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विपक्षी एकता में बाधक तीन पहाड़
दिलीप मंडल
Updated Sun, 28 Jan 2018 07:07 PM IST
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बृहस्पतिवार को नरेंद्र मोदी सरकार मौजूदा कार्यकाल का आखिरी पूर्ण बजट पेश करेगी। यह सही समय है, जब केंद्र सरकार की इस आधार पर समीक्षा की जाए कि उसने इन वर्षों में क्या किया और अपने कितने चुनावी वायदे पूरे किए। चूंकि यह सरकार उम्मीदों की लहर पर सवार होकर आई थी, इसलिए उसकी उपलब्धियों की समीक्षा एक जरूरी कार्यभार है। कोई भी सचेत विपक्ष इस समय यह काम कर रहा होता। पर विपक्ष यह काम संजीदगी से कर रहा है, ऐसी लोकछवि उसकी बन नहीं पा रही। विपक्ष ने अभी सरकार की समीक्षा शुरू भी नहीं की, उससे पहले ही भाजपा यह प्रचार अभियान लेकर आ रही है कि साढ़े तीन साल में उसने कौन-कौन से वायदे पूरे कर दिखाए।
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लेकिन भाजपा इस अभियान से बाहर एक और प्रचार अभियान चला रही है। इसके मुद्दे अलग हैं। ये वे मुद्दे हैं, जो भाजपा को प्रिय हैं। ये वे मुद्दे हैं, जो भाजपा के घोषणापत्र में नहीं हैं। ये आम तौर पर सांप्रदायिक मुद्दे हैं। गाय से लेकर पाकिस्तान और स्कूल सिलेबस से लेकर क्या पहना जाए और क्या नहीं, और मुस्लिम महिलाओं को कैसे मुस्लिम पुरुषों के जुल्म से छुटकारा दिलाया जाए जैसे सवाल लोक विमर्श में प्रमुखता हासिल करते हैं। उसकी तुलना में विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सुरक्षा, किसानों को फसल का उचित मूल्य, बुनियादी ढांचे का विकास जैसे मुद्दों पर कम ही बात होती है। भाजपा इन पर ज्यादा बातचीत चाहती भी नहीं है।
इस बीच देश के राजनीतिक मानचित्र पर नजर डालें कि भाजपा ने उत्तर भारत में लगभग हर किला जीत लिया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीत उसके लिए सबसे शानदार मोर मुकुट है। बिहार में हारने के बाद नीतीश कुमार की पीठ पर सवार होकर वह सत्ता में आ चुकी है। बड़े राज्यों में केरल, पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और कर्नाटक को छोड़ दें, तो लगभग हर जगह या तो भाजपा या फिर उसके सहयोगी या समर्थक दलों की सरकार है। देश में राजनीतिक सत्ता जबर्दस्त रूप से केंद्रीकृत हो चुकी है। विपक्ष न सिर्फ मुद्दा विहीन है, बल्कि उसमें उत्साह की भी कमी दिख रही है। उसने किसी मुद्दे पर इस बीच राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन करने की कोशिश भी नहीं की है।
विपक्ष और उसमें भी खासकर कांग्रेस की रणनीति अगर यह है कि भाजपा की सरकार अपने बोझ से चरमरा जाएगी, और वैसे में विपक्ष के लिए अपने आप मौके खुल जाएंगे, तो होने को यह हो भी सकता है। विपक्ष यह सोच सकता है कि भाजपा ने उम्मीदों का जबर्दस्त माहौल बनाया था और उसकी डिलिवरी उस स्तर की नहीं है। लेकिन सवाल उठता है कि भाजपा की अगर कोई ऐसी नाकामी सामने भी आती है, तो उसे जनता तक पहुंचाएगा कौन। इसके लिए संगठिन ढांचा, राजनीतिक इच्छाशक्ति, विपक्षी शक्तियों का साझा मोर्चा और सटीक नारों की जरूरत पड़ेगी।
विपक्ष को 2019 में यह छवि पेश करनी होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर वह भाजपा का विकल्प देने में सक्षम है। इसके लिए उसके पास न सिर्फ मुद्दे और कार्य योजना होनी चाहिए, बल्कि उसे आपस में एकजुट भी होना चाहिए। वैसे भी, भाजपा 2014 में सिर्फ 31 प्रतिशत वोट पाकर पूर्ण बहुमत में आई थी। इसका सीधा मतलब है कि 2014 में भाजपा-विरोधी वोट बुरी तरह बंटा हुआ था। क्या 2019 या अगर चुनाव समय से पहले हुए, तो 2018 में विपक्ष 2014 वाली अपनी गलती दोहराने से बच पाएगा?
