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पानी से शहरों का टूटता रिश्ता, देबजानी भट्टाचार्य से जानिए इसकी वजह
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सड़कों पर भरा पानी
- फोटो : अमर उजाला
विगत 20 मई को बंगाल डेल्टा के जरिये जो सुपर साइक्लोन आया था और जिसने सुंदरबन के तटबंधों को तोड़ दिया और कोलकाता के एक बड़े हिस्से को जलमग्न कर दिया, वह अब एक छमाही पर्यावरणीय रिवाज बन गया है। उस सुपर साइक्लोन ने स्पष्ट किया कि कंकरीट का शहर कोलकाता डेल्टा क्षेत्र की पारिस्थितिकी से कितनी गहराई से जुड़ा हुआ है। कोलकाता की सड़कों पर भरे हुए पानी ने मानव निर्मित प्रशासनिक सीमाओं को धुंधला कर दिया, जो कोलकाता की शहरी नगरपालिका को सुंदरबन के दलदली जंगलों से अलग करती है।
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अम्फान नामक उस चक्रवात के बाद हममें से कुछ लोगों ने बाढ़ग्रस्त कोलकाता हवाई अड्डे के हैंगर में आधे डूबे विमानों की छवियां देखीं। हमने उत्तर कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट में एशिया के दूसरे सबसे बड़े पुस्तक बाजार में किताबों को तैरते देखा। थोड़ी देर के लिए डेल्टा ने शहर को उसके बिसरे हुए पानी से उत्पत्ति की याद दिला दी।
बढ़ता प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन मानसून को अस्थिर करते हैं, जिसने भारतीय मौसम विभाग को जनवरी, 2020 में मानसून की शुरुआत की तारीख संशोधित करने के लिए मजबूर कर दिया था। इसलिए यह अनिवार्य हो गया है कि हम गर्म होते हिंद महासागर और उष्णकटिबंधीय मानसून प्रणाली के शीर्ष बिंदु से भारतीय शहरों के अतीत एवं भविष्य की पड़ताल करें।
यह सिर्फ कोलकाता की कहानी नहीं है। पिछले कुछ हफ्तों में भारत के उत्तर-पश्चिमी सूखे इलाके में भारी बारिश से जयपुर जैसे शहरों में भारी बाढ़ आ गई है, तो गुरुग्राम की सड़कें पानी में डूब गई हैं। इस बीच मुंबई में अरब सागर में अतिक्रमण सामान्य बात हो गई है। चेन्नई में जल संकट ने अपना भयंकर रूप प्रकट किया है। 2015 की बाढ़ ने स्पष्ट कर दिया कि रियल एस्टेट के विकास के लिए जल निकासी का मार्ग अवरुद्ध कर दिया गया था।
वर्ष 2015 में जहां चेन्नई में बाढ़ आ गई थी, वहीं 2019 में शहर के सारे जलाशय सूख गए थे। चेन्नई के जल संकट की जड़ के बारे में सामाजिक कार्यकर्ता और विद्वान नित्यानंद जयरमण ने बताया कि ऐसा इस कारण हुआ, क्योंकि शहर ने पानी के साथ अपना अटूट रिश्ता खत्म कर लिया। कोलकाता और मुंबई के लिए भी यही कहा जा सकता है, जहां नदियों, समुद्रों, दलदल, गलियों और घरों में रिसने वाले पानी का बढ़ता संकट पिछली डेढ़ सदी में लागू न किए गए कानूनी फैसलों और योजनागत निर्णयों का नतीजा है।
कोलकाता के शहरीकरण के इतिहास पर नजर डालें, तो हमें इसका जवाब मिल सकता है कि शहरी स्थिति को समझने के लिए पानी को कैसे केंद्र बनाया जा सकता है-जो न केवल नल के जरिये, बल्कि जो पानी ऊपर बादलों में है, मिट्टी के नीचे है, झीलों में है, पोखरों में है और हमारे शहरों के चारों तरफ दलदली जमीन में है।
