{"_id":"57c440384f1c1b094b2cb412","slug":"then-meaningless-election-code-of-cunduct","type":"story","status":"publish","title_hn":"ऐसे तो बेमतलब हो जाएगी आचार संहिता","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
ऐसे तो बेमतलब हो जाएगी आचार संहिता
आशीष अग्रवाल
Updated Mon, 29 Aug 2016 07:31 PM IST
विज्ञापन
आशीष अग्रवाल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चुनाव आयोग की नीति-नियामक संस्था संसद है और उससे पारित कानून और नियमों को चुनाव आयोग को लागू करवाना होता है। सिर्फ इतना फर्क होता है -चुनाव के समय चुनाव आयोग के काम में सरकारी दखल नहीं दिखाई देता। यह बात इसलिए गलत नहीं है, क्योंकि सत्तारूढ़ दल चुनाव आचार संहिता से लेश मात्र भी सतर्क या भयभीत नहीं दिखाई देता।
विज्ञापन
ऐसा लगता है, जैसे चुनाव आयोग एक ऐसी संस्था है, जो चुनाव के बाद स्वतः भंग-सी हो जाती है या अस्तित्वहीन हो जाती है, जबकि लोकतंत्र में यही एकमात्र ऐसी संस्था है, जो सर्वाधिक गतिमान और सशक्त दिखाई देनी चाहिए।
विज्ञापन
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की विधानसभाओं के लिए अगले वर्ष होने वाले चुनावों के लिए राजनीतिक दलों ने अभी से प्रत्याशी घोषित करने शुरू कर दिए हैं। वे खर्च की सीमा के बंधन से मुक्त कई महीने पहले ही चुनाव प्रचार शुरू कर चुके हैं, जिन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा है। ऐसे में आदर्श आचार संहिता बेमानी हो गई है।
विज्ञापन
इन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने के लिए कुछ कदम उठाए जा सकते हैं। पहला, सभी दल पूरी तरह से चुनाव की खुलेआम तैयारी कर रहे हैं, जबकि चुनाव में अभी समय है। राजनीतिक दल तैयारी करें, मगर उम्मीदवारों की घोषणा न करें। इससे चुनावी रंजिश पैदा होती है। दूसरा, कोई राजनीतिक दल यदि अपने किसी उम्मीदवार की घोषणा करता है, तो उसका निर्वाचन अधिकार पत्र नामांकन के समय जारी करने के बजाय उम्मीदवारी की घोषणा के साथ ही तत्काल निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराया जाए। तीसरा, राजनीतिक दलों पर यह पाबंदी होनी चाहिए कि एक बार अपने उम्मीदवार की घोषणा के बाद उसे बदले नहीं, और यदि बदलते हैं, तो उन पर जुर्माना लगना चाहिए, क्योंकि आज राजनीतिक दल अपने टिकट बेचते भी हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों पर यह पाबंदी होनी चाहिए कि वे चुनाव आयोग के समक्ष इस बात का शपथ पत्र दें कि किसी को अपना प्रत्याशी बनाने के लिए उन्होंने धन नहीं लिया है। चौथा, यदि किसी उम्मीदवार का चयन करने के लिए उससे धन या अन्य किसी प्रकार का लाभ लिया गया है, तो उस दल का पंजीकरण रद्द करके उसे चुनाव में प्रतिबंधित कर दिया जाए। पांचवां, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों ने अपने होर्डिंग, बैनर, प्रचार-सामग्री लगा दी है। जिला निर्वाचन अधिकारियों से जांच कराकर रिपोर्ट ली जाए और ऐसी सभी प्रचार सामग्री को उस क्षेत्र के प्रत्याशी के चुनाव खर्च में जोड़ दिया जाए, भले ही पार्टी उस क्षेत्र से अपना प्रत्याशी ऐन चुनाव के मौके पर बदल दे। छठा, चुनाव कार्यक्रम की निर्धारित व्यवस्था में अब बदलाव किया जाए। प्रचार की अवधि, चुनाव प्रचार, चुनाव में होने वाले खर्च समाप्त हों। जब संचार और यातायात के साधन नहीं थे, मीडिया, सोशल मीडिया, इंटरनेट, टेलीफोन-मोबाइल नहीं थे, तब प्रचार के लिए दिया जाने वाला समय ठीक था। सातवां,चुनाव की घोषणा के एक हफ्ते के भीतर मतदान होना चाहिए। आठवां, चुनाव आयोग को न केवल अपनी वेबसाइट पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य सोशल साइट्स के जरिये भी, आधार नंबर से मतदाता सूची लिंक होने कारण, मतदान की व्यवस्था करनी चाहिए। नौवां, सचल मतदान केंद्रों की भी व्यवस्था की जाए, जिससे सभी मतदाता मताधिकार का प्रयोग अपने घर पर ही कर सकें।