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आर्थिक प्रभुत्व की ओर : जीडीपी की विकास दर की निरंतर बनी रहे, तब आराम से आत्मनिर्भर हो जाएगा भारत

Tue, 06 Sep 2022 07:35 AM IST
Ajay Bagga अजय बग्गा
Updated Tue, 06 Sep 2022 07:35 AM IST
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सार
आत्मनिर्भर भारत, मुद्रा ऋण, मेक इन इंडिया फॉर वर्ल्ड जैसी क्षेत्रवार लक्षित उत्पादन संबंधी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं और रक्षा एवं उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों में आयात प्रतिस्थापन जैसी पहलों ने भविष्य के लिए एक मजबूत विकास मंच तैयार किया है।
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Towards economic dominance: If growth rate of GDP remains constant, India will become self-reliant comfortably
भारतीय अर्थव्यवस्था

विस्तार

वित्त वर्ष 2022-23 की अप्रैल-जून की तिमाही में देश की सकल घरेलू विकास (जीडीपी) दर 13.5 फीसदी हो गई, जो पिछली चार तिमाहियों में सबसे तेज है। विकास दर में यह तेज वृद्धि कृषि एवं विनिर्माण में सुधार तथा सेवा क्षेत्र के लगभग पूरी तरह से खुल जाने के कारण हुई है। हालांकि, यह वृद्धि अब भी रिजर्व बैंक के हालिया पूर्वानुमान (16.2 फीसदी) से कम है। 51 अर्थशास्त्रियों वाले रॉयटर्स सर्वेक्षण में भी अपने यहां पहली तिमाही में 15.2 फीसदी सालाना विकास दर की भविष्यवाणी की गई थी। 



इसलिए 13.5 फीसदी का आंकड़ा भले मजबूत दिख रहा हो, लेकिन रिजर्व बैंक एवं बाजार की उम्मीदों से कम है। पिछले साल इसी अवधि में भारत की जीडीपी में 20.1 फीसदी की वृद्धि हुई थी। यह काफी हद तक कोविड-19 और लॉकडाउन के कारण कम आधार रखे जाने के कारण था। इसके चलते अप्रैल-जून 2020 में जीडीपी में -23.8 फीसदी की बहुत तेज गिरावट देखी गई। इस संख्या को संदर्भ में रखने के लिए, आइए, कोविड पूर्व जीडीपी की तुलना जीडीपी पर कोविड के तीन वर्षों के प्रभाव से करते हैं। 


अप्रैल से जून, 2018 के दौरान जीडीपी 33.82 लाख करोड़ रुपये थी। यह अप्रैल से जून, 2019 में बढ़कर 35.49 लाख करोड़ रुपये हो गई। जैसे ही कोविड लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया, अप्रैल से जून, 2020 के दौरान जीडीपी तेजी से गिरकर 27.04 लाख करोड़ रुपये रह गई। अप्रैल से जून, 2021 में जीडीपी 32.46 लाख करोड़ रुपये थी। यह कोविड लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था में मजबूती का संकेत था। हालांकि, इस अवधि के दौरान महामारी की दूसरी लहर अपने चरम पर थी और इसका आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। 

इस वर्ष अप्रैल से जून तक जीडीपी 36.85 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। हम जिस 13.5 फीसदी की बात कर रहे हैं, यह वही है। यदि हम वर्ष 2018 से इसकी तुलना करें, तो हमने चार वर्षों में कुल 8.9 फीसदी वृद्धि देखी है। यदि 2019 से तुलना करें, तो हमने तीन वर्षों में कुल 3.8 फीसदी की वृद्धि देखी है। तीन वर्षों के बाद यह पहली बार है, जब अर्थव्यवस्था कोविड लॉकडाउन के झटके से उबरी है। कुल मिलाकर, 2019-2022 की तुलना में 3.8 फीसदी वृद्धि के साथ, हमने कोविड के कारण अर्थव्यवस्था में तीन साल की वृद्धि खो दी है। 

अगर हम इन वर्षों के उतार-चढ़ाव को नजर अंदाज करें और 2019 से 2022 की तुलना करें, तो यह पिछले तीन वर्षों में 1.2 फीसदी सालाना से कम की वृद्धि में तब्दील हो जाता है। यह 1.2 फीसदी की वृद्धि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था में गरीबी घटाने और कल्याणकारी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोविड महामारी का प्रभाव स्पष्ट रूप से बहुत ज्यादा रहा है। केंद्र सरकार ने व्यापार सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) बढ़ाने के लिए कई प्रशंसनीय पहल की हैं। इससे विनिर्माण एवं निर्यात क्षेत्र में तेजी आई है। 