भारतीय शहरों में पाइप के जरिये पानी पहुंचाने पर ज्यादा ध्यान दिया गया है, क्योंकि स्वच्छ पानी तक पहुंच अब भी जाति और वर्ग के बीच लड़ाई का कारण बनी हुई है। जबकि दलदल, खाई और बादलों में पाए जाने वाले पानी मुख्यधारा की चर्चा से गायब हो गए हैं। 19 वीं सदी के शुरुआती दशकों में कोलकाता के पश्चिमी किनारे पर हुगली नदी के तट पर कीचड़ भरे लंबे भूखंड और पूर्वी किनारे पर खारे दलदल विस्तृत होते शहर के आकर्षक रियल एस्टेट बाजार के लिए ठोस संपत्ति में तब्दील हो गए थे।
मुनाफा कमाने की सोच ने इस कीचड़ भरे, मैले, जल क्षेत्र को बेचने योग्य भूखंडों में बदल दिया, जो बढ़ते रियल एस्टेट बाजार में आसानी से बेचे जा सकते थे। 20 वीं शताब्दी तक, तालाबों, दलदलों और नहरों के बहुतायत उपयोगों को भुला दिया गया और कोलकाता में शहरीकरण की एक सीमा के रूप में दलदलों का उदय हुआ, जिसे रंगून और मुंबई की तरह सक्रिय श्रमिक वर्ग की राजनीति और गंभीर आवास संकट के रूप में चिह्नित किया गया। 1920 के दशक में नगरपालिका की उग्र बहसों ने इस बात की पुष्टि की कि अच्छा जमींदार वह था, जिसने दलदल को आवास में बदल दिया।
इस तरह से लैंड डेवलपर का जन्म हुआ, जो शहरी राजनीति में एक प्रमुख राजनीतिक छवि के रूप में उभरा। वास्तव में, बेकार दलदल के बदले आवास विकास से किए गए मुनाफे में बढ़ोतरी ने 1950 के दशक में कोलकाता के पड़ोस में समृद्ध सॉल्ट लेक बनाने के लिए नमक के विस्तृत दलदल को खाली करने के लिए प्रोत्साहित किया।
इस तरह का विकास निर्बाध रूप से जारी है और कोलकाता के पूर्वी किनारे के दलदल को अचल संपत्ति में बदल दिया गया है, जो कि जल जमाव के लिए उपयुक्त था। 20 वीं शताब्दी के मुंबई में भी ऐसा ही हुआ, जहां शहरीकरण के साधन के रूप में अकूत मुनाफा कमाने के लिए भूमि-पुनर्विकास ने समुद्र को आवासीय संपत्ति में बदल दिया।
इसमें कोई हैरानी नहीं कि आज जिस तरह कोलकाता में नियमित रूप से बाढ़ आती है या वर्ष 2050 तक मुंबई के कुछ हिस्से के जलमग्न होने की जो आशंका जताई जताई जा रही है, यह स्थिति दरअसल पिछली एक शताब्दी में बनी है। यह कहना आसान होगा कि यह शहर के डिजाइन की विफलता थी, लेकिन ऐसा नहीं था।
इसके बजाय दलदल को देखने का वह तरीका गलत था, जिसने उसे आर्थिक रूप से बंजर समझा और धरती की दरारों और गड्ढों को मिटाकर (जिससे पानी का बहाव होता था) उसे लाभदायक आवास में बदलने की जरूरत महसूस की। जयरमण की बात को दोहराते हुए यह कहना सही होगा कि हर शहर का पानी के साथ रिश्ता टूट गया है, चाहे वह आकाश से बरसने वाला पानी हो, जमीन से रिसने वाला पानी हो, या शहर के आसपास समुद्र और खाड़ी में बहने वाला पानी हो।
सवाल यह है कि क्या पृथ्वी की सतह पर पाया जाने वाला पानी (हाइड्रोस्फीयर) हमारे शहरों की स्थिति के चर्चा का हिस्सा बनेंगे और क्या हम जांच करेंगे कि पानी के प्रवाह के रास्ते कहां खत्म हो गए हैं, कहां अवरुद्ध हैं और कहां गायब होने के लिए मजबूर हैं। क्या हम अपने पाइपों, भूजल, जलाशय, समुद्रों, बादलों तथा दलदली और आर्द भूमि में समाहित पानी को देखने में सक्षम होंगे, जो भारत के शहरी परिदृश्य के भविष्य की छवि के अभिन्न अंग हैं? (-लेखिका ड्रेक्सल विश्वविद्यालय में इतिहास और शहरी अध्ययन की एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)