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आतंक का खात्मा ही समाधान है
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मरिआना बाबर
जब भी मैं बालाकोट के बारे में सोचती हूं, तब मुझे उस भयानक भूकंप की याद आती है, जो आठ अक्तूबर, 2005 को दोनों ओर के कश्मीर और खैबर पख्तुनख्वा में आया था। उस भूकंप में 80,000 से अधिक लोग मारे गए थे और उसमें बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचा था। उस भूकंप का केंद्र बालाकोट से 10 किलोमीटर दूर पूर्व में और मुजफ्फराबाद से 19 किलोमीटर दूर पूर्वोत्तर में था। मुझे यह भी याद है कि उस भूकंप से बालाकोट में इतने लोग मारे गए थे कि लाशों को पहनाने के लिए कफन कम पड़ गए थे। दो साल पहले छुट्टी के एक दिन मैं कार से बालाकोट से गुजर रही थी, तो मैंने देखा कि वहां एक नया शहर बस गया है और एक भी पुराना घर नहीं है।
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कुछ दिन पहले 26 फरवरी को बालाकोट के लोग जल्दी ही जग गए, क्योंकि उन्होंने धमाकों की आवाज सुनी थी और उनके घर की खिड़कियां और दरवाजे हिलने लगे थे। बहुत लोगों ने इसे एक और भूकंप समझा। बाद में दिन निकलने पर जब वे बाहर निकले, तब उन्हें यह बात पता चली कि भारतीय जंगी जहाजों ने वहां बम गिराए थे। भारत सरकार ने वहां चल रहे जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेनिंग कैंप को जमींदोज करने का दावा किया। जैश से जुड़ी कुछ चीजें सोशल मीडिया में आई हैं, जिनमें कहा गया है कि वह मदरसा ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होता था।
जंगी जहाज और बम धमाकों के इस शोर में पाकिस्तान में आतंकियों के ट्रेनिंग लेने का मुद्दा पीछे छूटता महसूस हो रहा है। आज जंग जैसे जो हालात पैदा हुए हैं, उसकी असल वजह क्या है? इसकी वजह पाकिस्तान में जेहादियों और तालिबान जैसे नॉन स्टेट ऐक्टर्स की मौजूदगी है, जो पाकिस्तान के साथ-साथ उन देशों के लिए भी खतरा हैं, जहां वे आतंकी हमलों को अंजाम देते हैं। इस सिलसिले में भारत की संसद को निशाना बनाने की कोशिश के अलावा कारगिल, मुंबई, पठानकोट और पिछले दिनों पुलवामा में हुए हमले को याद किया जा सकता है, जिसकी जिम्मेदारी जैश ने ली।
मुझे याद है कि जब मुंबई में पाक जेहादियों ने आतंकी हमला किया था और मुंबई गुस्से से उबल रही थी, तब पाकिस्तान में उसका कोई असर नहीं दिख रहा था। लेकिन समय बीतने के बाद यह महसूस हुआ कि मुंबई के लोगों में पाकिस्तानियों के प्रति कितना गुस्सा है। यह बात मुझे पाकिस्तान में पूर्व भारतीय उच्चायुक्त टीसीए राघवन ने बताई थी कि उस हमले के बाद मुंबई के लोग कितने गुस्से में थे। चूंकि आतंकियों ने यह कार्रवाई दूसरे देश में की थी और पाकिस्तानियों को वह दुख झेलना नहीं पड़ा, इसलिए उसे वे बहुत जल्दी भूल गए। अलबत्ता पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल में हुए भयानक आतंकी हमले को पाकिस्तान नहीं भूल सकता, जिसमें पाक तालिबान ने सैकड़ों स्कूली बच्चों और उनके शिक्षकों को निशाना बनाया था। वह हमला पाकिस्तानियों के लिए तमाम नॉन स्टेट ऐक्टर्स से निजात पाने का एक सबक होना चाहिए था।
यह अच्छी बात है कि दुनिया के देशों ने जहां भारत और पाकिस्तान से तनाव कम करने के लिए कहा है, वहीं वे पाकिस्तान को आतंक के तमाम ढांचों को खत्म करने की भी याद दिला रहे हैं। मेरा मानना है कि भारत के सामने बातचीत की पेशकश करने के अलावा पाकिस्तान को अपने यहां चल रहे तमाम आतंकी कैंपों को नेस्तनाबूद करने जैसा ठोस और संजीदा कदम उठाना चाहिए और जेहादियों को रोकना चाहिए। इमरान खान को पाकिस्तान में आतंक का प्रसार रोकना चाहिए, तो इसलिए नहीं कि भारत और दूसरे देश इसकी मांग कर रहे हैं। उन्हें आतंकवाद पर इसलिए लगाम लगानी चाहिए कि यह पाकिस्तान और उसके लोगों के लिए अच्छा नहीं है।