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मंजिलें और भी हैं...
शंकर अय्यर
Updated Wed, 08 Nov 2017 10:02 AM IST
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विमुद्रीकरण
आज विमुद्रीकरण या नोटबंदी के एक वर्ष हो रहे हैं। नोटबंदी का मकसद भले ही आतंकी फंडिंग और नकली नोट पर रोक लगाने के साथ ही डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देना था, मगर अनिवार्यतया यह कालेधन और भ्रष्टाचार पर चोट करने के लिए उठाया गया कदम भी था। काला धन, कर चोरी और अक्सर आपराधिक व भ्रष्ट तरीके से अर्जित धन होता है। काले धन का एक पहलू आभूषणों और रियल एस्टेट में नकद निवेश और नकदी पैदा करने वाले उद्यमों से जुड़ा है। इसका दूसरा पहलू काले धन का प्रवाह है, जो सत्ता के बेजा इस्तेमाल के जरिये नकदी एकत्र करने से जुड़ा है।
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पिछले वर्ष आठ नवंबर को की गई नोटबंदी ने प्राथमिक तौर पर लोगों तथा संस्थाओं के पास जमा नकदी पर चोट की। नकदी के सामने आने और कर अधिकारियों की कार्रवाई से कुल कितना काला धन बाहर आया, इसकी जानकारी अभी नहीं, क्योंकि यह प्रक्रिया अभी जारी है। हमें जो पता है, वह यह कि 15.28 लाख करोड़ रुपये या 500 रुपये तथा 1000 रुपये के कुल 99 फीसदी नोट बैंकों में वापस गए। रिजर्व बैंक ने कहा है कि वह विशेष मशीनों के जरिये अंतिम आंकड़े निकाल रहा है, यह प्रक्रिया कब पूरी होगी, यह पता नहीं। आयकर विभाग ने व्यक्तियों और कंपनियों को उनका जवाब जानने के लिए नोटिस भेजे हैं। यह काम भी प्रगति पर है।
इसके अलावा भी कई कदम उठाए गए हैं। मसलन, राजनीतिक दलों को मिलने वाले नकद चंदे की सीमा घटाई गई है, आधार से जुड़े गेटवे के जरिये डिजिटल लेनदेन में तेजी, नकदी जमा करने वाली संदिग्ध मुखौटा कंपनियों के खिलाफ जांच आदि। सरकार ने बेनामी संपत्ति और विदेशी बैंकों में जमा धन के खिलाफ भी कार्रवाई का वायदा किया है। ये सारे कदम स्वागतयोग्य हैं। हालांकि हमारे लोकतंत्र के दैनंदिन जीवन से काले धन और उसके प्रभाव को खत्म करना है, तो कहीं अधिक कदम उठाने की आवश्यकता है। समस्या का मूल सरकारों के सुचारू रूप से काम करने के लिए जरूरी सुधारों की अपर्याप्तता में निहित है। विभिन्न सरकारें काले धन के खिलाफ कार्रवाई करती रही हैं, पर यह सूचनाएं एकत्र करने और नोटिसें वगैरह जारी करने तक सीमित रहा है। काला धन पैदा करने वाले तंत्र पर चोट नहीं की गई है।
काले धन को परमिट राज में फलने-फूलने का मौका मिला। तथ्य यह है कि सरकारी प्रक्रिया आज भी औपनिवेशिक युग जैसी है, जबकि नई सहस्राब्दी में हमारी अर्थव्यवस्था दो खरब डॉलर की हो चुकी है। एक बिजली संयंत्र की स्थापना करने के लिए 90 तरह की मंजूरी लेनी होती है। पर्यटन बड़ी संख्या में रोजगार पैदा करने वाला क्षेत्र है, लेकिन एक होटल शुरू करने के लिए कम से कम सौ तरह की मंजूरी चाहिए होती है।
