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रिकॉर्ड पैदावार के अनुमानों के बीच खुले में बर्बाद होते अन्न की कहानी

Tue, 07 May 2019 06:35 AM IST
devendr sharma देविंदर शर्मा
Updated Tue, 07 May 2019 06:35 AM IST
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The story of wasted food in the open
देविंदर शर्मा, कृषि नीति विशेषज्ञ
लोकतंत्र के सबसे बड़े त्योहार आम चुनावों के बीच गेहूं कटाई का मौसम शवाब पर है। 'अन्न का कटोरा' यानी पंजाब और हरियाणा में गेहूं की कुल कितनी पैदावार होगी इसका आधिकारिक आंकड़ा आने में वक्त लगेगा, लेकिन आरंभिक अनुमानों के मुताबिक इन दोनों राज्यों में रिकॉर्ड 310 लाख टन की पैदावार हो सकती है।

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पंजाब में 180 लाख टन गेहूं की पैदावार होने की उम्मीद है, जबकि पड़ोसी राज्य हरियाणा 130 लाख टन की बंपर पैदावार की अपेक्षा कर रहा है। इस बार सर्दियों के मौसम के लंबा खिंचने के कारण गेहूं की कटाई में देरी हुई है, लेकिन इसने उत्पादकता बढ़ाने में मदद की है। इस साल पंजाब में राष्ट्रीय औसत 32 क्विंटल की तुलना में प्रति हेक्टेयर 52 क्विंटल गेहूं होने की उम्मीद है। लेकिन संग्रहण की पर्याप्त और उचित व्यवस्था के अभाव ने गेहूं की इस जबर्दस्त पैदावार से पैदा हुए उत्साह को ठंडा कर दिया है। इन दोनों राज्यों से गुजरते हुए देख सकते हैं कि किस तरह से राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे मंडियों के बाहर गेहूं के ढेर पड़े हुए हैं। गेहूं कटाई के मौसम के चरम पर पंजाब में गेहूं की नई आवक के रख-रखाव के लिए शायद ही कोई ऐसी जगह हो, जहां गेहूं को ढक कर रखा जा सके। पिछले साल का 12 लाख टन गेहूं का स्टॉक पहले ही खुले में पड़ा हुआ है, जिसे तकनीकी रूप से कवर्ड एेंड प्लिंथ (कैप) स्टोरेज कहा जाता है और इसका मतलब है कि अन्न से भरे गेहूं के बोरे खुले आसमान के नीचे पड़े हुए हैं, जिन्हें काले तिरपालों से ढक दिया गया है।

पंजाब के पास 158.5 लाख टन कवर्ड स्टोरेज क्षमता है, जिनमें पिछले मौसम में खरीदे गए 143 लाख टन चावल और गेहूं रखे हुए हैं।इसके अलावा इसके पास कैप स्टोरेज के रूप में 75 लाख टन संग्रहण की अतिरिक्ति क्षमता है, जिनमें पिछली बार का 12 लाख टन अन्न रखा हुआ है। इसके अलावा राइस मिलों से 20 से 22 वैगन चावल यहां पहुंचने की उम्मीद है। चू्ंकि चावल के रख-रखाव में नुकसान से बचने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है, इसलिए इसे हमेशा ढकी हुई जगहों पर रखा जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो गोदामों में रखे जाने के लिए चावल को हमेशा पहली प्राथमिकता मिलती है। साल दर साल वही कहानी दोहराई जा रही है। इस साल 132 लाख टन गेहूं की खरीद का अनुमान है और खरीदा गया अधिकांश गेहूं खुले में पड़ा रहेगा।

पिछले साल भी जब मंडियों में नए गेहूं की आवक शुरू हुई थी, तब पहले के स्टॉक का 20 लाख टन गेहूं खुले में पड़ा हुआ था। मुझे याद है कि खरीद के मौसम के चरम पर 70 लाख टन ताजा आवक को कैप स्टोरेज के तहत खुले में रखना पड़ा था। प्राथमिक तौर पर ऐसा पिछले साल खरीदे गए चावल और गेहूं की निकासी न कर पाने की अक्षमता के कारण हुआ। तकरीबन 90 लाख टन गेहूं को पिछले साल खुले में रखना पड़ा था, जिसमें से 12 लाख टन गेहूं अब भी खुले में पड़ा हुआ है।

