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सही नहीं है गरीबी का मानक

Fri, 26 Jul 2013 08:12 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 26 Jul 2013 08:12 PM IST
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The standard of poverty is not true

गरीबी पर योजना आयोग के ताजा आकलन ने देश में आक्रोशजनित बहस पैदा कर दी है। गरीबी का मखौल उड़ाने वाले इस आकलन पर तमाम अर्थशास्त्री हैरानी जता रहे हैं। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य डॉ विजय शंकर व्यास से विजय गुप्ता ने बातचीत की -

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योजना आयोग ने वर्ष 2011-12 में प्रति व्यक्ति खपत के आधार पर देश की आबादी में गरीबों का जो आकलन किया है, क्या आप उससे सहमत हैं?
जी नहीं, क्योंकि योजना आयोग के इस सर्वे में शिक्षा और स्वास्थ्य पर, जो मूलभूत आवश्यकताएं हैं, खर्च कम दिखाया गया है। इस सर्वे का केंद्रबिंदु सिर्फ खाने-पीने पर ही रहा है, जो सही नहीं है। इसीलिए इस सर्वे को पूर्ण नहीं कहा जा सकता। हकीकत यह है कि जब तक आम आदमी की सभी मूलभूत आवश्यकताओं पर किए जाने वाले खर्च का औसत सर्वे में शामिल नहीं होगा, तब तक गरीबी का आकलन आधा-अधूरा ही रहेगा।
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तो क्या यह माना जाए कि गरीबी तय करने का पैमाना ही गलत है?
बिल्कुल। यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि गरीबी तय करने का जो फॉर्मूला प्रयोग किया जा रहा है, वह आधा-अधूरा है। इसलिए इस फॉर्मूले से इस निष्कर्ष पर पहुंचना, कि वर्ष 2011-12 में गरीबों की संख्या कम हो गई है, मुझे नहीं लगता। हालांकि इस मुद्दे पर एक अन्य रंगराजन समिति भी काम कर रही है। उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही किसी सही निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।
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गरीबी तय करने के लिए आयोग ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजाना किए जाने वाले जिस खर्च को मानक बताया है, क्या वह सही है?
जब गरीबी तय करने का फॉर्मूला ही आधा-अधूरा है, तब खर्च के आधार पर गरीब या अमीर तय करने का क्या मतलब? खर्च के हिसाब से हैसियत तय करने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रहन-सहन और खान-पान का औसत निकालना जरूरी है। लेकिन इसे राष्ट्रीय औसत मानना भी गलत है, क्योंकि बड़े शहर, छोटे शहर और गांवों में हर वस्तु के दाम अलग-अलग हो सकते हैं। न सिर्फ खाद्य, बल्कि रोजमर्रा उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में भी भिन्नता होती है। इसलिए यदि खर्च के हिसाब से गरीबी या अमीरी तय करनी है, तो सभी राज्यों का अलग-अलग आकलन (जिसमें खाद्य वस्तुओं के अलावा रहन-सहन व शिक्षा-स्वास्थ्य का खर्च भी शामिल हो) करना होगा। ऐसे में खर्च की एक सीमा तय कर देना, और उस आधार पर गरीबी रेखा तैयार करने का कोई औचित्य नहीं दिखाई देता।
तेजी से बढ़ती महंगाई के बीच आम आदमी के लिए सीमित आय में परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में आयोग का तेजी से गरीबी घटाने का आकलन क्या हकीकत से दूर नहीं?
यह सही है कि सरकार के प्रयासों के बाद भी महंगाई पर ज्यादा अंकुश नहीं लग सका है। पर यह नहीं भूलना चाहिए कि महंगाई के कई अन्य कारण भी हैं। मसलन, उसमें वैश्विक परिस्थितियां भी शामिल हैं। लेकिन यह भी सही है कि जिस तरह से कीमतें बढ़ी हैं, उस लिहाज से लोगों की आय भी बढ़ी है और उसके रहन-सहन में भी परिवर्तन हुआ है। लेकिन इससे गरीबी कम हो रही है, ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता।
सरकार मजबूत अर्थव्यवस्था को तेजी से गरीबी घटाने का जरिया मानती रही है। पर अर्थव्यवस्था की अच्छी तस्वीर सामने नहीं आ रही है। क्या अभी कुछ और कदम उठाने की जरूरत है?

अर्थव्यवस्था की मौजूदा तस्वीर के पीछे घरेलू से ज्यादा वैश्विक कारक जिम्मेदार हैं। सरकार ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं। हालांकि इन कदमों की आलोचना भी हो रही है, पर अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए यह समय की जरूरत है। यह भरोसा है कि इन कदमों का असर भी जल्द दिखना शुरू हो जाएगा।

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