भारत में निवेश और कारोबार की सुगमता से संबंधित रैंकिंग में यह समस्या स्पष्ट देखी जा सकती है। पिछले वर्ष देश की अर्थव्यवस्था के संबंध में अच्छी खबर आई। विश्व बैंक की कारोबार की सुगमता से संबंधित रैंकिंग में भारत ने 30 स्थान की छलांग लगाकर 190 देशों की सूची में सौवां स्थान हासिल किया। इसका जश्न मनाने का कारण है, क्योंकि इतनी लंबी छलांग इससे पहले नजर नहीं आई।
पर अतिश्योक्ति में उछलने की भी कोई वजह नहीं है। भारत की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, दस में से पांच मामलों में भारत अब भी उप सहारा देशों की तरह फिसड्डी है, फिर वह कोई नया कारोबार शुरू करने का मामला हो, या अनुबंध पर अमल, परमिट, संपत्ति का पंजीयन हो या फिर सीमापार कारोबार। कारोबार शुरू करने के मुद्दे पर जरा गौर कीजिए। विश्व बैंक की रिपोर्ट से पता चलता है कि न्यूजीलैंड में सिर्फ आधा दिन लगता है, 55 देशों में कोई कारोबार शुरू करने के लिए मंजूरी एक हफ्ते में मिल जाती है। ब्रिक्स के पांच देशों में से चार भारत से बेहतर हैं। भारत मलावी, बोत्सवाना और इराक से भी पीछे है। म्यांमार में कारोबार शुरू करने के लिए 14 दिन लगते हैं, जबकि भारत में 29 दिन।
इस देरी की वजह क्या है? इसका संबंध तकनीकी क्षमता से नहीं है। समस्या प्रक्रिया के वर्गीकरण और सूचनाओं तक पहुंच से संबंधित है। इसमें सुधार जरूरी है और संभव है। थाईलैंड ने कारोबार शुरू करने के लिए लगने वाले 25.5 दिन के समय को सिर्फ एक साल में 4.5 दिन तक सीमित कर दिया।
कारोबार की स्थापना के बाद निवेशकों को सबसे बड़ी परेशानी अनुबंध को लागू करवाने में आती है। इसके पीछे कानूनी ढांचे की क्षमता में कमी बड़ा कारण है। भवन निर्माण से संबंधित मंजूरी लेने के मामले में भी भारत ब्रिक्स देशों में सबसे पीछे है। संपत्ति के पंजीयन के मामले में भारत जांबिया से पीछे है और सीमा पार कारोबार के मामले में पपुआ न्यू गिनी से पीछे है।
सरकार ने भरोसा जताया है कि भारत विश्व बैंक की सूची में पचासवें स्थान पर आ सकता है, जिस पर अभी बुलगारिया काबिज है। तीन मानकों पर भारत बुलगारिया से आगे है, लेकिन उसे समय घटाने के लिए प्रक्रिया में सुधार करने की जरूरत है। सवाल यह है कि क्या ऐसा किया जाएगा, क्योंकि व्यवस्था को काहिली ने जकड़ रखा है।
इस सरकार ने रोजगार सृजन और विकास को गति देने के लिए आधारभूत संरचना में काफी निवेश किया है और उम्मीद जगाई है। जिस दिन विश्व बैंक की रिपोर्ट आई, रेलवे मंत्रालय को मुंबई के एलफिंस्टन रेलवे स्टेशन के पुल के पुनर्निर्माण के लिए सेना से आग्रह करना पड़ा, क्योंकि टेंडर जारी करने से लेकर मंजूरी मिलने की प्रक्रिया काफी अव्यवस्थित है और वही भ्रष्टाचार का केंद्र भी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए व्यवस्थित सुधार की जरूरत है। शासन की खामियों की वजह से भ्रष्टाचार पनपता है और अर्थव्यवस्था में काला धन आता है। इसके लिए राजनीति के कारोबारी मॉडल में सुधार की आवश्यकता है; जैसा कि 1974 की फिल्म का शीर्षक गीत है, मंजिलें और भी हैं...।