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न तो वक्त, न ही शब्द शुगर-फ्री होते हैं!
कल्लोल चक्रवर्ती
Updated Sat, 09 Mar 2013 10:15 PM IST
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आर्थिक उदारीकरण के दो दशकों ने भारत की बाहरी तस्वीर बदली है, तो उसके अंतरंग को भी बदला है। उदारीकरण की संतानें पुरानी पीढ़ी की तरह नहीं सोचतीं। चीजों को सकारात्मक ढंग से लेने का नजरिया इन्हें सफल बनाता है। ये न इतिहास के बंधक हैं और न ही कुंठित; इस किताब के आमुख का शीर्षक ही है-प्रति व्यक्ति उम्मीद! युवा पत्रकार हिंदोल सेनगुप्त की यह किताब भूमंडलीकरण को अलग तरह से देखने का प्रयास है।
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हिंदोल या हिंडोल हमारे शास्त्रीय संगीत में एक राग है, जिसकी उत्पत्ति कल्याण थाट से मानी जाती है। बांग्ला साहित्य में एमए और शास्त्रीय संगीत की गायिका मां के लिए अपने बेटे का नाम हिंदोल रखना जितना मौलिक था, उदारीकरण के सामाजिक विश्लेषण में वैसा ही नयापन हिंदोल के लेखन में दिखता है।
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जिस किताब की भूमिका किरण कार्णिक ने लिखी है, जिसे मेघनाद देसाई 'मनमोहन (सिंह) की संतानों का वृत्तांत' बताते हैं, और जिसे सुधींद्र कुलकर्णी अपनी पांच पसंदीदा किताबों में एक मानते हैं, वह न उपन्यास है, न आत्मकथा, न उदार अर्थनीति का शोधपत्र। लेखक ने जीडीपी, जीएनपी, बजट और ब्याज दर जैसे आर्थिक सिद्धांत के उन औजारों को छुआ तक नहीं है, जिसके जिक्र भर से कुछ लोग आतंकित हो जाते हैं। इसके बजाय उन्होंने लोगों की बदलती सोच को किताब का आधार बनाया है।
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एक निम्न मध्यवर्गीय बंगाली परिवार में पैदा बच्चा अभावों के बीच अच्छी अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के लिए कोलकाता के एक अमेरिकी मिशनरी स्कूल में पढ़ाई शुरू करता है, लेकिन वहां से निकलने के बाद अपने अभिभावकों की महत्वाकांक्षाओं पर पानी फेरते हुए अंग्रेजी पत्रकारिता से जुड़ता है।
लेखक के बड़े होने की कहानी को, जिसे कोई चाहे तो आत्मकथा कह सकता है, उसके करियर से जोड़कर देखें, तो बदलता हुआ भारत दिखता है, जिसमें एक शिक्षित युवा को कपड़ों की तरह नौकरी और शहर बदलने की सुविधा है, जिसे पैसे खर्च करते हुए अपने माता-पिता की तरह सोचना नहीं पड़ता। यह पीढ़ी बचत के बारे में नहीं सोचती, क्योंकि उसका भविष्य वर्तमान से भी सुखद होने वाला है!
पाकिस्तान में लेखक की मुलाकात उन युवाओं से होती है, जो दुश्मनी की बात करने के बजाय बताते हैं कि सिगरेट से लेकर चॉकलेट और मशीनों के पुर्जों तक के मामले में पाकिस्तान भारत से श्रेष्ठ है, क्योंकि वहां सीधे अमेरिका और जर्मनी से आयातित चीजें पहुंचती हैं!
हिंदोल का अध्ययन व्यापक है और भाषा अद्भुत। निर्जीव चीजों को सजीव बनाने की कुशलता उन्हें बड़ा लेखक बनाती है। कोलकाता के कल्वर्ट को वह बेरोजगारी का प्रतीक बताते हैं, तो घरों से ड्रेसिंग टेबल, शो-केस और सोफा के गायब हो जाने को सामाजार्थिक बदलाव का सूचक। दिल्ली में विजय कुमार मल्होत्रा से वह मिलने जाते हैं, तो उनकी तरफ काजू से भरी प्लेट सरकाई जाती है, शीला दीक्षित से मुलाकात में शुगर-फ्री चाय आती है और सिंगुर पहुंचने पर धरने पर बैठी ममता बनर्जी कहती हैं, 'मेरे पास देने के लिए बस थोड़ी-सी खिचड़ी है'।
हिंदोल इसी आधार पर इन तीन नेताओं के व्यक्तित्व का खाका खींच डालते हैं। बहुत विचारोत्तेजक किताब यह बेशक न हो, लेकिन बदलते भारत की नब्ज पहचानने के लिए अनिवार्य तो है ही।