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शिक्षा और रोजगार बाजार के बीच खाई

Fri, 28 Dec 2018 07:38 PM IST
Raman Singh एमेरिक डेविस
एमेरिक डेविस Published by: Raman Singh Updated Fri, 28 Dec 2018 07:38 PM IST
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The Gap Between Education and India’s Labor Market
नौकरी

पिछले तीस वर्षों में भारत ने अपने नागरिकों की शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए उल्लेखनीय कार्य किया है। आंध्र प्रदेश प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम, 1984 और 1987 में राजस्थान में शिक्षाकर्मी कार्यक्रम जैसी राज्य स्तरीय नीतियों से शुरुआत करके केंद्र में 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून तक शिक्षा को लेकर विधायी और कार्यक्रम के जरिये जबर्दस्त रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है। और इसके साथ प्राथमिक स्तर पर पहुंच और प्रावधान में वास्तविक विस्तार हुआ है। शिक्षा से संबंधित जिला सूचना प्रणाली के मुताबिक, देश में सरकारी स्कूलों की संख्या काफी बढ़ी है। केंद्रीय स्तर के पहले प्रयास 'सर्व शिक्षा अभियान' के पारित होने के सोलह वर्ष बाद क्या कुछ हुआ है? उत्साहजनक रूप से समय के साथ इसमें वास्तव में सफलता मिली है। भारत में शिक्षा तक पहुंच लगभग सार्वभौमिक रूप से सुनिश्चित हुई है और लड़कियों समेत पहले से कहीं ज्यादा लोगों को शिक्षित किया जा रहा है।


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इन कार्यक्रमों ने स्कूलों का निर्माण किया है, स्कूलों में बच्चों का दाखिला बढ़ा है और वे लंबे समय तक स्कूलों में टिक रहे हैं। इसके अलावा, ऐसा लगता है कि यह रोजगार और मजदूरी भी बढ़ा रहा है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सेन डियागो के गौरव खन्ना द्वारा प्रस्तुत शोध पत्र में पाया गया है कि स्कूली शिक्षा में अतिरिक्त वर्ष की पढ़ाई का रोजगार बाजार में अच्छा लाभ मिलता है और शिक्षा के विस्तार के लिए जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम जैसी व्यापक नीतियों से उच्च कुशल से निम्न-कुशल श्रमिकों की आय का विस्तार होता है। ये सभी वास्तविक उपलब्धियां हैं, जिसका जश्न मनाना चाहिए, लेकिन यहीं पर उत्साह खत्म हो जाता है।

शिक्षण के मोर्चे पर तस्वीर उतनी गुलाबी नहीं है। साल-दर-साल 'असर' (एएसईआर) की रिपोर्ट जारी होती है, जिसमें दर्शाया गया है कि प्राथमिक स्तर पर छात्रों के सीखने का स्तर कम है और संतोषजनक नहीं है। वर्ष 2017 में असर ने प्राथमिक स्तर के बच्चों से ध्यान हटाकर चौदह से 18 वर्ष के बड़े बच्चों पर ध्यान केंद्रित किया कि वहां क्या हो रहा है। यहां भी शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर बेहतर नहीं था। इस आयु वर्ग के छात्रों में गणित और पठन क्षमता खराब थी और यह सरकार के अपने मानदंड से भी नीचे था। जबकि सरकार का अपना नेशनल एचीवमेंट सर्वे ज्यादा उत्साहजनक है। प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टुडेंट एसेसमेंट (पीसा) टेस्ट, 2009 में भारत का प्रदर्शन इतना विवादास्पद था कि भारत फिर कभी पीसा में शामिल नहीं हुआ, हालांकि भारत ने 2021 में फिर से पीसा में शामिल होने का फैसला किया है। खराब शिक्षण स्तर की यह कहानी लोगों को अच्छी तरह से पता है।

