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नए पड़ोसियों का आना
निर्मल गुप्त
Updated Tue, 29 Sep 2015 07:53 PM IST
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यह आकाशवाणी नहीं है। खबर ऊपर से आई है, इसलिए सच ही होगी। वैसे हमें नहीं पता कि सोलहवीं मंजिल पर एकाकी रहने वाली बूढ़ी महिला के घुटनों का दर्द आजकल कैसा है। लिफ्ट खराब हो जाने पर वह नीचे फिजियो के पास कैसे जाती होंगी? हम अपने पड़ोसियों की जिंदगी में उसूलन नहीं झांका करते। अच्छे-भले पड़ोसी ऐसे ही होते हैं।
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लेकिन कंफर्म सूचना है कि फेसबुक, टि्वटर, गूगल नाम के हमारे नए पड़ोसी बन गए हैं। ये ब्रह्मांड के किस माले पर रहते हैं, यह नहीं पता, पर हमारी कामनाओं के कबाड़खाने में इनका आवास है। इनके घर के द्वार हमेशा खुले रहते हैं। ये किसी से पड़ोसी धर्म निभाने की उम्मीद नहीं रखते। इनके पास आने-जाने के लिए औपचारिकता की कोई जरूरत नहीं।
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फेसबुक है, तो समझो सब कुछ है। बगल वाले फ्लैट में रहने वाले मंगतू का पूरा नाम भले न पता हो, पर बनाना रिपब्लिक की किसी गली-कूंचे में रहने वाली मार्गरीटा के पालतू कुत्ते के बारे में हमें ठीक से पता है। गांव में रह रही मां के दमे का इलाज भले ही न करा पाते हों, पर झुमरीतलैया के ओल्डएज होम में रहने वाला कब खांसता है, हमें मालूम रहता है। सेल्फी ने तो इन नए पड़ोसियों के सहकार से जिंदगी को नयनाभिराम बना दिया है।
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ट्विटर ने कमाल ही कर दिया, सुनसान जीवन को चहचहाहट से भर दिया। रोज की घरेलू चिक-चिक को ट्वीट में तब्दील कर दिया। पति से बात-बात पर रूठने वाली पत्नियों के अचूक हथियार की धार कुंद हो गई है। पत्नी ट्वीट करती है, ऐसा कब तक चलेगा? पति का ट्वीट आता है, जब तक ट्विटर एकाउंट हैक नहीं होता। ट्विटर ने सारे पेचीदा मसले को एक सौ चालीस कैरेक्टर में समेट दिया है।
वाट्सऐप पर कॉपी-पेस्ट वाली शेरो-शायरी के जरिये बड़े से बड़ा झूठ बेहद मासूमियत के साथ बोल, सुन और देख लिया जाता है। गूगल की ओट में तमाम मूर्खताएं बड़े मजे से सिर छिपा लेती हैं। ये नए पड़ोसी क्या आए, जिंदगी बेहद आसान और ग्लोबल हो गई है।