{"_id":"5a5e03a84f1c1b84268b4bac","slug":"this-is-not-the-internal-issue-of-the-court","type":"story","status":"publish","title_hn":"यह कोर्ट का अंदरूनी मसला नहीं ","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
यह कोर्ट का अंदरूनी मसला नहीं
समरेंद्र सिंह
Updated Tue, 16 Jan 2018 07:22 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
समरेंद्र सिंह
देश के प्रधान न्यायाधीश को जनता की अदालत में खड़ा करने वाले चार न्यायाधीशों में से एक जस्टिस रंजन गोगोई ने शनिवार को कहा कि कोई संकट नहीं है। दूसरे जस्टिस कुरियन जोसफ ने कहा कि इस मामले में 'बाहरी हस्तक्षेप' की कोई जरूरत नहीं है। यह सर्वोच्च न्यायालय का 'अंदरूनी मसला' है और वे इसे 'खुद ही' सुलझा लेंगे। बात सही है। यह मसला सर्वोच्च न्यायालय का अंदरूनी मसला है, पर सवाल उठता है कि इस 'अंदरूनी' मसले को सार्वजनिक किसने किया? सर्वोच्च अदालत की साख को बट्टा किसने लगाया? और ऐसा करने पर क्या कोई जवाबदेही बनती है या नहीं?
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
जस्टिस कुरियन या कोई अन्य चाहे भी, तो अब इसे अंदरूनी मामला बता कर रफा-दफा नहीं कर सकता, क्योंकि उन्हीं के शब्दों के मुताबिक, इससे देश के लोकतंत्र का भविष्य जुड़ा है। देश का भविष्य जुड़ा है। लिहाजा इस पर व्यापक बहस होनी चाहिए। इस पर भी कि ज्यादा बड़ा खतरा किससे पैदा हुआ है? प्रधान न्यायाधीश के भेदभावपूर्ण रवैये से या चारों न्यायाधीशों की प्रेस वार्ता से? उस प्रेस वार्ता से, जिसने एक झटके में प्रधान न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय समेत देश की पूरी न्यायिक व्यवस्था की छवि ध्वस्त कर दी है। यह न्यायाधीशों द्वारा न्यायपालिका की ऐसी घोर अवमानना है, जिसकी गूंज आने वाले वक्त में अक्सर सुनाई देगी और उसके दूरगामी परिणाम निकलेंगे।
अदालत की अवमानना की जब व्याख्या की जाती है, तो उसमें फैसलों की आलोचना करने का अधिकार तो होता है, पर अदालत की मंशा पर संदेह करने का नहीं। अदालत के किसी फैसले से नाखुश हुआ जा सकता है और यह भी कहा जा सकता है कि न्याय नहीं हुआ है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि फैसला पक्षपातपूर्ण है या प्रभावित है। ऐसा कहना अदालत की अवमानना के दायरे में आता है और इस पर सजा हो सकती है। इस व्याख्या के पीछे एक बड़ा आधार है। किसी भी मामले में सबूतों और गवाही पर गौर करने के बाद जज अपने विवेक के आधार पर फैसला सुनाता है। विवेक सापेक्ष होता है। किसी भी मामले में दो लोगों की राय भिन्न हो सकती है। यह मानवीय दृष्टिकोण है। यह भिन्न-भिन्न हो सकता है। तभी तो अदालत अपने फैसलों को बदलती है। हो सकता है कि गवाहों की बात समझने में, सबूतों के विश्लेषण में जज से चूक हुई हो, या फिर उसका विश्लेषण न्याय संगत नहीं हो।
लेकिन यह कहना कि अदालत या जज का रवैया पक्षपातपूर्ण या प्रभावित है, अदालत और जज की नीयत पर सवाल उठाना है। अवमानना के आधार पर ही बीते साल कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सी एस कर्णन को छह महीने कारावास की सजा सर्वोच्च अदालत की एक बेंच ने सुनाई थी। शुक्रवार को जब चारों न्यायाधीशों ने आरोप लगाया कि प्रधान न्यायाधीश ने 'देश और संस्था' से जुड़े 'अत्यधिक महत्वपूर्ण मामलों' को अपनी 'पसंद की बेंचों' को सौंपा है, तो उन्होंने प्रधान न्यायाधीश पर पक्षपात करने का आरोप लगाया। अगर उन्होंने जनता की अदालत में प्रधान न्यायाधीश को कठघरे में खड़ा किया है, तो ऐसा करने के तमाम आधार भी जनता की अदालत में पेश करने होंगे। अगर इन चार जजों ने साहस दिखा कर यह साबित नहीं किया कि 'पसंद की बेंचों' को कुछ 'चुनींदा मामले' भेजने से क्यों और कैसे 'देश का लोकतंत्र' खतरे में पड़ सकता है, तो यह माना जाएगा कि सस्ती लोकप्रियता के लिए इन्होंने ऐसा किया। ऐसे में यह भी सवाल उठेगा कि उन्होंने नैतिक आधार पर अपने पदों से इस्तीफा क्यों नहीं दिया?