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नफरत से निपटने की परीक्षा

Mon, 18 Feb 2019 06:06 PM IST
Nootan Gupta प्रदीप कुमार
प्रदीप कुमार Published by: Nootan Gupta Updated Mon, 18 Feb 2019 06:06 PM IST
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time to face hate
पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद

पाकिस्तान जैसे अड़ियल और नफरत से भरपूर पड़ोसी से परंपरागत तरीकों से नहीं निपटा जा सकता। खासकर तब, जब वह एटमी हथियारों से लैस है। भारत को भी पाकिस्तान की तरह दीर्घकालीन योजना पर काम करना पड़ेगा। 

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पाकिस्तान जैसे अड़ियल और नफरत से भरपूर पड़ोसी से परंपरागत तरीकों से नहीं निपटा जा सकता। खासकर तब, जब वह एटमी हथियारों से लैस है। भारत को भी पाकिस्तान की तरह दीर्घकालीन योजना पर काम करना पड़ेगा। 


कश्मीर के पुलवामा जिले में जम्मू-श्रीनगर हाइवे पर सीआरपीएफ के दस्ते पर मानव बम से हमले या पाकिस्तान की ओर से संचालित अन्य आतंकी कार्रवाइयों के बारे में यह भ्रम कभी नहीं होना चाहिए कि 'कश्मीर मसले के राजनीतिक हल' के लिए पाकिस्तान अथवा उसके स्थानीय एजेंटों से बातचीत शुरू कर दें, तो यह सब रुक जाएगा। बातचीत तो कई बार विभिन्न स्तरों पर हो चुकी है।

पाकिस्तान को सख्त सबक सिखाने से पहले सोचना होगा कि 1971 से बड़ा सबक और क्या हो सकता है। कारगिल का सबक तो उसके आगे बहुत मामूली था। भारत की इन कार्रवाइयों से पाकिस्तान ने कुछ नहीं सीखा, तो 'सर्जिकल स्ट्राइक' या ऐसी ही अन्य स्ट्राइकों से नहीं सुधर सकता।

मसूद अजहर को यकीन है कि एक दिन न सिर्फ कश्मीर, बल्कि उसके बहुत आगे तक जेहादियों का परचम फहराएगा। जैश और इस जैसी अन्य जेहादी जमातों की संरक्षक पाकिस्तानी फौज है। बात सिर्फ इतनी नहीं है कि अपने भारत-विरोधी सामरिक हितों की पूर्ति में फौज इन संगठनों का इस्तेमाल करती है। इससे भी ज्यादा अहम है वैचारिक साम्य।

सैंडहर्स्ट में प्रशिक्षित, ब्रिटिश परंपरा में ढले, जनरल अयूब खान ने 1965 में कश्मीर छीनने के मकसद से हमला करने से पहले यकीन जताया, 'आम तौर से हिंदू मनोबल एक-दो सख्त चोटों के बाद बिखर जाएगा।' अयूब को अपने रणकौशल पर इतना भरोसा था कि सेनाध्यक्ष और विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को लिखित निर्देश दिया, 'ऐसी कार्रवाई करें कि कश्मीर का मुद्दा ज्वलंत हो उठे, भारत का संकल्प कमजोर हो जाए और युद्ध भड़के बगैर वह बातचीत की मेज पर आ जाए।' यह थे बड़े मियां। छोटे मियां भुट्टो सुभान अल्लाह! 'सोशलिस्ट' भुट्टो ने हजार साल की जंग का एलान कर डाला। 

यह वही जहरीली जहनियत थी, जो ढाका में घुटने टेकने से पहले पाकिस्तानी जनरलों को कोलकाता पर कब्जा करने का ख्वाब दिखा रही थी। पाकिस्तान की सैनिक मामलों की मशहूर लेखिका नसीम जेहरा ने हाल में प्रकाशित अपनी किताब फ्रॉम कारगिल टु द कू : इवेंट्स दैट शुक पाकिस्तान में लिखा है, कारगिल के नियोजकों को विश्वास था कि नियंत्रण रेखा के पार विस्तारित ऑपरेशन से बड़े स्तर पर सामरिक ऊंचाइयां पाकिस्तान के हाथ आ जाएंगी।

जितनी अधिक भूमि पर कब्जा होगा, भारत से वार्ता के दौरान उतना ही कूटनीतिक और राजनीतिक लाभ हासिल किया जा सकेगा। हिसाब बड़ा सरल था-भारत पाकिस्तानी सैनिकों को सामरिक ऊंचाइयों से बेदखल नहीं कर पाएगा। पाकिस्तानी अफसरों को यकीन था कि भारत रक्षात्मक युद्ध भी नहीं लड़ पाएगा। मेजर जनरल जावेद हसन ने कहा, डरपोक हिंदुस्तानी जंग नहीं लड़ पाएंगे।

