तीन तलाक, सामंजस्य और अदालत
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एक अनौपचारिक बातचीत में डैनिएल ए लतीफी ने तलाक के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अनुभव साझा किया था। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील और मुस्लिम पर्सनल लॉ के विशेषज्ञ लतीफी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे बदरुद्दीन तैयबजी के पोते हैं। उन्होंने जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस तरह थी ः एक बार एक मुस्लिम पुरुष उनके पास आया और उसने कहा कि वह अपनी पत्नी से तलाक चाहता है और इस संदर्भ में उनसे कानूनी सलाह चाहता है। डैनियल लतीफी ने उससे कहा, यदि आप अपनी पत्नी को तलाक देना चाहते हैं, तो आप कुरान में सुझाई गई तलाक की प्रक्रिया को अपना सकते हैं।
इस प्रक्रिया के बारे में अज्ञानता जाहिर करते हुए उस व्यक्ति उन्हें उसे समझाने के लिए कहा। लतीफी ने उसे बताया कि इस्लाम में तलाक एक प्रक्रिया है, जिसके तहत पति को अपनी पत्नी को एक महीने के अंतराल पर तीन बार तलाक (मैं तुम्हें तलाक देता हूं) बोलना पड़ता है। तीसरे महीने में उसके पास अपने दो बार कहे गए तलाक शब्द को वापस लेने या तीसरी बार तलाक शब्द बोलकर अपने तलाक को अंतिम रूप देने का विकल्प होता है। तीसरे महीने तलाक बोलने पर फैसला बदल नहीं सकता। उस व्यक्ति ने पहली बार अपनी पत्नी से तलाक कहा। पहला महीना बीतने के बाद वह पत्नी को दूसरी बार तलाक कहने के बजाय मिठाई का डिब्बा लेकर लतीफी के पास पहुंच गया! उसने खुश होते हुए उनसे कहा, आपने मेरी शादी बचा ली। फिर उसने बताया कि पहले महीने के दौरान उसका सारा गुस्सा उड़ गया। ठंडे दिमाग से सोचने पर उसने पाया कि तलाक से बचना और तालमेल बिठाने की कोशिश करना बेहतर विकल्प है। यह बस समय लेने का मामला है। तलाक की इस्लामी रीति ने उसे तलाक के परिणामों पर सोचने के लिए काफी समय दिया और उसने उसे अपने पहले के फैसले पर फिर से विचार करने के लिए प्रेरित किया।
इस्लाम के शुरुआती काल को, जिसे कुरान सालसा या तीन युग कहा जाता है, उसे इस्लाम का स्वर्णिम युग माना जाता है। इसमें पैगंबर, उनके अनुयायी और उनके अनुयायियों के अनुयायी का समय शामिल है। इन तीनों अवधियों में लोग तलाक की कुरान रीति का पालन करते थे। पहले खलीफा अबु बकर ने इसी रीति को अपनाया था। दूसरे खलीफा उमर ने कुछ विशेष मामलों में अपवादस्वरूप एक ही बार में तीन बार तलाक शब्द बोलने को स्वीकार कर चरम कदम उठाया था। ऐसा उन्होंने सिर्फ उन मामलों में किया, जब उन्हें लगा कि पति तलाक की अनुमति का दुरुपयोग कर रहा है। ऐसे मामलों में खलीफा द्वारा तलाक की अनुमति वास्तव में सजा का एक रूप है और इसके नतीजों को दूसरे को हतोत्साहित करने के रूप में देखा जाता है। लेकिन यह समझा जाना चाहिए कि किसी भी खलीफा द्वारा दिया गया कोई कार्यकारी आदेश शरीया के कानून का दर्जा हासिल नहीं करता। ऐसा कोई भी कार्यकारी आदेश (चाहे किसी ने भी ऐसा फैसला क्यों न किया हो) कुरान के कानून को नहीं बदल सकता, जो स्पष्ट रूप से विशिष्ट शब्दों में उल्लेखित है।
एक कार्यकारी आदेश कभी शरीया का स्थायी नियम नहीं बन सकता। बाद के युगों में जब सामाजिक और आध्यात्मिक अधःपतन हो गया, भावना के बजाय इसे धर्म के रूप से जोड़ने की जोरदार कोशिश शुरू हुई। यहां यह पूरी तरह से स्पष्ट करने की जरूरत है कि भावना के मुताबिक, अगर अत्यधिक गुस्से में तीन बार (एक के बाद एक) तलाक शब्द का उच्चारण किया जाता है, उसे केवल एक उच्चारण माना जाएगा। इसका कारण यह है कि जब कोई व्यक्ति गुस्से में होता है, तो उसे खुद पर इतना नियंत्रण नहीं होता कि वह उस शब्द को केवल एक ही बार बोलना पर्याप्त समझे।
इस संबंध में एक उदाहरण गौर करने लायक है। ऐसा ही एक मामला पैगंबर के समक्ष आया, जहां एक व्यक्ति ने कहा, 'मैंने अपनी पत्नी को एक ही बार में तीन बार तलाक कहा है, लेकिन अब मैं अपने शब्दों को वापस लेना चाहता हूं, हालांकि मैंने तलाक शब्द का उच्चारण तीन बार किया है।' पैगंबर ने उससे कहा, 'हां, मैं जानता हूं कि तुमने तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण किया है, लेकिन इसे एक उच्चारण माना जाएगा। तलाक के लिए यह शब्द बोलने में तीन महीनों का समय लगना चाहिए। इसलिए तुम्हारे द्वारा बोले गए शब्द को एक ही बार बोला हुआ माना जाएगा और तुम अपनी पत्नी को घर ले जा सकते हो।' (मुसनाद अहमद) इस्लाम के पैगंबर ने एक बार कहा था, 'खुदा की नजर में तलाक सबसे घृणित काम है, हालांकि दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में कानूनी तौर पर इसकी इजाजत दी जाती है।' (अबु दाउद)
पैगंबर ने जो कहा, उसके मुताबिक मुसलमानों को निकाह के बाद आदर्श रूप में सामंजस्यपूर्ण जीवन जीना चाहिए, ताकि पारिवारिक जीवन की दिव्य योजना पूरी हो सके। अपवाद के रूप में तलाक का सहारा लिया जा सकता है। दूसरे खलीफा द्वारा जारी कार्यकारी आदेश (एक ही बार में तीन तलाक बोलने के संबंध में) को मुअत्तल समझा जाना चाहिए, क्योंकि किसी भी मुस्लिम शासक ने उसे नहीं अपनाया। सबसे पहले मुसलमानों को अपनी वैवाहिक समस्याओं को पारिवारिक स्तर पर सुलझाने की हरसंभव कोशिश करनी चाहिए। हालांकि किसी भी तरह की वैवाहिक समस्या उत्पन्न होने पर मुसलमानों के लिए एकमात्र विकल्प यही होना चाहिए कि वे देश के कानून के तहत स्थापित न्यायालयों में अपने मामले ले जाएं, क्योंकि हम आज एक लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय प्रशासन के युग में जी रहे हैं।
-लेखिका जामिया मिल्लिया इस्लामिया में इस्लामिक अध्ययन की प्रोफेसर और सेंटर फॉर पीस ऐंड स्पिरिट्युअलिटी इंटरनेशनल की अध्यक्ष हैं।