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मृदु वचन सबसे बड़ा तप है
शिवकुमार गोयल
Updated Tue, 10 Sep 2013 07:36 PM IST
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कर्नाटक में जन्मे संत बसवेश्वर भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। वह शिव को 'कूंडल संगमदेव' संबोधित कर उनकी आराधना किया करते थे।
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एक बार भ्रमण करते हुए वह एक धनाढ्य भक्त के यहां पहुंचे। वह भक्त उनके प्रति अनन्य श्रद्धा भावना रखता था। उन्होंने देखा कि भीषण गर्मी में जब कुछ व्यक्ति उससे मिलने पहुंचे, तो उसने न उन्हें बैठने को कहा और न ही उठकर उनका स्वागत किया।
जब उस भक्त ने हाथ जोड़कर संत जी से कहा, कल्याण का साधन बताने की कृपा करें, तो संत जी ने कहा, जो अपने द्वार पर आए अतिथि से विनयवत व्यवहार नहीं करता, उससे बैठने की प्रार्थना नहीं करता, उससे जल तक ग्रहण करने को नहीं कहता, उसका कल्याण नहीं हो सकता। इन चंद शब्दों में ही उन्होंने अतिथि सेवा की शिक्षा उसे दे दी।
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संत बसवेश्वर जी कहते हैं, मृदु वचन ही सर्वोच्च जप और तप हैं। भगवान कूंडल संगमदेव को कोमल और निश्छल हृदय से ही वश में किया जा सकता है। दुर्गुणों को त्यागने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा, चोरी, हिंसा, क्रोध, झूठ तथा लोभ- ये महापाप अपवित्र करते हैं। दया, करुणा भावना, विनयशीलता, सत्य और भगवत प्रेम- ये सद्गुण धारण करनेवाला व्यक्ति लोक और परलोक को कल्याणकारी बना लेता है।
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संत बसवेश्वर जी ने कन्नड़ भाषा में हजारों पदों की रचना की। ये बसकोपनिषद् नाम से जाने जाते हैं।