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सियायत: जम्मू-कश्मीर में नई शुरुआत का समय, पूर्ण राज्य और समग्र विकास की दिशा में बढ़ने का वक्त

Wed, 09 Oct 2024 04:48 AM IST
राहुल कुमार शेखर अय्यर
शेखर अय्यर Published by: राहुल कुमार Updated Wed, 09 Oct 2024 04:48 AM IST
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सार
सफल चुनावों के बाद अब जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य और समग्र विकास की दिशा में आगे ले जाने का समय है।  
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Time for a new beginning in Jammu and Kashmir move towards full statehood and development
उमर अब्दुल्ला - फोटो : एजेंसी

विस्तार

दस वर्ष बाद जम्मू-कश्मीर में हुए विधानसभा चुनाव के बाद अब वहां जल्द नई सरकार का गठन होगा। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन को बहुमत मिला है। भाजपा बेशक जम्मू-कश्मीर में सरकार नहीं बना पा रही है, लेकिन पिछले दिनों हुई तमाम आतंकी वारदात के बावजूद जम्मू-कश्मीर में सफलतापूर्वक चुनाव करा कर सरकार ने एक संदेश तो दिया ही है, यहां के लोगों ने प्रचंड बहुमत का उपयोग कर भारतीय लोकतंत्र पर मुहर भी लगाई है। उल्लेखनीय है कि पहली बार यहां अनुसूचित जातियों के लिए सात और अनुसूचित जनजातियों के लिए नौ सीटें आरक्षित की गईं। हालांकि, भाजपा को उम्मीद थी कि केंद्र सरकार की ओर से किए गए विकास कार्यों का उसे फायदा मिलेगा, लेकिन हैरत नहीं होनी चाहिए कि कश्मीर घाटी के लोग उसे स्वीकारने के मूड में नहीं दिखे।


जम्मू हमेशा से भाजपा का गढ़ रहा है, लेकिन घाटी के लोगों ने हमेशा से भाजपा से इतर दलों को ही प्राथमिकता दी है। महबूबा मुफ्ती की पीडीपी को नकारने के पीछे के कारण उनके बयान और भाजपा के साथ पूर्व में किया गया गठबंधन है। फिलहाल की स्थितियों में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य तक खुद को पहुंचाने के लिए घाटी के लोगों के सामने नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस को जिताने का ही विकल्प मौजूद था। यही वजह थी कि उन्होंने छोटे निर्दलीय दलों को नकार कर सबसे बड़े दलों को वोट किए।


2014 में हुए जम्मू-कश्मीर के चुनाव के नतीजों को देखें, तो पीडीपी ने 28, भाजपा ने 25, नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 15 और कांग्रेस ने 12 सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि भाजपा को सबसे ज्यादा 22.98 फीसदी वोट मिले थे, जबकि पहले नंबर पर रही पीडीपी को 22.67 फीसदी मत मिले थे। इस बार के परिणामों में भी यही हुआ है। भाजपा की चार सीटें बढ़कर 29 हो गई हैं, जबकि उसका वोट प्रतिशत 25.64 फीसदी रहा है। दूसरी ओर नेशनल कॉन्फ्रेंस 42 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी है, लेकिन उसका वोट प्रतिशत 23.43 प्रतिशत ही है। भाजपा को ये सीटें जम्मू क्षेत्र से ही मिली हैं, पिछली बार भी उसे जम्मू क्षेत्र से ही सीटें मिली थीं। पिछले चुनावी नतीजो पर नजर डालें, तो जम्मू-कश्मीर में भाजपा का जनाधार लगातार बढ़ रहा है। 2009 में वह 11 सीटें ही जीती थी, उसका वोट प्रतिशत भी बढ़ रहा है, लेकिन भाजपा को घाटी में कोई आशातीत सफलता नहीं मिल पा रही।

गौरतलब है कि संसद ने जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 पारित कर जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बना दिया था। ऐसे में चुनी हुई सरकार से ज्यादा शक्तियां उपराज्यपाल के पास होंगी। जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव का परिणाम यही दर्शाता है कि वहां की जनता अब एक स्थिर सरकार चाहती है, जो उनके विकास के लिए काम करे।

ऐसे वक्त में, उमर अब्दुल्ला प्रमुख रूप से उभरे हैं, जो 2009 से 2015 तक छह वर्ष राज्य के मुख्यमंत्री रहे। अब संभावना है कि वह केंद्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। भले ही उनकी पार्टी ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अुनच्छेद 370 को भावनात्मक मुद्दा बनाया हो, लेकिन हर कोई जानता है कि 370 की वापसी अब संभव नहीं। ऐसे में जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए जरूरी है कि उमर अब्दुल्ला केंद्र सरकार से टकराव करने के बजाय सहयोगात्मक रवैया अपनाएं। यदि वह कांग्रेस की योजना के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी या भाजपा से टकराव जारी रखेंगे, तो यह जम्मू-कश्मीर के लोगों के हित में भी नहीं होगा।

बीते दस वर्षों में काफी कुछ बदल गया है। राज्य दो केंद्रशासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित हो चुका है। अब अब्दुला को भावनात्मक मुद्दों पर समय बर्बाद करने के बजाय मोदी के साथ सहयोगात्मक हाथ बढ़ाकर जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के साथ ही वहां के लोगों के लिए रोजगार में वृद्धि के अवसर तलाशने चाहिए। साथ ही राज्य में विकास और भ्रष्टाचार विरोधी शासन के प्रयास भी करने चाहिए।
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