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कुछ अलग है इमरान की यह मंत्री

Thu, 25 Oct 2018 06:19 PM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Thu, 25 Oct 2018 06:19 PM IST
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This Imran's minister is different
शिरीन मजारी

सोशल मीडिया की ताकत पिछले हफ्ते तब दिखी, जब ट्वीटर पर खबर आने के बाद एक बच्ची को बचाया गया। मानवाधिकार मंत्री शिरीन मजारी ने इसका संज्ञान लेते हुए तुरंत अधिकारियों को आदेश दिया और चार दिन के भीतर उस बच्ची को बरामद किया गया। हालांकि पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) सरकार को सत्ता संभाले अभी दो ही महीने हुए हैं, लेकिन मजारी अकेली ऐसी मंत्री हैं, जो कठिन मेहनत करती हैं और मानवाधिकार के मामलों में निजी दिलचस्पी लेती हैं।


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यह मामला सिंध के मटियारी जिले के हिंदू समुदाय से संबंधित है, जहां छठी कक्षा की ग्यारह साल की एक अल्पसंख्यक हिंदू लड़की मोनिका लुहानो के अपहरण से नाराज लोग सड़क पर आंदोलन कर रहे थे। वे लोग उस बच्ची की बरामदगी में देरी के लिए पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। हिंदू समुदाय के सैकड़ों प्रदर्शनकारी हाला शहर में जमा हुए थे और हिंदू व्यवसायियों ने भी विरोध में अपना कामकाज बंद रखा था। स्थानीय हिंदू पंचायत और हिंदू व्यवसायियों ने पीड़ित परिवार के साथ एकजुट होकर प्रदर्शन किया और एफआईआर दर्ज होने से पहले थाने का घेराव किया। शिरीन मजारी ने बच्ची के बरामद होने के बाद ट्विट किया, मुझे आज अल्लसुबह यह सूचित किया गया है कि सिंध प्रांत के हाला से अपहृत ग्यारह वर्षीय हिंदू लड़की को पिछली रात बरामद कर लिया गया है। कल सुबह शिकायत मिलने के बाद हमने स्थानीय पुलिस से संपर्क किया था। उन सभी का शुक्रिया, जिन्होंने इसमें मदद की। पहले इस तरह के मामले में अगवा लड़की का धर्मांतरण किया जाता था, फिर जबरन उससे शादी की जाती थी। लेकिन सिंध की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार ने इसे रोक दिया है। सिंध बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम, 2013 में घोषणा की गई है कि 18 साल से कम उम्र में शादी जुर्म है। इस तरह की शादियां कराने वाले इस कानून के तहत दंडित किए जाएंगे।

