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इंतहा हो गई इंतजार की
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बजट
भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा पेश किए गए पांच बजट कैसे रहे? 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर चिंताएं अधूरे कार्यों की कहानियां दर्शाती हैं। कृषि संकट, मध्यवर्ग की नाराजगी और आगामी चुनाव सरकार को परेशान करने वाले हैं। इस बजट में चर्चा बड़ी रियायतों को लेकर हो रही है। पर पैसा कहां हैं और बजट में बड़ी-बड़ी घोषणाओं के लिए भुगतान कौन करेगा?
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2019 में किसानों को मनाने की जरूरत है। कृषि संकट नई बात नहीं है। ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति आय शहरी भारत के मुकाबले 50 फीसदी से भी कम है। भारत की प्रति व्यक्ति आय औसतन 1,12,835 रुपये है-78 फीसदी ग्रामीण आबादी वाले उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय इसके आधे से भी कम है और बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का एक तिहाई है। इसकी मूल वजह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, मुख्यतः कृषि की उपेक्षा है।
वर्षों से राजनीतिक दलों ने कृषि के साथ दान-पुण्य जैसा व्यवहार किया है। जबकि जरूरत बाजार और कर्ज तक पहुंच की आजादी देने की है। ई-नैम और अमूल-2 जैसी संस्थाएं मददगार हो सकती हैं, पर सरकारी ढांचा कमजोर है-जल्दी खराब होने वाले खाद्य पदार्थों का उत्पादन करने वाले किसानों से वर्गीकरण/नमी के स्तर को प्रमाणीकृत करने की अपेक्षा की जाती है। अनुबंध खेती खाई को पाट सकती है, पर 2017 के बजट में जिस अनुबंध खेती का वायदा किया गया था, उसका मॉडल कानून अभी तक राज्यों ने अपनाया नहीं है। बेरोजगारी पर बहस होती है, पर न तो राज्य सरकारें और न ही केंद्र सरकार बता पा रही हैं कि सरकारी विभागों में बीस लाख से ज्यादा पद क्यों खाली हैं। सिर्फ केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में 4.12 लाख पद रिक्त हैं। मई, 2016 में शहरी विकास मंत्रालय ने राज्यों को 3,784 जनगणना शहरों को शहरी स्थानीय निकायों में बदलने के लिए कहा। इसमें कम से कम दो लाख रोजगार सृजित करने की क्षमता थी, पर राज्यों ने अभी तक ऐसा किया नहीं है। 2014 के घोषणापत्र में ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने का लक्ष्य सूचीबद्ध था। बजट 2017 में पंचायतों को कैडर निर्माण में सक्षम बनाने के लिए एक कार्यक्रम का वायदा किया गया था। प्राथमिकता क्या होनी चाहिए, इस पर नीति बनाने का कार्य अभी चल ही रहा है।
विकास बढ़ाने और व्यय प्रबंधन नीतियों को विस्तार देने के अवसर छूट गए हैं-विशेष रूप से अपव्यय को कम करने के, जो विकास और रोजगार को बढ़ावा देने के लिए संसाधनों को मुक्त करता। 2014-15 का बजट कहता है कि 'सरकार न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन के सिद्धांत के लिए प्रतिबद्ध है।' इसके लिए रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता में व्यय प्रबंधन आयोग का गठन किया गया। इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। 2016 में संसद को बताया गया कि पंद्रह शीर्षकों के साथ सुझाए गए ईएमसी की सिफारिशों को संबंधित मंत्रालयों एवं विभागों के साथ जरूरी कार्रवाई के लिए साझा किया गया है। बचत की तस्वीर अस्पष्ट है। यह अजीब बात है कि सरकार ने जालान के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि रिजर्व बैंक अपने भंडार से सरकार को कितना धन हस्तांतरित कर सकता है।
बीमार और घाटे में चलने वाले सार्वजनिक उपक्रम कर्ज और घाटे में वृद्धि कर रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की स्थिति एयर इंडिया और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से बेहतर ढंग से समझी जा सकती है-सभी सरकारी बैंकों का कुल बाजार मूल्य 4.83 लाख करोड़ रुपये है, जबकि एचडीएफसी बैंक का 5.69 लाख करोड़ रुपये है। 2015-16 का बजट घाटे में चल रही इकाइयों में विनिवेश और कुछ रणनीतिक विनिवेश का वायदा करता है। 2017 में रणनीतिक विनिवेश के लिए 24 इकाइयों को सूचीबद्ध किया गया, पर केवल एचपीसीएल का रणनीतिक विनिवेश हुआ। इस बीच 82 केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम घाटे में चल रहे हैं। केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का कुल घाटा 2007-08 से 2016-17 के बीच 2,23,859 करोड़ रुपये है।
प्रतिकूल कर प्रशासन के कारण भी पैसा फंसा हुआ है। भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान यूपीए पर कर आतंकवाद का आरोप लगाया और उसमें बदलाव लाने का वायदा किया था। अपने वायदे के मद्देनजर 2015-16 के बजट में सरकार ने 'बेहतर और गैर-प्रतिकूल कर प्रशासन' का वायदा किया। 2014-15 में चार लाख करोड़ से अधिक की कर मांगें विवाद में थीं। लंबित मामलों की संख्या 4.69 लाख से अधिक है। 2018 के बजट के अनुसार 7.38 लाख करोड़ रुपये की राशि अटकी पड़ी है-इस साल जितने कर की अपेक्षा थी, यह लगभग उसका आधा है।
शहरीकरण विकास को गति देता है। 2014 के चुनाव का सबसे आकर्षक पहलू सौ स्मार्ट सिटी का वायदा था। 2014-15 का बजट कहता है कि प्रधानमंत्री का सौ स्मार्ट सिटी विकसित करने का दृष्टिकोण है और इसके लिए 7,060 करोड़ रुपये का प्रारंभिक आवंटन किया गया। नए शहरों के वायदों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया और स्मार्ट सिटी के विचार पर अमल को दबा दिया गया। संसदीय स्थायी समिति ने जुलाई, 2018 में पाया कि प्रमुख योजनाओं के क्रियान्वयन में स्मार्ट सिटी योजना सबसे न्यूनतम स्तर 1.83% फीसदी पर था, यानी जारी किए गए 9,943.22 करोड़ रुपये में से 182.62 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। ताजा आंकड़े बताते हैं कि 10,504 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, पर प्रमाणित उपयोग मात्र 931 करोड़ रुपये का ही हुआ।
राजकोषीय घाटे में सुधार के लिए सरकार की काफी प्रशंसा हुई है। पर विभिन्न क्षेत्रों में एक खामोश संकट है-जैसे, बुनियादी ढांचे के ठेकेदारों, बिजली उत्पादकों, किफायती आवासों के लिए मदद जैसे सरकारी भुगतान चुकाने बाकी हैं। सरकारी खर्चे का लेखा-जोखा एफसीआई के खाते में ही बंद है। तरलता की चुनौती न चुका पाने की स्थिति में ले जाती है और खराब कर्ज गलत रणनीति का नतीजा होते हैं। सवाल यह नहीं कि दूसरी सरकारों ने क्या किया, बल्कि यह है कि क्या अस्थायी रणनीति स्थायी रणनीति को भ्रमित करती है। सरकार की दुविधा यह है कि वह गरीब समर्थक दिखना चाहती है, पर फिजूलखर्ची भी नहीं कर रही। पिछले पांच साल में की गई गलतियों का ही नतीजा है कि वह उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही।