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कोमल और सरस बनकर सेवा

Mon, 06 May 2013 11:11 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Mon, 06 May 2013 11:11 PM IST
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to serve as tender and succulent

कहा जाता है कि जिस वृक्ष में अधिक फल होता है, वह अधिक झुका होता है। वाकई अगर हम दूसरों का मान-सम्मान करते हैं, तो देश-समाज में ऊंचा मुकाम पाते हैं। इसी से जुड़ा एक प्रसंग चीन के दार्शनिक कंफ्यूशियस का है।

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उनके आखिरी क्षणों में अनेक शिष्य अंतिम दर्शन के लिए उनके पास पहुंचे। उन्होंने अपने प्रमुख शिष्य को शैया के पास बुलाया तथा अपना मुंह खोलकर पूछा, देखो मुंह में जीभ है या नहीं? शिष्य ने उत्तर दिया, हां है।
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उन्होंने दूसरा प्रश्न पूछा, बताओ कि मेरे मुंह में दांत हैं या नहीं? शिष्य ने खुला हुआ पोपला मुंह देखकर कहा, दांत तो एक भी नहीं है। कंफ्यूशियस ने कुछ क्षण रुककर कहा, जीभ मेरे पैदा होने के समय थी और आज भी साथ है। दांत बाद में आए और आज एक भी दांत मेरे मुंह में नहीं हैं। इसका कारण जानते हो?
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कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने स्वयं बताया, जीभ कोमल और मीठी वाणी बोलने वाली है। इसलिए यह जीवन के अंतिम क्षणों तक भोजन-पानी से शरीर को पुष्ट करती रहती है और शरीर का अभिन्न अंग बनी रहती है।


दांत कठोर पदार्थ के बने होते हैं, इसलिए वह बत्तीस होते हुए भी शरीर का अभिन्न अंग नहीं बन पाते हैं। इससे यही शिक्षा मिलती है कि तुम सभी जीभ की तरह कोमल और सरस बनकर अंतिम समय तक अपने देश और समाज की सेवा करते रहो। शिष्य ने करबद्ध हामी भरी।

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