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जीने का अधिकार और धारा 309
सरोज कुमारी
Updated Thu, 18 Dec 2014 01:05 AM IST
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केंद्र सरकार ने आत्महत्या के प्रयास से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को समाप्त करने की विधि आयोग की अनुशंसा को मान लिया है। यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है, जिस पर लंबे समय से बहस चल रही है। चूंकि कानून व्यवस्था राज्यों का विषय होने से इस बदलाव के लिए राज्यों का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि 18 राज्य तथा चार केंद्र शासित प्रदेश जहां धारा 309 को समाप्त किए जाने के पक्ष में हैं, वहीं बाकी राज्यों ने कुछ पहलुओं को अधिक स्पष्ट करने की बात कही है।
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विधि आयोग ने 1971 में अपनी 42वीं रिपोर्ट में इसको समाप्त करने की अनुशंसा की थी, 1978 में इससे संबंधित बिल भी राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा भंग होने के कारण वह बीच में लटक गया। मगर 1996 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आईपीसी की धारा 309 संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है, जिसमें जीने का अधिकार निहित है। इसके बाद 1997 में सर्वोच्च न्यायालय ने ज्ञानकौर बनाम पंजाब मामले में पुनः इसे बनाए रखने के पक्ष में निर्णय दिया, जिस पर विधि आयोग ने सहमति दिखाते हुए अपनी 156वीं रिपोर्ट पेश की। लेकिन आयोग ने 210वीं रिपोर्ट में धारा 309 को भारतीय दंड संहिता से हटाने की अनुशंसा कर दी है। विधि आयोग के प्रतिवेदनों, सर्वोच्च न्यायालय के समय-समय पर प्रकट किए गए विचार तथा इससे संबंधित बिल का संसद में पेश होना, इन सबसे जाहिर होता है कि धारा 309 को हटाने की आवश्यकता काफी वर्षों से महसूस की जा रही है।
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वर्ष 1860 में प्रथम विधि आयोग की अनुशंसा पर भारतीय दंड संहिता को लागू किया गया था। तब की ब्रिटिश सोच और भारतीय समाज की दशाओं की अनुकूलता के कारण कानूनों में उनका प्रतिबिंब देखा जा सकता है। उस समय ब्रिटिश कैथोलिक धर्म हो या भारतीय सनातन धर्म, िकसी में आत्महत्या स्वीकार्य नहीं थी। शायद इसलिए आत्महत्या के प्रयास को कानूनी रूप से दंडनीय बनाया गया। स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत के अलावा पाकिस्तान और म्यांमार में शीर्षक बदलकर भारतीय दंड संहिता को ज्यों का त्यों लागू किया गया। आज कुछ ही देशों में आत्महत्या का प्रयास अपराध है।
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विधि आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह मानवीय आधार पर लिया गया निर्णय है, जिसमें आत्महत्या का प्रयास अब अपराध नहीं होगा। ऐसे व्यक्ति को सही सलाह और देखभाल की जरूरत है, जेल भेजने की नहीं। आत्महत्या का प्रयास एक अत्यंत सख्त कदम है, लेकिन ऐसे व्यक्ति पर अभियोग चलाने और उसे जेल भेजने जैसी सजाओं के कारण आत्महत्या के दूसरी बार प्रयास को रोकना नामुमकिन है। आत्महत्या का दूसरा प्रयास अधिक गहनता से अंजाम दिया जाएगा, ताकि बचने की संभावना ही खत्म हो जाए। आत्महत्या को मानसिक स्वास्थ्य के साथ जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसके पीछे सामाजिक, पारिवारिक, यातना, पीड़ा और आर्थिक हानि जैसे कारण भी होते हैं। इसे लेकर राज्यों की अनेक आशंकाएं हैं। बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली तथा पंजाब राज्यों का मानना है कि इससे एक आत्मघाती हमलावर को भी बचाव का मौका मिलेगा। दूसरा सरकारी नीतियों के विरोध में होने वाले प्रदर्शनों में आमरण अनशन की तीव्रता और अधिक बढ़ जाएगी। इस तरह के प्रयास कानून लागू करने वाली एजेंसियों के प्रयासों को पंगु बना सकते हैं।
309 को हटाने का मुख्य आधार आत्महत्या करने वाले को आपराधिकता से बचाना है। लेकिन सुसाइड बॉम्बर या साइनाइड की गोलियां खाकर जान देने के प्रयास मात्र आत्महत्या के प्रयास नहीं हैं, इसमें क्रमशः व्यापक विनाश तथा महत्वपूर्ण तथ्यों को समाप्त कर पुलिस जांच में बाधा पहुंचाने की मंशा भी छिपी हुई है, जिसके लिए भारतीय दंड संहिता में अलग से सजा के प्रावधान हैं। यह भी समझने की जरूरत है कि सबके सामने किसी अनुचित मांग के लिए आत्मदाह करने वाले को सजा अवश्य मिलेगी, क्योंकि गैरकानूनी तथा गैरमानवीय तरीके से किसी का विरोध प्रकट नहीं किया जा सकता तथा यह कृत्य सामाजिक लोकव्यवस्था के प्रतिकूल होने के कारण दंडनीय होगा। पुलिस की जांच हर आत्महत्या या आत्महत्या के प्रयास में अवश्य होनी चाहिए, ताकि आत्महत्या, हत्या या आत्महत्या के लिए उकसाने वाले तथ्यों का पता लगाया जा सके। आत्महत्या को उकसाने या बाध्य करने वाले के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत 10 वर्ष की सजा का प्रावधान है।
आत्महत्या मानसिक रोग के बजाय सामाजिक परिस्थितियों से उत्पन्न संघर्ष की नकारात्मकता तथा स्व-समर्पण को इंगित करती है, ऐसे में उन परिस्थितियों का अध्ययन करना या जांचना-परखना अत्यंत आवश्यक है। महिलाओं की आत्महत्या करने के पीछे अक्सर शारीरिक, मानसिक और घरेलू उत्पीड़न अधिक जिम्मेदार होते हैं और यह सब अब भी कानूनी जांच के दायरे में हैं। धारा 309 केवल आत्महत्या के प्रयास को अपराधीकरण के दायरे में लाकर उसे सजायोग्य बनाती है, इसलिए इसे हटाना अत्यन्त आवश्यक है। यह भी सच है कि आत्महत्या का प्रयास करने वालों में से 80 प्रतिशत को यह जानकारी भी नहीं है कि आत्महत्या का प्रयास आपराधिक कृत्य है। ऐसे व्यक्ति के प्रति सहानुभूति होनी चाहिए और उसकी काउंसलिंग की व्यवस्था की जा सकती है। उसे इस हद तक पहुंचाने वाले उत्तरदायी कारकों की जांच परख भी अत्यंत आवश्यक है।
वास्तव में भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को हटाना हमारी प्रगतिशील सोच को इंगित करता है, कि हम कानूनों की उपयोगिता, प्रासंगिकता और उसकी महत्ता पर विचार करते हैं और समय की मांग के अनुरूप अप्रांसगिक कानूनों को हटाने का फैसला लेते हैं।
लेखिका गुजरात में पदस्थ आईपीएस अधिकारी हैं