आत्मनिर्भर भारत, मुद्रा ऋण, मेक इन इंडिया फॉर वर्ल्ड जैसी क्षेत्रवार लक्षित उत्पादन संबंधी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं और रक्षा एवं उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों में आयात प्रतिस्थापन जैसी पहलों ने भविष्य के लिए एक मजबूत विकास मंच तैयार किया है। कृषि के मोर्चे पर भी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मुफ्त खाद्यान्न सुरक्षा तथा उच्च उर्वरक व खाद्य सब्सिडी के साथ-साथ उच्च एमएसपी और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिये क्षेत्रीय विकास में मदद मिली है। 

राजस्व के मोर्चे पर, जीएसटी और प्रत्यक्ष कर-दोनों ने बेहतर अनुपालन, कम रिसाव और अंतर्निहित अर्थव्यवस्था में सुधार के आधार पर अच्छी वृद्धि दिखाई है। प्रत्यक्ष कर ने, जिसमें व्यक्तिगत कर के साथ कॉरपोरेट कर भी शामिल हैं, मौजूदा वित्त वर्ष में तेज वृद्धि दिखाई है। सरकार द्वारा इस वर्ष अपने कर संग्रह लक्ष्य को पार करने की उम्मीद है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को देखें, तो चीन की सुस्ती, यूरोप में आसन्न मंदी की आशंका और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सुस्ती भी भविष्य में भारत की जीडीपी को प्रभावित करने वाली है। 

पिछले पांच महीनों में दुनिया भर के 65 से अधिक केंद्रीय बैंकों द्वारा 90 से अधिक बार ब्याज दरों में 0.5 फीसदी से अधिक की वृद्धि की गई है। मौद्रिक तंगी, बढ़ती मुद्रास्फीति, मजबूत अमेरिकी डॉलर के कारण अन्य मुद्राओं में गिरावट और भू-राजनीतिक जोखिमों ने वैश्विक विकास को प्रभावित किया है। भारत में, घरेलू मांग दूसरी तिमाही में एक प्रमुख चालक थी। कोविड से निजी खपत में आई गिरावट में सुधार हुआ है। सरकारी पूंजीगत व्यय ने निश्चित निवेश वृद्धि में मदद की है। 

कॉरपोरेट बैलेंस शीट में सुधार हुआ है और बैंकों ने अपने एनपीए को साफ किया है। बेहतर निर्माण गतिविधि, मजबूत आवास मांग, व्यापार, होटल, परिवहन और संचार क्षेत्र जैसी संपर्क वाली सेवाओं में सुधार के साथ सेवा क्षेत्र ने बेहतर प्रदर्शन किया। भारत वर्ष 2022 की पहली तिमाही में ब्रिटेन को पछाड़ते हुए दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। यह गणना अमेरिकी डॉलरों पर आधारित है, और आईएमएफ के जीडीपी के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने पहली तिमाही में अपनी बढ़त बढ़ा ली है। 

पिछले आठ वर्षों से सरकार की विकास समर्थक नीतियां एक ऐसा मंच तैयार कर रही हैं, जिसे हाल ही में मैकिन्से के एक वरिष्ठ अधिकारी ने 'भारतीय सदी' बताया है। लेकिन अगले 12 महीनों में वैश्विक मंदी के साथ, भारत को भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। आवास, स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा और अवसरों के उच्च स्तर के सामाजिक संकेतकों का आनंद लेने वाले समृद्ध नागरिकों के साथ एक आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए अब तक की गई सभी प्रगति नाकाफी है। 

अगले दो वर्ष उतने ही चुनौतीपूर्ण होंगे, जितने पिछले दो साल कोविड के कारण आई गिरावट से उबरने में रहे हैं। हम वैश्विक कारकों और समग्र रूप से सख्त वित्तीय स्थितियों के कारण अगले वर्ष में जीडीपी में साल-दर-साल गिरावट देख सकते हैं। लेकिन यह आजादी के अमृत महोत्सव में भारत के खोए हुए आर्थिक प्रभुत्व को पुनः प्राप्त करने की यात्रा है। यह रुकेगी नहीं, बल्कि और रफ्तार पकड़ेगी। यह भारतीय सदी होगी।

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