इन दो विरोधाभासी निष्कर्षों का हमें क्या करना चाहिए? एक तरफ शिक्षा की पहुंच बढ़ी है, यह रोजगार बाजार में वास्तविक लाभ दिखा रहा है और यह कम कुशल श्रमिकों को कुशल बना रहा है। दूसरी तरफ, छोटे और बड़े बच्चों की सीखने की क्षमता कम है, उसमें सुधार नहीं हो रहा है और अन्य देशों की तुलना में यह बहुत खराब है। स्कूली प्रणाली से बाहर आने और कार्यबल में प्रवेश करने वाले युवाओं के बढ़ते जनसांख्यिकीय उभार के साथ एक नई चिंता उभरने लगी है। शिक्षा व्यवस्था के वायदे गुणवत्ता के स्तर पर विफल साबित हो रहे हैं और यह उन लोगों के लिए भयानक हो सकता है, जिन्होंने दुनिया से वायदा किया है।

मेरे अपने शोध का निष्कर्ष बताता है कि जिन्होंने लंबे समय तक स्कूली शिक्षा पाई है, वे भारत के कई सार्वजनिक संस्थानों पर कम भरोसा करते हैं। मानव विकास सर्वे का इस्तेमाल करके मैंने पाया कि जिन बच्चों ने जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (डीपीईपी) के जरिये शिक्षा पाई है, और फिर घरों में रहते हैं, वे सार्वजनिक संस्थानों पर कम भरोसा करते हैं।

सबसे चिंताजनक बात है कि डीपीईपी से शिक्षा पाने वाले आज वयस्क हैं और उनकी अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं और आर्थिक आकांक्षाएं हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? आंकड़े बताते हैं कि भले ही ये लोग ज्यादा पैसे कमा रहे हैं, लेकिन ये श्रम बाजार के असंगठित और अल्पकालिक, संविदात्मक श्रम के क्षेत्र में ऐसा कर रहे हैं। जाहिर है, आकांक्षाओं और वास्तविकता के बीच की खाई ने यह नाराजगी पैदा की है।

तो भारत क्या कर सकता है? इसके दो समाधान हैं-स्कूलों को ठीक करें या स्कूल से रोजगार में प्रवेश की व्यवस्था को दुरुस्त करें। बेशक स्कूलों को ठीक करना सबसे महत्वपूर्ण है और यहां काफी कुछ किया जाना है। स्कूलों में बहुत अधिक विश्वास बनाए रखना एकमात्र उपाय नहीं है, क्योंकि इससे उन युवाओं की समस्याओं का समाधान नहीं होगा, जो रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। इससे शिक्षा व्यवस्था के प्रति उनमें और अविश्वास बढ़ता है। मगर स्कूलों को अपनी विफलताओं और बाहरी दुनिया की विफलताओं, दोनों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अब बचता है, स्कूल से रोजगार तक की व्यवस्था को दुरुस्त करना। यहां अधिकांश समाधान राज्य पर निर्भर है। सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार (सरकारी नौकरी) भारत की बढ़ती जनसंख्या के अनुसार नहीं बढ़े हैं। देवेश कपूर (सीएएसआई के निदेशक) के मुताबिक, सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार पिछले दशक में वास्तव में घटे हैं। इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार स्पष्ट रूप से जारी है। हालांकि यह रोजगार की तलाश करने वाले सभी युवाओं को समायोजित नहीं करेगा, लेकिन यह देश के कुछ सार्वजनिक प्रबंधन मुद्दों को ठीक करने के साथ-साथ कुछ लोगों को समायोजित करने में अवश्य मदद करेगा। इसके बाद सामान्य प्रशिक्षण, रोजगार बाजार में समन्वय और युवाओं को काम पर रखने के लिए नियोक्ताओं के समर्थन की आवश्यकता है। यहां मध्यम और निम्न आय वर्ग वाले देशों के लिए परिणाम उत्साहजनक हो सकते हैं।

स्पष्ट है कि युवाओं को बड़े समाज में एकीकृत करने का सवाल सार्वभौमिक है, जो भारत की तुलना में अधिक क्षेत्रों में फैला है। हालांकि समाधान शिक्षा के साथ संबद्ध नहीं है। भले ही भारत और अन्य जगहों पर शिक्षा व्यवस्था में कई खामियां हैं, लेकिन समाज के सामने सवाल यह है कि जो युवा अनिवार्य स्कूली शिक्षा पूरी कर चुके हैं, लेकिन अब तक जिन्हें काम नहीं मिला है, उन्हें कैसे एकीकृत किया जाए।

-लेखक हार्वर्ड ग्रैजुएट स्कूल ऑफ एजुकेशन में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। 

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