नफरत और हिकारत ने पाक फौजी अफसरों को किस तरह दिमागी लकवे से ग्रस्त कर रखा है, इसकी मिसाल पेश करती हुई नसीम जेहरा लिखती हैं, कारगिल के नियोजक मानकर चल रहे थे कि जब हिंदुस्तानियों को पता चलेगा कि पाकिस्तानी सैनिक नियंत्रण रेखा के इस पार आ चुके हैं और लेह में भारतीय सेना की जीवनरेखा को नियंत्रित कर रहे हैं, तो भारत आत्मसमर्पण का मन बना लेगा और पाकिस्तान की शर्तों पर समझौते के अलावा उसके सामने और कोई रास्ता नहीं होगा।

तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने कहा, 'हम हिंदुस्तानियों को समझते हैं। ज्यादा से ज्यादा दबाव में ही वे गंभीर बातचीत के लिए तैयार होंगे।' चीफ ऑफ जनरल स्टॉफ ले.ज. अजीज खान ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से कहा, 'जनाब, कायदे आजम और मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान को कायम किया। अब अल्लाह ने आपको मौका दिया है कि फतह-ए-कश्मीर के लिए आप का नाम सुनहरे हरूफ में लिखा जाए।' अटल बिहारी वाजपेयी से दोस्ती की पींग बढ़ाने वाले नवाज ने भी इस पर यकीन कर लिया।         

जिन्ना और अयूब से लेकर आज तक पाकिस्तान के सैनिक-असैनिक कर्णधारों के चिंतन में एक निरंतरता है। पाकिस्तानी फौज के ब्रिगेडियर एसके मलिक ने अपनी नीति-निर्देशक पुस्तक द कुरानिक कंसेप्ट ऑफ वार में जो भी लिखा, वह पाक अफसरों के लिए अंतिम सत्य है, हालांकि यह मौलिक चिंतन नहीं है।

करीब 2,300 साल पहले चीन के युद्ध विचारक सुन ने लिखा था कि दुश्मन के दिल को इतना आतंकित कर दो कि वह जंग लड़े बिना हथियार डाल दे। पाकिस्तानी सेना का वैचारिक योगदान यह है कि दुश्मन को कमतर साबित करने के लिए अपनी हर शिकस्त पर मोटा पर्दा डालकर झूठ बोलते रहो। जैसे, 1965 में फतह पाकिस्तान की हुई, 1971 में भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में अवामी लीग की मदद से मौके का फायदा उठाया और जनरल नियाजी हिम्मत हार बैठे, वर्ना पाकिस्तान हारता नहीं और कारगिल में नवाज शरीफ की 'गद्दारी' से पाकिस्तान जीती हुई बाजी हार बैठा।
 
ऐसे अड़ियल और नफरत से भरपूर पड़ोसी से परंपरागत तरीकों से नहीं निपटा जा सकता। खासतौर से जब वह एटमी हथियारों से लैस हो। भारत सरकार ने तात्कालिक प्रतिक्रिया सशस्त्र सेनाओं पर छोड़ दी है। यह प्रतिक्रिया जो भी होगी, पाकिस्तान को मुस्तकिल सीख के लिए पर्याप्त नहीं होगी। निर्णायक सीख के रास्ते में पाकिस्तान के एटमी हथियार कब तक अवरोधक बने रहेंगे?

अंतर महाद्वीपीय एटमी मिसाइलों से लैस रेजमेंटें सोवियत संघ के विघटन को नहीं रोक पाईं। पाकिस्तान किस खेत की मूली है! उसने दीर्घकालीन योजना के तहत जैश-ए-मोहम्मद जैसी स्ट्राइक कोरों का गठन कर रखा है। भारत को भी दीर्घकालीन योजना पर काम करना पड़ेगा।

वैसे भी फैसलाकुन जंग नियंत्रण रेखा पर नहीं, उस पार अंदरूनी इलाकों में करनी होगी। यह भारत की समस्त राज्यसत्ता पर निर्भर है कि वह अपनी समग्र राष्ट्रीय शक्ति का इस्तेमाल कितने कौशल और केंद्रित तरीके से कर पाती है। नहीं कर पाएगी, तो हजार जख्मों से भारत का खून रिसाने का दुश्चक्र चलता रहेगा। 
 
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