स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है, बशर्ते कि संगृहीत अन्न को जितनी जल्द हो सके राज्य से बाहर भेजा जाए। पंजाब के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति सचिव के ए पी सिन्हा ने कहा है कि हम खरीद मौसम के अंत तक संग्रहण की जगह खाली करवा लेंगे। मैं समझ सकता हूं कि हर साल राज्य प्रशासन को नौकरशाही से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, वह भी दो बार। एक बार तब जब गेहूं की आवक होती है और कुछ महीने बाद दूसरी बार तब जब धान की खरीद का मौसम आता है। तथ्य यह है कि हर बीतते साल में अन्न संग्रहण का संकट बदतर होता जा रहा है। करीब तीस वर्षों से तो मैं देख रहा हूं कि अन्न संग्रहण की कैसी बदइंतजामी है। वार्षिक खाद्य उत्पादन का लक्ष्य तय करना तो नीतिगत एजेंडा होता है, लेकिन गेहूं और चावल के खरीदे गए एक-एक दाने का प्रबंधन करना राजनीतिक प्राथमिकताओं में सबसे निचले क्रम पर है। भरपूर- बंपर पैदावार और बढ़ते खाद्य अपव्यय का यह विचित्र विरोधाभास खाद्य प्रबंधन के सभी कानूनों को धता बताता है। मैं नहीं समझ पाता कि कैसे नीति नियंता इसकी वजह से होने वाली खाद्यान्न की बर्बादी की ओर से आंखें मूंदे रहते हैं।

मुझे हमेशा यह लगता है कि खाद्यान्न की बर्बादी रोकने की अपेक्षा सिर्फ किसान से ही की जा सकती है; मानो खरीदे गए कीमती खाद्यान्न को बर्बाद करना सरकार का अधिकार हो। निरंकुशता के साथ संगृहीत खाद्यान्न की गुणवत्ता को खराब होने दिया जाता है, जिससे यह अक्सर मनुष्यों के खाने लायक नहीं रह जाता। यह एक राष्ट्रीय शर्म की बात है। आखिर खाद्यान्न के संग्रहण के लिए गोदामों के निर्माण के लिए राॅकेट साइंस की जरूरत नहीं है। हर बार जब भी मैं यह सुनता हूं कि सरकार बुनियादी ढांचे में निवेश करने जा रही है, तो बाद में पता चलता है कि इससे सुपर हाइवे का निर्माण किया गया। मैं हाइवे के फैलते नेटवर्क के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन इसके अलावा ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां सार्वजनिक धन का निवेश करने की जरूरत है। 2017 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2022 तक 83,677 किलोमीटर लंबी सड़कों के निर्माण के लिए 6.92 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की थी। यदि उन्होंने इसमें से सिर्फ एक लाख करोड़ रुपये खाद्यान्न स्टोरेज क्षमता बढ़ाने के लिए रख दिए होते, तो खाद्यान्न के बर्बाद होने की समस्या से निजात मिल जाती।  

इससे पहले यूपीए सरकार ने देशभर में ढाई लाख पंचायतों में पंचायत घर का निर्माण करवाया था। उस समय भी मैंने देशभर में खाद्यान्न गोदाम के निर्माण के लिए निवेश करने का सुझाव दिया था। वाकई टेलीविजन पर आने वाली गोदामों में बर्बाद होते खाद्यान्न या मंडियों में बारिश से भीगते खाद्यान्न के बोरों की तस्वीरें कभी भुलाई नहीं जा सकती। खासकर तब और जब 119 देशों के ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 103 वें स्थान पर हो। दुनिया की एक चौथाई भूख से पीड़ित आबादी भारत में रहती है, एक ऐसे देश में जहां रख रखाव के अभाव में भारी मात्रा में खाद्यान्न को बर्बाद होने दिया जाता है। मैं अब भी नहीं समझ पा रहा हूं कि यह मुद्दा राजनीतिक प्राथमिकता क्यों नहीं बन पा रहा है।  

 
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