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मुद्दा: इलाज सिर्फ दवा से नहीं, भरोसे से भी होता है; इसे बचाना जरूरी
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इलाज सिर्फ दवा से नहीं, भरोसे से भी होता है
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अमर उजाला
विस्तार
आज मनाया जाने वाला डॉक्टर दिवस का दिन पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का अवसर भी है। यह डॉक्टर-मरीज के उस संबंध की याद दिलाता है, जो कभी सहज, मानवीय और गहरे विश्वास पर आधारित हुआ करता था। यह रिश्ता केवल बीमारी और इलाज के बीच नहीं बनता था, बल्कि संवाद, संवेदना और विश्वास पर टिका होता था। लेकिन, आज यही भरोसा कई जगहों पर कमजोर होता दिख रहा है।चिकित्सा विज्ञान बहुत आगे बढ़ा है, पर वह चमत्कार नहीं है। हर बीमारी ठीक नहीं होती, कई गंभीर मरीज बच नहीं पाते और हर इलाज मनचाहा परिणाम नहीं देता। ऐसे में, गुस्सा अक्सर डॉक्टर पर उतरता है। दुखद यह है कि डॉक्टरों के साथ दुर्व्यवहार, धमकी और हिंसा की घटनाएं अब असामान्य नहीं रह गई हैं। कई अस्पतालों में डॉक्टर मरीज देखने से पहले यह भी सोचते हैं कि यदि परिणाम खराब हुआ, तो क्या वह सुरक्षित रहेंगे? यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर हमला है और उस भरोसे पर चोट है, जिसके बिना कोई भी उपचार पूरा नहीं हो सकता। जब डॉक्टरों के साथ हिंसा होती है, तब वे भय में काम करते हैं। नतीजतन, गंभीर मरीजों का इलाज करने से बचते हैं और उन्हें तुरंत रेफर कर देते हैं। यह रक्षात्मक चिकित्सा अंततः मरीज और समाज, दोनों के लिए हानिकारक होती है। पर, इस समस्या को केवल डॉक्टर बनाम मरीज के रूप में देखना अधूरा होगा। समाज को समझना होगा कि डॉक्टरों के प्रति बढ़ता गुस्सा केवल व्यक्तिगत व्यवहार का परिणाम नहीं होता। उसके पीछे स्वास्थ्य व्यवस्था की कई कमजोरियां भी हैं। सरकारी अस्पतालों में भीड़ है, संसाधन सीमित हैं और डॉक्टर व नर्सों की संख्या पर्याप्त नहीं है।
वहीं, निजी अस्पतालों में इलाज महंगा होने के कारण मरीजों को लगता है कि वे बीमारी से अधिक व्यवस्था से लड़ रहे हैं। ऐसे माहौल में अविश्वास पैदा होता है। मरीज के परिजनों को लगता है कि पैसा खर्च हो रहा है, पर परिणाम नहीं मिल रहा, और डॉक्टरों को लगता है कि उनके प्रयासों को समझा नहीं जा रहा। यहीं से दूरी शुरू होती है। इस टूटते भरोसे को सोशल मीडिया ने और जटिल बना दिया है। एक वीडियो, भावनात्मक पोस्ट या तीखी टिप्पणियां मिनटों में राष्ट्रीय बहस बन जाती हैं। इसका परिणाम दोतरफा है-डॉक्टरों में भय व रक्षात्मकता बढ़ती है और मरीजों के मन में अस्पतालों के प्रति संदेह गहराता है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि डॉक्टरों और अस्पतालों से प्रश्न न पूछा जाए। चिकित्सा पेशा समाज से अलग नहीं है और उसमें भी कमियां हैं। कुछ जगहों पर संवाद की कमी है, कुछ अस्पतालों में बिलिंग पारदर्शी नहीं होती, और कहीं-कहीं व्यावसायिक दबाव भी दिखता है। इन बातों पर खुली और ईमानदार चर्चा होनी चाहिए। अच्छी चिकित्सा केवल दवा लिखने का काम नहीं है। यह मरीजों को सुनने, उन्हें समझाने और भरोसा बनाने की प्रक्रिया भी है। सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन डॉक्टरों को अपमानित करना गलत है। अस्पतालों में जवाबदेही होनी चाहिए, भय का वातावरण नहीं। डॉक्टर भी थकते हैं, तनाव में रहते हैं, रातों को जागते हैं, कठिन निर्णय लेते हैं और मरीज को खोने के बाद भीतर से टूटते भी हैं, भले ही बाहर से शांत दिखें। डॉक्टर को देवता बनाने की जरूरत नहीं है, पर उसे शत्रु बनाना समाज की भूल है।
डॉक्टर-मरीज संबंध को मानवीय बनाने की जरूरत है। इसके लिए तीन स्तरों पर काम करना होगा। पहला, सरकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत करनी होगी, ताकि पर्याप्त डॉक्टर, नर्स, बेड और जांच सुविधाएं उपलब्ध हों। दूसरा, अस्पतालों को संवाद और पारदर्शिता सुधारनी होगी, ताकि मरीज व उनके परिजनों को स्पष्ट जानकारी मिले और खर्च का अनुमान ईमानदारी से दिया जाए। तीसरा, समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी, क्योंकि बीमारी की घड़ी में धैर्य रखना कठिन जरूर है, पर भरोसा टूटने से इलाज बेहतर नहीं होता।
इलाज केवल दवा, जांच और ऑपरेशन से नहीं होता, बल्कि भरोसे से भी होता है। जब मरीज डॉक्टर पर भरोसा करता है, तो उपचार की राह आसान होती है। डॉक्टरों का वास्तविक सम्मान उन परिस्थितियों को बदलने में है, जिनमें डॉक्टर काम करते हैं और जिनमें मरीज इलाज खोजते हैं। अस्पतालों को सुरक्षित, डॉक्टरों को अधिक संवेदनशील व संवादशील, मरीजों को जागरूक तथा धैर्यवान, सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक मजबूत एवं न्यायपूर्ण तथा सोशल मीडिया को अधिक जिम्मेदार बनना होगा।