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कृष्णमूर्ति के जीवन का अनजाना पक्ष

Sun, 27 Dec 2020 02:18 AM IST
गौतम चटर्जी गौतम चटर्जी
गौतम चटर्जी Published by: गौतम चटर्जी Updated Sun, 27 Dec 2020 02:18 AM IST
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सार
  • प्रो. पद्भनामन कृष्णा की नई किताब जिद्दू कृष्णमूर्ति के अनजाने पक्ष को बेहद रोचक ढंग से हमारे सामने रखती है।
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The unknown side of Krishnamurti's life

विस्तार

मनुष्य चेतना की विश्व मनीषा में जिद्दू कृष्णमूर्ति एक प्रेरक नाम है, जो जीवन भर अपने आचरण में विश्व शिक्षक रहे। उनका बचपन एनी बेसेंट के प्रकाश में विकसित हुआ और इससे पहले कि उस प्रकाश की छाया में वह वयस्क होते, उन्हें अपना प्रकाश मिल गया। उन पलों में वह बिल्कुल युवा थे और उस साहस को अर्जित कर सके थे कि कह सकें कि सत्य का कोई मार्ग नहीं है, कोई संगठित धर्मसंघ सत्य का पता बता नहीं सकता, और यह स्वयं प्रकाशित होता है। सतही ज्ञान सिखाया जा सकता है, लेकिन इस गहरे ज्ञान को स्वयं ही सीखना पड़ता है। कृष्णमूर्ति थियोसॉफिकल सोसाइटी से अलग हुए, अपना कोई संगठन नहीं बनाया और पूरी दुनिया को सत्य के प्रति प्रेरित और शिक्षित करते रहे। वर्ल्ड कॉन्शसनेस और कॉस्मिक मेमोरी यानी वैश्विक चेतना और आकाशिक स्मृति पर आज दुनिया भर के दार्शनिक और मस्तिष्क विज्ञानी शोध कर रहे हैं, और हाल ही में आई एक किताब इस विषय पर प्रकाश डाल सकती है।



कृष्णमूर्ति की जन्मशती के बाद पच्चीस वर्ष पूरे होने पर प्रोफेसर पद्भनाभन कृष्णा ने एक किताब लिखी है, ए ज्वेल ऑन ए सिल्वर प्लैटर। प्रो. कृष्णा काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं। उन्हें कृष्णमूर्ति को करीब से देखने, सुनने और समझने का लगातार अवसर मिलता रहा। बनारस में नदी के किनारे राजघाट पर कृष्णमूर्ति फाउंडेशन है। बनारस आने पर कृष्णमूर्ति इसी परिसर में ठहरते। उनके न रहने पर ऊपर के हिस्से में कृष्णमूर्ति से संबंधित सामग्री जिज्ञासुओं के लिए उपलब्ध की गई है। इसके निचले हिस्से में प्रो. कृष्णा 1986 से आकर रहने लगे, क्योंकि उन्हें कृष्णमूर्ति ने ही आकर रहने का अनुरोध किया था। अब तक कृष्णमूर्ति द्वारा लिखी और कृष्णमूर्ति पर लिखी किताबें तो पाठकों ने पढ़ी हैं, पर इस किताब में ऐसा बहुत कुछ है, जो इससे पहले जाना नहीं गया है। 


लेखक ने कृष्णमूर्ति के साथ अपनी व्यक्तिगत और सार्वजनिक लंबी बातचीत तो प्रस्तुत की ही है, ऐसे संवाद भी अविकल रख दिए हैं, जिनमें असित चांदमल, अच्युत पटवर्धन, राधा बर्नियर, डेविड बॉम आदि विद्वानों के साथ वह स्वयं भी उपस्थित रहे थे। लेखक ने इन विद्वानों के भी अलग से साक्षात्कार लिए हैं, ताकि बहुत-सी ऐसी बातें उद्घाटित हो सकें, जो अब तक धुंध में रही हैं। जैसे उन्होंने अच्युत पटवर्धन से यह जानने की कोशिश की है कि थियोसॉफिकल सोसाइटी से कृष्णमूर्ति के अलग हो जाने के कारण क्या थे। पटवर्धन कृष्णमूर्ति से दस साल छोटे थे और 1915 में पिता के साथ चेन्नई से मुंबई जा रहे थे, तब ट्रेन में कृष्णमूर्ति और उनके भाई नित्या से पहली बार उनकी मुलाकात हुई थी। 

फिर उन्होंने कृष्णमूर्ति को 1922, 23 और फिर 1925 में सुना, जब वह थियोसॉफिकल सोसाइटी के एक अधिवेशन में आए हुए थे। कृष्णमूर्ति ब्रह्म समाज की पूजा के दौरान एक वेद मंत्र का पाठ उपयुक्त संस्कृत उच्चारण के साथ कर रहे थे। कृष्णमूर्ति के पाठकों के लिए अब तक अनजाना यह पक्ष कौतूहल से भरा हो सकता है। वर्ष 1948 दोनों हिमालय की एक कुटिया में साथ ठहरे थे। एक रात कृष्णमूर्ति ने एकाएक उठकर अच्युत पटवर्धन से पूछा कि 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने किसी की हत्या कैसे की थी। पटवर्धन ने बताया कि एक बार वह कहीं जा रहे थे कि एक ग्रामीण उनकी कार के नीचे आ गया। वह उसे अस्पताल तक ले गए, पर देर हो चुकी थी। उन्होंने कृष्णमूर्ति से चकित होकर पूछा कि इस घटना के बारे में जानकारी किसी को नहीं है, फिर उन्हें कैसे पता चली।

कृष्णमूर्ति ने कहा कि यह सब कहीं लिखा हुआ है। प्रो कृष्णा लिखते हैं कि अच्युत जी ने मुझे बताया कि यह आकाशिक स्मृति यानी कॉस्मिक मेमोरी है, जिसे कृष्णमूर्ति जैसी कोई प्रज्ञावंत चेतना ही पढ़ सकती है। कृष्णमूर्ति कहा करते थे कि हमारा मस्तिष्क व्यक्तिगत मस्तिष्क नहीं, बल्कि एक ऐसा विशेष मस्तिष्क है, जो हजारों साल में विकसित हुआ है। यह विकसित
मस्तिष्क हम सब का मस्तिष्क है, जो पूरी पृथ्वी पर है, अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही मस्तिष्क। इसकी चेतना के तत्व पूरी दुनिया में एक ही हैं, जैसे ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, दुख, भय, असुरक्षा की भावना, प्रेम करने और पाने की इच्छा आदि। मनुष्य चेतना को इनसे रिक्त किया जा सकता है। ऐसी रिक्त चेतना में वह ऊर्जा समुचित ढंग से क्रियाशील हो सकती है, जो पूरे ब्रह्मांड में शाश्वत रूप से क्रियाशील है। मनुष्य को अपनी सीमित क्षुद्रताओं से ऊपर उठकर इस अक्षुण्ण गरिमा को फिर से अर्जित करना है, ताकि पृथ्वी स्वस्थ हो सके।

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