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विकास के दावे की हकीकत
जयराम रमेश
Updated Fri, 02 May 2014 02:16 AM IST
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चीयरलीडर्स खेल के मैदान को ग्लैमरस बना सकती हैं, लेकिन शासन एवं अर्थव्यवस्था जैसे गंभीर क्षेत्रों में उनके लिए कोई जगह नहीं होती। लेकिन यह सामान्य तथ्य कुछ प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों पर लागू नहीं होता। ऐसे ही एक सम्मानित अर्थशास्त्री अरविंद पनगरिया चीयरलीडर की तरह काम करते हैं। आम धारणा है कि वह भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को सलाह देते रहते हैं।
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एक आर्थिक अखबार के अपने ताजा कॉलम में पनगरिया ने कथित तौर पर कांग्रेस एवं भाजपा के घोषणापत्र की तुलना की है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वह कॉलम इस बात का सुबूत है कि कैसे मोदी समर्थकों को पाखंड एवं फरेब को सच की तरह फैलाने में जरा भी पछतावा नहीं होता है। मोदी के बयानों की तरह पनगरिया का स्तंभ प्रचार के तमाम लक्षणों को दर्शाता है।
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कांग्रेस एवं भाजपा के घोषणापत्रों की तुलना करते हुए पनगरिया बताते हैं कि गरीबी, बीमारी और निरक्षरता से लड़ने के लिए कांग्रेस जहां सामाजिक खर्च को मुख्य औजार बनाती है, वहीं भाजपा का घोषणापत्र विकास के जरिये गरीबी, निरक्षरता और बीमारी को खत्म करने का वायदा करता है।
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कांग्रेस को विकास-विरोधी और पुनर्वितरण (सब्सिडी) समर्थक बताना मोदी समर्थकों की आदत बन गई है। अगर हम विकास विरोधी होते, तो यूपीए सरकार भला कैसे देश को ऐतिहासिक रूप से उच्च विकास दर दे पाती? अर्थव्यवस्था के तमाम पैमानों पर हमने पहले की सरकारों, खासकर एनडीए सरकार से बेहतर काम किया है। हमने ऐसा प्रदर्शन तब किया, जब दुनिया आर्थिक संकट के सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी।
इसके अलावा, कांग्रेस ने विकास बनाम सब्सिडी के दोहरे तर्क को दृढ़तापूर्वक खारिज किया है। हम मानते हैं कि सब्सिडी लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है। हम विकास समर्थक हैं, क्योंकि बिना उच्च आर्थिक विकास के सब्सिडी के लिए संसाधन उपलब्ध नहीं होंगे। केवल समावेशी विकास ही ठोस ढांचे के जरिये भविष्य के लिए आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सकता है। पिछले दस वर्षों में हमने भारत के तेज आर्थिक विकास के लिए आधारभूमि तैयार की है।
पनगरिया ने दावा किया है कि कांग्रेस विशाल महासागर में हरेक नाव को अलग-अलग बचाने की कोशिश कर रही है, बिना यह सोचे कि एक नाव को बचाना आसपास की अन्य नावों को नुकसान पहुंचा सकता है। वह आसानी से हमारे समाज में गहरे पैठी संरचनात्मक असमानता की अनदेखी करते हैं। जैसा कि एनडीए के भारत उदय के दिनों में देखा गया, केवल विकास और बाजार के अदृश्य हाथ को सभी नावों को बचाने की अनुमति देने से विकास का लाभ समाज के एक छोटे से वर्ग तक ही सीमित रह जाएगा। आम आदमी को उस समृद्धि में समान हिस्सा नहीं मिला, जिसे पैदा करने का उन्होंने दावा किया। समान हिस्सेदारी के बिना विकास तकलीफदेह विफलता को ही जन्म देगी। राज्य के सक्रिय हस्तक्षेप के बिना असमानता की खाई को नहीं पाटा जा सकता। सबसे बुनियादी बात यह है कि केवल विकास पर ध्यान केंद्रित करने से आर्थिक उदारीकरण और बाजार पर से आम आदमी का भरोसा उठ जाएगा।
कांग्रेस अकेली ऐसी राजनीतिक पार्टी है, जिसमें सबको साथ लेकर चलने की क्षमता है। अपने अधिकार आधारित कानूनों के जरिये हमने कतार के अंतिम व्यक्ति का ख्याल रखने की कोशिश की है। 2014 के घोषणापत्र में अधिकार आधारित नजरिये को आगे बढ़ाने की बात इसलिए की गई है, ताकि हर व्यक्ति को बराबरी का अधिकार मिले। लोगों को ज्यादा शक्ति संपन्न बनाना ही भारतीय लोकतंत्र को आगे ले जाने का एकमात्र उपाय है।
यूपीए-एक और यूपीए-दो की सरकारों ने इस दिशा में काम किया है। मनरेगा, सूचना का अधिकार और अन्य अधिकार आधारित कानून लोगों को ज्यादा अधिकार देने के लिए बनाए गए हैं। इन कानूनों ने लोगों को आवाज दी है। हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि सत्ता सबके हाथों में हो, न कि केवल चंद लोगों के हाथों में। हमारा राजनीतिक नारा 'हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की' हमारे इसी विश्वास की मिसाल है।
सत्ता का हस्तांतरण एक लंबी प्रक्रिया है और यूपीए ने दृढ़तापूर्वक कुछ केंद्रीय मुद्दों पर राज्यों को ज्यादा अधिकार देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर हमारी नीति इसका उत्तम उदाहरण है। हमने यह फैसला करने का अधिकार राज्यों के ऊपर छोड़ दिया है। केंद्र सरकार वैश्विक पूंजी का स्वागत करती है और कृषि आपूर्ति शृंखला में दक्षता बढ़ाने की व्यावहारिक समझ रखती है, पर हमने इसे लागू करने का अधिकार संबंधित राज्यों के ऊपर छोड़ दिया है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का पूरी तरह से विरोध किया है। फिर भी पनगरिया मानते हैं कि राज्य यूपीए सरकार के 'अत्याचार' के शिकार रहे हैं!
यदि भाजपा का घोषणापत्र काफी हद तक मोदी की दूरदृष्टि और अनुभव को दर्शाता है, तो यह उसी दिन क्यों जारी हुआ, जिस दिन चुनाव की शुरुआत हुई-उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के लगभग सात महीने बाद? छवि निर्माण और दृष्टिकोण प्रबंधन से ज्यादा गंभीर होता है शासन चलाना। हम जितना समझते हैं, मतदाता उससे कहीं अधिक होशियार हैं। हमने जो किया है, उसी के आधार पर निर्णय लेकर वे मतदान करेंगे।