{"_id":"c95315151f987643300135619f2163cb","slug":"third-in-dull-life","type":"story","status":"publish","title_hn":"नीरस जिंदगी में तीसरे का तड़का","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
नीरस जिंदगी में तीसरे का तड़का
निर्मल गुप्त
Updated Wed, 09 Oct 2013 06:56 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नेताजी ने मुनादी करवा दी है कि तीसरा मोर्चा बनेगा। चलो, इससे राजनीति की एकरसता तो टूटेगी। जिंदगी की बगिया में जब कोई तीसरा आता है, तब उसमें बहुरंगी फूल महक उठते हैं। पति-पत्नी के बीच जैसे ही कोई तीसरा या तीसरी आती है, एकाएक वैवाहिक जीवन कितना रोमांचक हो उठता है।
विज्ञापन
कवि धूमिल ने इस तीसरे के महत्व की व्याख्या जरा हटकर की है। उन्होंने जनता से पूछा कि रोटी बनाने और खाने वाले के अलावा यह तीसरा कौन होता है। फिर इसका जवाब भी उन्होंने खुद दिया कि तीसरा वह है, जो न रोटी पकाता है, न रोटी खाता है, बस रोटी से खेलता है। यह कविता पढ़ने के बाद ही लोगों की समझ में आया कि रोटी खिलौना भी होती है।
विज्ञापन
दुनियादार लोग यह भी जानते हैं कि दो लोगों के विवाद में से तीसरे के फायदे का रास्ता निकलता है। वैसे तीन के अंक को अशुभ मानने वालों की भी कमी नहीं। कहावत ही है-तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा।
विज्ञापन
चाहे जो हो, तीन या तीसरा होता कमाल का है। इसका निजी जिंदगी में होना ठीक वैसा ही है, जैसे कॉलोनी के किसी फ्लैट की खिड़की पर सदैव टिके रहने वाला कोई खूबसूरत चेहरा। दुनिया के हर प्रकार के कारोबार में किसी तीसरे का हस्तक्षेप जाने-अनजाने रहता ही है। सब्जी की खरीद-फरोख्त हो या सैन्य हथियारों का सौदा, इनमें बिचौलियों की भूमिका अवश्य पाई जाती है। यह अलग बात है कि धंधे के हिसाब से इनके नाम बदल जाते हैं। सब्जी मंडी में इनको आढतिया, कमीशन एजेंट आदि कहते हैं, तो सत्ता के कारोबार में इन्हें लाइजन ऑफिसर, पब्लिक रिलेशन एक्जिक्यूटिव और कंसलटेंट कहते हैं। पर ये सभी वस्तुत: होते दलाल ही हैं।
हमारे मुल्क में जब चुनाव समीप आते हैं, तब उम्मीदवार और मतदाता के बीच अपना मासूम चेहरा लिए तीसरे की शक्ल में कई अक्लमंद रणनीतिकार उपस्थित हो जाते हैं। यही लोग अपनी तिकड़मों से सवा अरब आबादी का मुकद्दर तय करते हैं। राजनीति की किताबों में दर्ज सारे सिद्धांत तिरोहित हो जाते हैं। तब कौन सांप्रदायिकता/धर्मनिरपेक्षता की किस डाल पर बैठकर चहचहाने लगे, कोई नहीं जानता। राजनीति में एक सत्ता पक्ष होता है, दूसरा विपक्ष, और बकौल धूमिल रोटी से खेलने वाले की तरह अदृश्य ताकतों का एक तीसरा समूह भी होता है, जो मौका मिलते ही अपनी दावेदारी लेकर आ जाता है। यदि यह न हो, तो जीवन कितना बेढंगा हो जाए।