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टॉयलेट : एक विवाह कथा

Wed, 22 Feb 2017 08:16 PM IST
मनीषा सिंह
मनीषा सिंह Updated Wed, 22 Feb 2017 08:16 PM IST
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Toilet: A Marriage Fiction
मनीषा सिंह

हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के मौलवियों-मुफ्तियों ने मुस्लिम घरों में विवाह के लिए शौचालय की उपस्थिति को एक अनिवार्य शर्त बना दिया है। हाल ही में, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने मुसलमानों के लिए जरूरी बनाई गई इस शर्त को देश के अन्य हिस्सों में भी जल्द लागू करने की बात कही है। गुवाहाटी में आयोजित एक स्वच्छता कांफ्रेंस में किए गए इस आह्वान से कुछ दिन पहले हरियाणा के मेवात इलाके में 110 गांवों के मौलवियों ने शौचालय की शर्त के साथ निकाह के वक्त डीजे बजाने या नशे का इस्तेमाल पर प्रतिबंध को भी जरूरी बना दिया है।

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ऐसे हालात में जब, आज भी देश के हजारों गांवों में लाखों-करोड़ों महिलाएं और बच्चे, बूढ़े, जवान- सभी साफ-सुथरे शौचालय को मोहताज हैं, टॉयलेट को शादी की शर्त से जोड़ना तर्कसंगत लगता है। खासकर इसलिए कि घरों में इसकी कमी सबसे ज्यादा महिलाओं के लिए तकलीफदेह होती है। उन्हें इस मजबूरी के चलते खुले में शौच जाने पर कई यौन अपराधों और बीमारियों का सामना करना पड़ता है।
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निस्संदेह गांव-देहात में शौचालयों की कमी का प्रमुख कारण गरीबी है। मजदूरी करने वाले गरीबों के लिए घर में शौचालय बनवाना उनकी प्राथमिकता में नहीं आता है। हाथ आए पैसे को वे पहले अच्छे भोजन-पानी, इलाज, कपड़े व शादी-ब्याह और बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं। यह बात उन्हें समझ में नहीं आती कि घर में शौचालय बनवाना लग्जरी नहीं है, बल्कि ऐसी जरूरत है जिसकी अनदेखी उन्हें कई बीमारियों और खतरों की तरफ धकेलती है। मलेरिया और हैजा जैसी तमाम बीमारियों की जड़ में शौचालय व साफ-सफाई का अभाव मूल कारण है, पर इस ओर लोगों का ध्यान नहीं है।
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अनेक अध्ययनों में भी यह बात बार-बार सामने आई है कि ग्रामीण महिलाएं दिन में शौच और मूत्र विर्सजन आदि से बचने के लिए बेहद कम मात्रा में पानी पीती हैं, ताकि उन्हें शौचालय जाने की जरूरत ही नहीं पड़े। कम पानी पीने की प्रवृत्ति उन्हें कई संक्रमणों और यूरिनरी समस्याओं की गिरफ्त में ले आती है। किशोरावस्था में ज्यादातर ग्रामीण और कस्बाई लड़कियां अपनी पढ़ाई इसलिए अधूरी छोड़ देती हैं, क्योंकि स्कूलों में अलग से लड़कियों के लिए शौचालय नहीं होते। यदि वहां शौचालय होते हैं, तो वे या तो गंदे होते हैं या ऐसी जगह पर होते हैं, जहां स्कूल के बाहर के लोगों का भी प्रवेश हो सकता है।

छोटी-मोटी फैक्टरियों के मालिक तो अमूमन अलग महिला शौचालय की कोई व्यवस्था करते ही नहीं हैं। यदि वे महिला शौचालय बनवाते भी हैं, तो जरूरी नहीं कि वे महिला कर्मचारियों की जरूरतों के मुताबिक साफ और सुरक्षित हों। नियोक्ता इसलिए ऐसा नहीं करते, क्योंकि सरकारों ने उन्हें इसके लिए कड़े नियम-कानूनों में बांधा नहीं है।


जन-जागरूकता का अभाव भी लोगों को शौचालयों के निर्माण पर खर्च से रोकता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस पर किए गए निवेश के बदले उन्हें कुछ नहीं मिलता है। लेकिन जब यह जागृति लोगों में आएगी कि घरों में अच्छे शौचालय होने का मतलब कई बीमारियों से बचाना और महिलाओं को सुरक्षित माहौल देना है, तो मुमकिन है कि वे घरों में शौचालय बनवाएं। हैरानी की बात है कि इधर जब धर्मगुरु ऐसी शानदार पहल और अपीलें कर रहे हैं, तो राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के दौरान किसी भी राजनीतिक पार्टी ने शौचालय की कमी को चुनावी मुद्दे के रूप में उठाने की कोशिश तक नहीं की।

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