कारण का कारण, फिर उसका कारण। अगर यह क्रम चलता रहा, तो इसे न्याय शास्त्र में अनावस्था दोष कहते हैं। वह कहते हैं, यह पृथ्वी अपने ही बल से टिकी है। इसे अगर धारणित्मका शक्ति मानें, तो क्या दोष है। न्यूटन के 550 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य कहते हैं-‘वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है।’ 

वह कहते हैं, पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है। यह सिद्धांत चर्चा भारतीय पारंपरिक ग्रन्थों में न्यूटन के उद्भव के 550 वर्ष पूर्व वर्णित है। इस प्रकार अनेक भारतीय दार्शनिक विमर्शों में हमें उस सैद्धांतिकरण के दर्शन होते है, जिन्हें आधुनिक खोजों की ज्ञानगर्भस्थली माना जा सकता है। पश्चिम ने अपने सिद्धांतों को ठोस एवं प्रत्यक्ष दिखने वाले स्थूल प्रमाणों से पुष्ट किया, भारतीय एस्ट्रोनोमी पद्धति ने भी अपनी वेधशालाओं के माध्यम से खगोलीय ज्ञान विकसित किया था। आर्यभट्ट ने आज से 1,500 वर्ष पूर्व पटना वेधशाला में कार्य कर अनेक निष्कर्ष निकाले थे।

भारतीय दार्शनिक एवं सैद्धांतिक निष्कर्षों में आज जो आधुनिक विमर्श है, उसका संपूर्ण तो नहीं पाया जा सकता, परंतु उनके बीज सूत्र अवश्य मिल सकते हैं। हमें आधुनिकता एवं परंपरा में बनाम एवं विरुद्ध के संबंध नहीं खोजने चाहिए। बल्कि उनमें निहित पूरकता की तलाश करनी चाहिए। परंपरा एवं आधुनिकता में हमें अंतः संवाद स्थापित कर ज्ञान विमर्श को आगे बढ़ाने की जरूरत है। 

जबकि हमने परंपरा एवं आधुनिकता को दो ध्रुव बना दिए हैं एवं अपने को दो संघर्षरत ध्रुवों में बांटकर भारतीय समाज में ज्ञान को अपनी संपूर्णता में पल्लवित होने की दिशा को अवरुद्ध करते जा रहे हैं। बनाम खोजने की ऐसी प्रवृति से मुक्त हो हमें आधुनिकता एवं परंपरा में अंतःसंवाद एवं अंतःसंबंध तलाशने होंगे।
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