सुरेंद्र कुमार का कॉलम: तो क्या काबुल में अफगान सरकार का खेल खत्म हो गया?
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विस्तार
तालिबान द्वारा जिस आसानी और तेजी से अफगानिस्तान के आधे से अधिक जिलों पर कब्जा करने की बात कही जा रही है, और अपने कब्जे वाले इलाके में उसके द्वारा सख्त शरिया कानून लागू करने की बात जिस तरह सामने आई है, उन्होंने लाखों अफगान नागरिकों और खासकर महिलाओं को स्तब्ध कर दिया है। अफगानिस्तान के इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी चिंतित कर दिया है। तालिबान की इस आक्रामकता का उद्देश्य है कि गनी सरकार या तो उनकी शर्तें माने या फिर अपनी हार मानने के लिए तैयार रहे। अमेरिका और भारत से मिले प्रशिक्षण के बावजूद अफगानिस्तान का राष्ट्रीय सुरक्षा बल (एएनएसएफ) तालिबान से मुकाबला करने में सक्षम नहीं है। इसकी वजह संभवतः यह है कि अपने-अपने कबीलों के प्रति निष्ठावान होने के कारण उनमें देशभक्ति का जज्बा नहीं है। इसके अलावा, मीडिया रिपोर्टों को मानें, तो उनमें से अनेक सैनिकों को पिछले कई महीनों से वेतन नहीं मिला है। ऐसे में, जाहिर है, वे तालिबान से जंग में अपनी जान का जोखिम नहीं उठाना चाहते।
विगत 17-18 जुलाई को दोहा में सरकारी प्रतिनिधिमंडल, जिनमें पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और शांति वार्ताकार अब्दुल्ला अब्दुल्ला थे, और तालिबान के बीच मुलाकात हुई, जिनमें दोनों ही पक्षों में फिर मुलाकात और बातचीत पर सहमति बनी। उन्होंने एक साझा बयान भी जारी किया, जिसमें कहा गया कि 'दोनों पक्ष तब तक उच्च स्तरीय वार्ता जारी रखने के प्रति प्रतिबद्ध हैं, जब तक कि उनमें सहमति नहीं बनती।' बयान में पूरे अफगानिस्तान में मानवीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए काम करते रहने की बात भी कही गई। वार्ता से पहले तालिबान के सर्वोच्च नेता ने कहा था कि 'इस्लामी अमीरात दृढ़ता के साथ राजनीतिक सहमति के पक्ष में है।' उससे पहले तालिबान के प्रवक्ता ने भी कहा था कि 'समस्या के समाधान के लिए दूसरे पक्ष के पास इच्छाशक्ति होनी चाहिए', लेकिन अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लेने वाले तालिबान के शुरुआती आश्वासन पर अब संदेह होता है।
अमेरिका और नाटो के हवाई समर्थन के बगैर एएनएसएफ लंबे समय तक मुकाबले में टिका नहीं रह सकता। कुछ विशेषज्ञों का तो मानना है कि गनी सरकार अगले छह से बारह महीनों में गिर जाएगी। अल कायदा का कहना है कि उसके एक से दो हजार लड़ाके अफगानिस्तान में हैं। गनी सरकार का आरोप है कि पाकिस्तान ने तालिबान की मदद करने के लिए अपने 11,000 आतंकवादी और लड़ाके भेजे हैं, लेकिन इमरान सरकार ने इसका खंडन किया है। इस्लामाबाद स्थित अफगान राजदूत की बेटी का कुछ घंटों के लिए कथित अपहरण और उसके साथ किए गए अत्याचार के बाद दोनों देशों के रिश्ते और खराब हो गए हैं। पाकिस्तान ने आदतन भारत को निशाना बनाते हुए उस अपहरण के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की है। अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से बाहर निकलने से पैदा शून्य को भरने के लिए रूस और चीन तत्पर हैं। मध्य एशियाई गणतंत्रों को आतंकवाद से सुरक्षित रखने तथा नशे का कारोबार रोकने के लिए रूस ने तीन देशों की बैठक बुलाई है, जिसमें चीन और पाकिस्तान भी हैं। इसमें भारत को शामिल न करने के बारे में उसका तर्क है कि भारत का तालिबान पर कोई असर नहीं है।
