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शिमला की प्यास
मनु पंवार
Updated Thu, 31 May 2018 06:32 PM IST
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मनु पंवार
इन दिनों सैलानियों से गुलजार रहने वाले शिमला के मॉल रोड तक में पानी के टैंकर के आगे बर्तनों के साथ लोगों की लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। जिन इलाकों में टैंकर जाने की सुविधा नहीं है, वहां लोग दूर से पानी ढोते हुए दिख रहे हैं। विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, नारे गूंज रहे हैं, धरना हो रहा है। इस बार तो समर फेस्टिवल भी स्थगित करना पड़ा है। हाई कोर्ट को दखल देकर कड़े निर्देश देने पड़े। हिमाचल सरकार कई दौर की उच्च स्तरीय मीटिंग कर चुकी है। पर कोई हल नहीं मिल रहा।
गर्मियों में शिमला में जल संकट नई बात नहीं है। पर इस बार पूरी व्यवस्था ही चरमरा गई है। शिमला में पानी की जरूरत आम तौर पर चार करोड़ 20 लाख लीटर प्रतिदिन है, पर दो करोड़ 20 लाख लीटर प्रतिदिन ही आपूर्ति हो रही है, जो कुल जरूरत का लगभग आधा है। यह आलम तब है, जब गर्मियों के दिनों में पर्यटन सीजन की वजह से शिमला की आबादी हर साल बढ़ जाती है। यानी आबादी तो बढ़ गई, पर पानी रोजाना की जरूरत से भी आधा मिल रहा है।
संकट की बड़ी वजह यही है। एक दलील यह भी दी जा रही है कि इस बार की सर्दियां सूखी गुजर गईं, न ढंग की बारिश हुई, न कायदे से बर्फ गिरी, लिहाजा पानी के स्रोत रीचार्ज नहीं हो पाए। ऐसी मासूम दलीलें देते वक्त हम भूल जाते हैं कि शिमला का मौजूदा जल संकट हमारे लालचों का नतीजा है। हमने अपने हिल स्टेशनों के बुनियादी ढांचे की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। उन्हें सिर्फ सैरगाह और मौज- मस्ती का अड्डा समझा। पर्यटन के नाम पर चांदी बटोरने वालों के लिए ये हिल स्टेशन सोने का अंडा देने वाली ऐसी मुर्गी बन गए, जिसका पेट फाड़ डालने में भी किसी ने हिचक नहीं दिखाई। शिमला में तो इस धंधे की आड़ में ऐसा माफिया भी पैदा हुआ है, जो आड़े वक्त में शिमला वालों के हिस्से का बचा-खुचा पानी तक लूट लेता है। इस बार शिमला के भीषण जल संकट ने सबको आईना दिखा दिया है।
वर्ष 1864 में अंग्रेजों ने जब इसे अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित की, तब इस पहाड़ी नगर को करीब सोलह हजार की आबादी के लिए डिजाइन किया गया था। 1875 में ढली कैचमेंट एरिया से शिमला को करीब 45 लाख लीटर पानी मिलता था। 1880 के आसपास रिज पर एक विशाल जलाशय बनाया गया, जहां से इस पहाड़ी शहर के लिए अब भी जलापूर्ति होती है। अंग्रेजों ने शिमला के लिए पहले 1914, फिर 1924 में पानी का और इंतजाम किया। तब से अब तक शिमला की आबादी कई गुना बढ़ चुकी है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, शिमला की आबादी करीब 1.70 लाख है। आबादी में वृद्धि के अनुरूप पानी के इंतजाम नहीं हुए।
