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ताकि आर्थिक तरक्की में उनकी भी भागीदारी हो

Fri, 29 Aug 2014 06:56 PM IST
श्रीकांत शर्मा
श्रीकांत शर्मा Updated Fri, 29 Aug 2014 06:56 PM IST
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Their participation in the economic growth

प्रधानमंत्री जन-धन योजना की शुरुआत कई मामले में ऐतिहासिक है। इसने आर्थिक विकास को एक जनांदोलन का रूप देने की कोशिश की है। वित्तीय समायोजन की इस योजना के पीछे एक विराट सामाजिक उद्देश्य है। आर्थिक छुआछूत मिटाने की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विगत 11 जून को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देते हुए विकास को जन आंदोलन बनाने का आह्वान किया था। इस महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा उन्होंने 15 अगस्त को लाल किले से की थी। पंद्रह दिन से भी कम समय में उन्होंने इसे लागू कर दिखाया। इस योजना को सफल बनाने के लिए उन्होंने बैंक अधिकारियों को 7.25 लाख ई-मेल भेजे। वित्त मंत्रालय ने भी अथक प्रयासों से इस योजना के तहत 7.5 करोड़ परिवारों के बैंक खाते 26 जनवरी से पहले खोलने का लक्ष्य तय किया है।

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प्रधानमंत्री जन-धन योजना का उद्देश्य देश में सभी परिवारों को बैंकिंग सुविधाएं मुहैया कराना और हर परिवार का एक बैंक खाता खोलना है। इसके तहत प्रत्येक व्यक्ति को एक डेबिट कार्ड, एक लाख रुपये का दुर्घटना बीमा और 5,000 रुपये के ओवर ड्राफ्ट (उधार) की सुविधा मिलती है, लेकिन प्रधानमंत्री ने जन उत्साह को देखते हुए 26 जनवरी से पहले बैंक खाता खुलवाने वालों को अतिरिक्त 30,000 रुपये का जीवन बीमा देने की घोषणा भी की है। आगे चलकर उन्हें बीमा और पेंशन उत्पादों के दायरे में लाया जाएगा। पूर्व में चलाए गए वित्तीय समावेशन के कार्यक्रमों से यह अभियान इसलिए भिन्न है कि पहले जहां चुनिंदा गांवों पर ही सरकार का ध्यान रहता था, वहीं इस योजना में हर परिवार को लक्ष्य बनाया गया है। इसके अलावा ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों को इस योजना में शामिल किया जा रहा है, जबकि पहले केवल ग्रामीण क्षेत्रों को ही इसमें रखा गया था।
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2011 की जनगणना के अनुसार, देश में सिर्फ 59 प्रतिशत परिवारों के पास ही बैंकिंग सुविधा है। शहरों में 68 प्रतिशत और गांवों में 54 फीसदी परिवारों की पहुंच ही बैंकिंग सुविधा तक है। यानी आजादी के छह दशक बाद भी देश के करीब 10 करोड़ परिवार बैंकिंग सुविधा से वंचित हैं। जिस देश में आबादी का बड़ा हिस्सा बैंकिंग तंत्र से अछूता हो, वह गरीबी के कुचक्र को नहीं तोड़ सकता। बैंकिंग सुविधाओं के अभाव में किसानों और मजदूरों का साहूकारों के चंगुल में फंसना एक कटु सत्य है। वे मामूली कर्ज भी लेते हैं, तो उसके बदले साहूकार को कई गुना ज्यादा ब्याज चुकाते हैं।
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साधनहीन लोगों के पास बैंक खाते होने से उनकी आर्थिक स्वतंत्रता अब संभावनाओं के नए द्वार खोलेगी। योजना शुरू होते ही जिस तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग खाता खुलवाने के लिए उमड़े, वह इस बात द्योतक है कि लोग सदियों से पड़ी आर्थिक बेड़ियां तोड़कर अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं। देश की तरक्की में गरीबों की समान भागीदारी तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब समाज के सभी वर्ग अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से जुड़े हों।


बैंक खाता खुल जाने के बाद हर परिवार को बैंकिंग और कर्ज की सुविधाएं सुलभ होंगी। इससे उन्हें साहूकारों के चंगुल से निकलने, आपातकालीन जरूरतों के चलते पैदा होने वाले वित्तीय संकटों से खुद को दूर रखने और तरह-तरह के वित्तीय उत्पादों से लाभान्वित होने का मौका मिलेगा। गरीबों के पास खाता होने पर सरकारी योजनाओं की धनराशि भी सीधे उनके खाते में ट्रांसफर की जाएगी, जिससे भ्रष्टाचार खत्म होने की भी उम्मीद की जानी चाहिए।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सचिव हैं)

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