अफगानिस्तान में चीन की दिलचस्पी के कई कारण हैं, जैसे कि अपने शिंझियांग प्रांत को कट्टर इस्लाम से बचाना, अफगानिस्तान के समृद्ध खनिज पदार्थों के दोहन की लालसा और काबुल को अपनी बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव में शामिल करना। अपना पुराना विरोध छोड़कर शिया ईरान भी सुन्नी तालिबान के साथ खड़ा हो गया है, ताकि अफगानिस्तान में अपनी धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव बरकरार रखा जा सके। चीन, रूस और ईरान का साथ न पाने वाले भारत के पास अमेरिकी रणनीति का समर्थन करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, ताकि गनी सरकार को गिरने से बचाया जा सके, तालिबान के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखते हुए अफगानिस्तान में इस्लामी सरकार बनाने की उसकी मंशा विफल की जा सके, अल कायदा, आईएस और दूसरे आतंकी समूहों को आने से रोका जा सके, अफगान धरती से भारत पर होने वाले हमलों को रोका जा सके, अफगानिस्तान के गृहयुद्ध को भीषण होने से रोका जा सके और अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों समेत मानवाधिकार संरक्षण की सतत मांग की जा सके। पर अफगानिस्तान में एलायड फोर्सेज के पूर्व कमांडर जनरल डेविड पेतारस कहते हैं, 'मुझे डर है कि सैन्य वापसी के फैसले से अफगानिस्तान में शुरू हुआ गृहयुद्ध भीषण रूप लेगा, जिससे लाखों लोग विस्थापित होंगे।'
तो क्या काबुल में अफगान सरकार का खेल खत्म हो गया है? लेकिन बहुत कुछ इस पर भी निर्भर करेगा कि अफगानिस्तान में बीस साल बर्बाद करने और अपने 2,800 सैनिकों को गंवाने के बाद अमेरिका वहां अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए क्या करता है। जमीन पर लड़ाई लड़े बगैर भी अमेरिका के पास तालिबान को रोकने की क्षमता है। अगर बाइडन अफगान मुद्दा हल करने की इच्छाशक्ति दिखाते हैं, तो वह इतिहास में एक ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर जाने जाएंगे, जिन्होंने अपने सैनिकों को वापस बुलाकर भी अफगानिस्तान को गृहयुद्ध से बचा लिया और बाहरी कंधार में ताजा सैन्य हमले में तीन तालिबान लड़ाकों का मारा जाना अमेरिकी रणनीति के बारे में ही बताता है।
तालिबान ने भले इस हमले को दोहा समझौते का उल्लंघन बताया हो, पर इसके संदेश बहुत साफ हैं कि अमेरिका ने अफगान सरकार को मंझधार में नहीं छोड़ा है और तालिबान की आक्रामकता को चुनौती दी जा सकती है। आम अफगान महिलाओं के लिए संदेश यह है कि अफगानिस्तान में पहले जैसा तालिबान का दौर नहीं लौट रहा, तो पाकिस्तान को भी बताया जा रहा है कि पड़ोस में अपनी अनुकूल स्थिति पर वह इतनी खुशियां न मनाए। तालिबान पर अमेरिका का दबाव भी बिल्कुल साफ दिख रहा है। इतना ही नहीं, काबुल में नई सरकार बनाने से पहले अशरफ गनी को हटाने के तालिबान के इरादे को भी अमेरिका ने यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि वह गनी का समर्थन करता है। साफ है कि अफगानिस्तान में खेल अभी खत्म नहीं हुआ है।