इस समय भाजपा-विरोधी खेमे में तीन स्पष्ट बड़ी दरारें दिख रही हैं। हालांकि इसके अलावा राज्यों के स्तर पर कई और पेचीदगियां हैं।
सबसे बड़ी दरार उत्तर प्रदेश में है, जहां दो प्रमुख दल, सपा और बसपा पिछले कुछ दशक के सबसे बुरे हाल में हैं। दोनों के पास वोट तो हैं, पर 2014 में उस वोट में जोड़ने वाला वह जादुई आंकड़ा नहीं था, जिससे एक पार्टी दौड़ में विजेता हो जाती है। 2014 में सपा और बसपा अलग लड़ी। तब वहां भाजपा को 71 और उसके सहयोगी अपना दल को दो यानी कुल मिलाकर एनडीए को 73 सीटें मिलीं। 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनी है। 2019 में क्या सपा और बसपा मिलकर भाजपा को रोकने की कोशिश करेंगी? दोनों की एकजुटता हो गई, तो भाजपा रुक भी सकती है। पर इस एकजुटता के अभी कोई लक्षण नहीं हैं। दोनों दलों पर और बहुत सारी बातों के अलावा जांच एजेंसियों का भी दबाव है और मुमकिन है कि उनकी राजनीति पर यह बात भी असर डाल रही हो।
विपक्षी एकता में दूसरी बड़ी बाधा कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के रिश्ते हैं। आप ने खुद को सेक्यूलर स्पेस में रखा है और इस नाते वह कांग्रेस की प्रतिद्वंद्वी है। खासकर देश की राजधानी दिल्ली में आप ने पिछले विधानसभा चुनाव में जिस तरह कांग्रेस को शून्य पर पहुंचा दिया, उसका जख्म कांग्रेस आज भी सहला रही है। इसके अलावा आप ने कांग्रेस को पंजाब में भी चुनौती दी। लोकसभा चुनाव में पंजाब में आप का प्रदर्शन कांग्रेस से बेहतर रहा। हालांकि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपनी खोई जमीन हासिल कर ली। इसके अलावा आप की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं भी हैं, जो कांग्रेस की जमीन से टकरा रही हैं।
विपक्षी एकता की तीसरी उलझन कांग्रेस और वामपंथी दलों के रिश्ते हैं। हालांकि वामपंथी दलों की अभी केरल और त्रिपुरा में सरकार है और पश्चिम बंगाल में वह प्रमुख विपक्षी दल है, लेकिन उन तमाम जगहों पर उसका मुकाबला सेक्यूलर दलों से है। केरल और त्रिपुरा में उसके सामने कांग्रेस है, तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस। इसलिए माकपा का प्रकाश करात गुट गैर-कांग्रेसवाद पर जोर दे रहा है और पार्टी को किसी भी ऐसे गठबंधन की तरफ जाने से रोक रहा है, जिसमें कांग्रेस हो। कांग्रेस के अलावा वामपंथी दल ही हैं, जिनमें राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन बनाने के लिए तमाम दलों से संवाद करने की क्षमता है। अगर कांग्रेस और वामपंथी दल अलग-अलग रास्ते पर चलते हैं, तो विपक्षी एकता की राह मुश्किल होगी।