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संकट: बस्तियों में इसलिए आ जाते हैं बाघ, सुरक्षा दीवार सहित ठोस नीति बनाने की जरूरत
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बाघ
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अमर उजाला
विस्तार
आमतौर पर कहा जाता है कि बाघ जंगल का राजा है, जहां वह अपने भोजन के लिए जंगली जानवरों का शिकार करता है। लेकिन अब इसका उल्टा हो रहा है। वह जंगल छोड़कर बस्तियों में भटकता है। नतीजतन पहाड़ी गांवों में दिन में भी लोगों को बाघ का खौफ सताने लगा है। स्थिति इतनी भयावह है कि जंगल में घास-लकड़ी लेने के लिए जाने वाली महिलाएं हों, या स्कूटर-मोटरसाइकिल पर सवार-सभी बाघ और गुलदार के हमलों के शिकार बन रहे हैं।
इकहत्तर फीसदी वन भू-भाग वाले उत्तराखंड में इन दिनों बाघ ने लोगों को आतंकित कर रखा है। वैसे तो इतने बड़े वन क्षेत्र में बाघ के भोजन की व्यवस्था हो जानी चाहिए थी, लेकिन जिन प्राणियों को बाघ अपना शिकार बनाते हैं, वे अब जंगल में भी ढूंढे से नहीं मिलते। नतीजतन वे भोजन की तलाश में बस्तियों में लोगों पर हमला कर रहे हैं। अप्रैल-मई, 2023 के दौरान टिहरी, पौड़ी, उत्तरकाशी जनपदों में दर्जनों लोगों पर बाघ ने हमले किए, जिनमें लगभग आधा दर्जन लोग मारे गए हैं।
जिम कार्बेट, राजाजी नेशनल पार्क समेत उत्तराखंड के सभी वन्यजीव पार्कों के नजदीक बसे हुए गांवों के सामने जंगली जानवरों से जान बचाना सबसे बड़ी चुनौती है। जनपद पौड़ी गढ़वाल तो बाघों के आतंक से खासा प्रभावित है। लोग बता रहे हैं कि जिम कार्बेट से नरभक्षी बाघ बस्तियों की तरफ आ रहे हैं। यहां दर्जनों गांव में लोगों को आसपास बाघ दिखाई देतेे हैं। अप्रैल के दूसरे सप्ताह में लैंसडाउन विधानसभा के डल्ला गांव व भैड गांव के दो व्यक्तियों को बाघ ने निवाला बनाया था। क्षेत्रीय विधायक दिलीप सिंह रावत जब घटनास्थल पर मुआयना करने पहुंचे, तभी बाघ उनके सामने आ धमका था, जिसे सुरक्षाकर्मियों ने हवाई फायर करके भगाया। इस दौरान प्रशासन ने स्कूल-कॉलेज बंद करा दिए और प्रभावित गांव में पशुओं के लिए चारा-पत्ती घर पर उपलब्ध करवाने के आदेश भी दिए। इन घटनाओं के चलते लोग जगह-जगह वन विभाग के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।
इन खतरनाक जानवरों की विशेषता है कि जहां पर भी उन्हें एक बार मनुष्य का शिकार मिल जाता है, वे उसके आसपास से हटते नहीं हैं। दूसरी ओर, वन्यजीव व अभयारण्य से बाहर निकलने वाले बाघों को शिकारियों का निशाना भी बनना पड़ रहा है। देश में औसतन 31 बाघ इसी कारण मारे जाते हैं। उत्तराखंड में ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट बताती है कि वन्यजीवों के हमलों के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने गांव छोड़कर शहरों की तरफ पलायन किया है। मानव-वन्यजीव संघर्ष के चलते वर्ष 2014 से मई 2018 तक 257 लोगों ने जान गंवाई है और लगभग 1,400 से अधिक लोग घायल हुए हैं।
इसके कारण किसान अपनी खेती-बाड़ी छोड़ देते हैं। गांव खाली होने के कारण घनी झाड़ियां उग आई हैं, जहां ये खतरनाक जानवर घात लगाए बैठे रहते हैं। इसलिए प्रभावित ग्रामीणों ने मांग की है कि मनरेगा के अंतर्गत गांव के आसपास की झाड़ियों की सफाई की जाए। यहां सुरक्षा दीवारों के निर्माण की भी आवश्यकता है। जंगलों में आग लगने के कारण भी जंगली जानवर बस्तियों की तरफ चले आते हैं। वन विभाग कैमरों के माध्यम से जंगली जानवरों की गतिविधियों पर नजर रखे हुए है, लेकिन उनके पिंजरों में बाघ नहीं फंस पा रहे हैं। वन विभाग को जानवरों के अवैध शिकार पर नियंत्रण के साथ जंगलों को आग से भी बचाना होगा। जाहिर है, इसके लिए वन विभाग के पास पर्याप्त अधिकारी एवं कर्मचारी होने चाहिए, जिसकी अभी बहुत कमी है।
दिसंबर, 2022 के शीत सत्र में पौड़ी गढ़वाल के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने संसद में गुलदार के हमलों की चर्चा करते हुए कहा था कि इससे प्रतिवर्ष 50 लोगों की मौत हो रही है। उन्होंने केंद्रीय वन मंत्री से इसके लिए ठोस नीति बनाए जाने की मांग की थी। बाघों के आतंक के बावजूद वन विभाग अपनी पुरानी व्यवस्था पर टिका है। जब कहीं से वन्यजीवों के हमले की सूचना मिलती है, तो वे अपना पिंजरा और कैमरा लेकर पहुंच जाते हैं, लेकिन उससे लोगों की परेशानी खत्म नहीं हो पा रही है।
-लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं
tiger