आज शिमला पानी के लिए काफी हद तक उसी व्यवस्था पर निर्भर है, जिसे कभी अंग्रेजों ने तैयार किया था। यह अलग बात है कि सात पहाड़ियों पर पसरा शिमला कालांतर में कंकरीट के जंगल के रूप में फैलता चला गया। अंग्रेजों ने तो अपने दौर में शिमला के आसपास जलस्रोतों को बचाए रखने के लिए कई पाबंदियां भी लगाई थीं। जैसे, यह सुनिश्चित किया जाता था कि जलग्रहण क्षेत्र में मानवीय गतिविधियां न हों। पर अब शिमला में जंगलों के बीच सीमेंट-कंकरीट के ढांचे उग आए हैं, जिससे पारंपरिक जलस्रोत मरने लगे। मौजूदा जल संकट तो इसका एक संकेत भर है। अगर इसका दोष सिर्फ मौसम पर डाल देंगे, तो यह रेत में सिर घुसेड़ने जैसा शुतुरमुर्गी कर्म होगा।
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गर्मियों में शिमला में जल संकट नई बात नहीं है। पर इस बार पूरी व्यवस्था ही चरमरा गई है। शिमला में पानी की जरूरत आम तौर पर चार करोड़ 20 लाख लीटर प्रतिदिन है, पर दो करोड़ 20 लाख लीटर प्रतिदिन ही आपूर्ति हो रही है, जो कुल जरूरत का लगभग आधा है। यह आलम तब है, जब गर्मियों के दिनों में पर्यटन सीजन की वजह से शिमला की आबादी हर साल बढ़ जाती है। यानी आबादी तो बढ़ गई, पर पानी रोजाना की जरूरत से भी आधा मिल रहा है।
संकट की बड़ी वजह यही है। एक दलील यह भी दी जा रही है कि इस बार की सर्दियां सूखी गुजर गईं, न ढंग की बारिश हुई, न कायदे से बर्फ गिरी, लिहाजा पानी के स्रोत रीचार्ज नहीं हो पाए। ऐसी मासूम दलीलें देते वक्त हम भूल जाते हैं कि शिमला का मौजूदा जल संकट हमारे लालचों का नतीजा है। हमने अपने हिल स्टेशनों के बुनियादी ढांचे की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। उन्हें सिर्फ सैरगाह और मौज- मस्ती का अड्डा समझा। पर्यटन के नाम पर चांदी बटोरने वालों के लिए ये हिल स्टेशन सोने का अंडा देने वाली ऐसी मुर्गी बन गए, जिसका पेट फाड़ डालने में भी किसी ने हिचक नहीं दिखाई। शिमला में तो इस धंधे की आड़ में ऐसा माफिया भी पैदा हुआ है, जो आड़े वक्त में शिमला वालों के हिस्से का बचा-खुचा पानी तक लूट लेता है। इस बार शिमला के भीषण जल संकट ने सबको आईना दिखा दिया है।
वर्ष 1864 में अंग्रेजों ने जब इसे अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित की, तब इस पहाड़ी नगर को करीब सोलह हजार की आबादी के लिए डिजाइन किया गया था। 1875 में ढली कैचमेंट एरिया से शिमला को करीब 45 लाख लीटर पानी मिलता था। 1880 के आसपास रिज पर एक विशाल जलाशय बनाया गया, जहां से इस पहाड़ी शहर के लिए अब भी जलापूर्ति होती है। अंग्रेजों ने शिमला के लिए पहले 1914, फिर 1924 में पानी का और इंतजाम किया। तब से अब तक शिमला की आबादी कई गुना बढ़ चुकी है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, शिमला की आबादी करीब 1.70 लाख है। आबादी में वृद्धि के अनुरूप पानी के इंतजाम नहीं हुए।
आज शिमला पानी के लिए काफी हद तक उसी व्यवस्था पर निर्भर है, जिसे कभी अंग्रेजों ने तैयार किया था। यह अलग बात है कि सात पहाड़ियों पर पसरा शिमला कालांतर में कंकरीट के जंगल के रूप में फैलता चला गया। अंग्रेजों ने तो अपने दौर में शिमला के आसपास जलस्रोतों को बचाए रखने के लिए कई पाबंदियां भी लगाई थीं। जैसे, यह सुनिश्चित किया जाता था कि जलग्रहण क्षेत्र में मानवीय गतिविधियां न हों। पर अब शिमला में जंगलों के बीच सीमेंट-कंकरीट के ढांचे उग आए हैं, जिससे पारंपरिक जलस्रोत मरने लगे। मौजूदा जल संकट तो इसका एक संकेत भर है। अगर इसका दोष सिर्फ मौसम पर डाल देंगे, तो यह रेत में सिर घुसेड़ने जैसा शुतुरमुर्गी कर्म होगा।