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अपने लिए सोचेंगे तो बचेगी पृथ्वी

Tue, 21 Apr 2015 07:57 PM IST
अनिल प्रकाश जोशी
अनिल प्रकाश जोशी Updated Tue, 21 Apr 2015 07:57 PM IST
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Think about self to save earth

वर्ष 1969 में जब यूनेस्को के सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में शांति कार्यकर्ता जॉन मैक कोनेल ने पृथ्वी के सम्मान में एक दिन नियत करने का सुझाव दिया था, तो सहमति 21 मार्च पर बनी थी। मगर बाद में इसे 22 अप्रैल किया गया। वर्ष 1970 से शुरू हुई पृथ्वी दिवस मनाने की परंपरा आज 197 देशों तक पहुंच गई है। अर्थ-डे नेटवर्क इस कार्य के लिए समर्पित है। इसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी और पर्यावरण की रक्षा करना है। यह पृथ्वी के हर व्यक्ति को दायित्व समझने और समझाने का दिवस है।

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यह बात दूसरी है कि हमारे शास्त्रों में पृथ्वी को सबसे पहले नमन किया गया है। न सिर्फ गायत्री मंत्र, बल्कि कई कर्मकांडों में भी पृथ्वी की पूजा प्रमुखता से होती है। हमारे धर्मशास्त्रों में पृथ्वी को पूजने की प्रथा शायद इसलिए तय की गई थी कि हम हर पल पृथ्वी के उपकारों को याद रखें। चूंकि पृथ्वी का सृजन और उसके उपरांत जीवन की उत्पत्ति को करोड़ों वर्ष हो चुके हैं और यह महान अखंड भू-भाग निरंतर सेवा में लीन है। इसने कई सदियों, संस्कृति और समाज को बदलते देखा है। शायद इसलिए इसके नमन को पहला स्थान मिला है।
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मगर पिछले हजारों वर्षों से पृथ्वी के साथ वह नहीं हुआ, जो विगत 100-200 वर्षों में हुआ है। करोड़ों वर्षों में पृथ्वी ने लगातार अपने संतुलन बनाने और बचाने के जो भी रास्ते तैयार किए, हमने एक-एक करके सब ध्वस्त कर दिए। मसलन, एक बड़े बांध की योजना स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को स्वाहा कर देती है, नदियां मार दी जाती हैं, वनों को झील लील लेती हैं, पहाड़ डूब जाते हैं और पली-पलाई व्यवस्था तहस-नहस हो जाती है। यानी धरती को गहरे जख्म मिल जाते हैं।
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पृथ्वी के साथ ऐसा व्यवहार ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं। टुकड़ों-टुकड़ों में धरती ने यह संकेत देना शुरू भी कर दिया है। हमारे बीच से पानी गायब होता जा रहा है, क्योंकि नदियां ही विलुप्ति के कगार पर हैं। वनों के आंकड़े ठीक-ठाक नहीं हैं। भोजन में रसायन ने जगह बना ली है। विकास के नाम पर तमाम उलटफेर हो रहे हैं। बेशक बढ़ती आबादी की आवश्यकताएं नहीं नकारी जा सकतीं, मगर खेल विलासिता के लालच ने बिगाड़ा है। अंधाधुंध शहरीकरण और बेतरतीब बढ़ते वाहनों ने पृथ्वी पर काफी दबाव बढ़ाया है। यही कारण है कि पृथ्वी का पर्यावरण भारी खतरे में पड़ चुका है। पृथ्वी के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के कारण ही तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर संकट खड़े हो गए हैं। तमाम तरह की इन आपदाओं का आना यही बातता है कि शायद पृथ्वी अब अपने अपमान को ज्यादा झेल नहीं सकेगी। संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन की ताजा रिपोर्ट भी बता रही है कि वायुमंडल में बढ़ती कार्बन की मात्रा भूख, संसाधन विवाद, बाढ़, पलायन जैसी बड़ी समस्याओं को जन्म देगी, जिससे होने वाले नुकसान की भरपाई काफी मुश्किल है।


लिहाजा वक्त इन संकेतों को गंभीरता से समझने का है। बेशक पृथ्वी की चिंता को हम नकार दें, पर अपने जीवन को संकट में डालने की हमारी हिम्मत नहीं! इसलिए पृथ्वी दिवस का नारा स्वयं के जीवन को बचाने वाला होना चाहिए। 'स्वयं' के लिए सोचकर ही हमने पृथ्वी को बर्बाद किया है, शायद अपने भयावह भविष्य के बारे में सोचकर ही हम पृथ्वी के संरक्षण की तरफ भी बढ़ेंगे।

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