शिरीन मजारी इन दिनों जबरन गायब किए गए लोगों की तलाश का काम भी कर रही हैं। पिछले कुछ साल में हजारों पाकिस्तानियों को अगवा कर लिया गया, जिनमें से अनेक अब भी गायब हैं। इस तरह की घटनाएं सैन्य तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ के समय शुरू हुई थीं। जब एक संगठन ने प्रभावित परिवारों को एकजुट करना शुरू किया, तब जाकर अगवा करने का यह सिलसिला बंद हुआ। मानवाधिकार कार्यकर्ता और डिफेंस ऑफ ह्यूमन राइट्स, पाकिस्तान की अध्यक्ष अमीना मसूद जंजुआ के अनुसार, जबरन अपहरण की घटनाओं के खिलाफ एक गैर-लाभकारी संगठन का जब से गठन किया गया, तबसे पाकिस्तान में 70 हजार से अधिक इस तरह के मामले दर्ज किए गए हैं। इस प्रकार जबरन गायब किए गए लोगों के खिलाफ कोई आरोप नहीं है। मानवाधिकार मंत्री शिरीन मजारी का कहना है कि पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) सरकार पूरी ताकत के साथ गायब हुए लोगों के मुद्दों का समर्थन करेगी, क्योंकि प्रधानमंत्री इमरान खान का इस मुद्दे पर बयान बिल्कुल स्पष्ट है-हम कानून में संशोधन करेंगे और जबरन गायब किए जाने की घटना को आपराधिक दंड संहिता में अपराध के रूप में शामिल करेंगे। इसके साथ उन्होंने जोड़ा कि किसी को भी कानूनी बाध्यता के बगैर किसी को जबरन अगवा करने का अधिकार नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय गुमशुदा दिवस के अवसर पर एक विरोध रैली को संबोधित करते हुए शिरीन मजारी ने कहा कि वह इस विरोध रैली में पहली बार नहीं आई हैं, उनकी पार्टी लंबे समय से ऐसी विरोध रैलियों में भाग लेती रही है। 'हमारा रुख साफ है कि अगर किसी ने कानून तोड़ा है, तो उसे अदालत में लाया जाना चाहिए और उसके खिलाफ चार्जशीट दायर की जानी चाहिए।' उन्होंने कहा कि अगर कोई लापता व्यक्ति मर गया है या वह किसी आतंकवादी या देश विरोधी गतिविधियों में शामिल है, तो इसकी सूचना उसके परिवार को जरूर दी जानी चाहिए। हम पूरी तरह से एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं, और बगैर कानूनी बाध्यता के किसी को गायब करने की घटना न केवल असांविधानिक है, बल्कि लोकतांत्रिक नियमों के खिलाफ भी है। आगे उन्होंने कहा कि ऐसे अपराध केवल फासिस्ट मुल्कों में होते हैं।

‘वॉयसेस फ्रॉम बलूचिस्तान’ कहता है कि करीब 18,000 लोग मुल्क के इस सबसे बड़े प्रांत से गायब हैं। पाकिस्तान की अदालतों ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की है, और एक समय मुल्क की सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों को आदेश दिया गया था कि वे उन लोगों को अदालत में पेश करें, जिन्हें उन्होंने हिरासत में रखा है।

जबरन लापता किए गए लोगों की जांच से संबंधित आयोग के सचिव ने अदालत को बताया है कि उसने ऐसे 3,000 मामलों का निपटारा किया है, जबकि 1,577 मामले अब भी लंबित हैं। फरवरी, 2018 तक करीब 4,804 ऐसे मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से 116 जबरन लापता के मामले उसी महीने दर्ज किए गए थे। इसके अलावा आयोग में मार्च में 125 अन्य मामले दर्ज कराए गए। आयोग की कोशिशों के चलते कुल 3,274 लोग सुरक्षित अपने घरों में लौटे, जबकि 31 मार्च तक 1,710 मामलों का निपटारा बाकी था। फरवरी में आयोग ने इस्लामाबाद में 173 सुनवाइयां कीं, जबकि लाहौर में 44 और कराची में 157। कार्यवाही के दौरान सेवानिवृत्त कर्नल इनामुर रहीम (जो लापता लोगों का मुकदमा लड़ने वाले वकील के रूप में जाने जाते हैं) ने खेद व्यक्त किया कि संबंधित आयोग ने खुफिया एजेंसियों द्वारा दायर की गई रिपोर्ट के आधार पर मामलों का निपटारा किया था और दावा किया कि सैन्य अदालतों में ट्रायल का सामना करने वाले व्यक्ति को अपने बचाव के लिए कानूनी सलाह नहीं दी जा रही। इस पर अदालत ने उन्हें आश्वस्त किया कि वह इस मुद्दे को देखेगी, बशर्ते वह इससे जुड़ा एक भी मामला अदालत के सामने पेश करें। अब यह नई पीटीआई सरकार पर निर्भर है कि वह जबरन गायब किए जाने की घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए ट्रूथ ऐंड रिकॉन्सिलेशन कमीशन लाएगी या नहीं? सुरक्षा एजेंसियों के पास भी कोई रास्ता नहीं है, जिनके पास लोग हिरासत में है, लेकिन उन्हें सुरक्षित पेश करने का कोई उपाय नहीं है।

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