महाराष्ट्र की बदलती सियासत
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मुंबई सहित राज्य की दस महानगरपालिका व 25 जिला परिषद चुनाव में केंद्र व राज्य में सत्तासीन भाजपा ने लंबी छलांग लगाई है। शहरी व अभिजनों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा को साल 2014 के लोकसभा चुनाव व विधानसभा चुनाव में मिली सफलता कुछ लोगों को अपवाद या अपघात लगती थी। वहीं, दिसंबर महीने में हुए नगरपालिका चुनाव में मिली सफलता को महानगरपालिका चुनाव तक सीमित माना जा रहा था। इससे लगता था कि जिला परिषद चुनाव में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के बीच मुख्य मुकाबला होगा। लेकिन, इस अनुमान को झूठ साबित करते हुए भाजपा ने न सिर्फ महानगरपालिका में, बल्कि जिला परिषद चुनाव में भी जीत के सिलसिले को जारी रखा है। ठाणे महानगरपालिका एकमात्र अपवाद रही। शेष नौ महानगरपालिका में भाजपा ने विजय पताका फहराई है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में भाजपा ने शिवसेना के समानांतर सीट हासिल कर शिवसेना को बैकफुट पर ला दिया है।
नोटबंदी के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था चौपट होने, आर्थिक मंदी के चलते बढ़ती बेरोजगारी, आरक्षण की मांग पूरी न करने से मराठा, धनगर (गड़रिया) समाज की नाराजगी, खेती उपज की घटी दर जैसे अनेक मुद्दे थे, जिससे ऐसा लगता था कि चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। परंतु, ऐसे सभी अनुमानों को गलत साबित करते हुए भाजपा ने जो सफलता प्राप्त की है, उससे सभी राजनीतिक दल भौंचक्के रह गए है। मुंबई और आसपास में शिवसेना से भाजपा की कड़ी लड़ाई हुई, जिससे दोनों ही पार्टियों को लाभ मिला। अमूमन, यह माना जाता है कि दो की लड़ाई में तीसरे की जीत होती है, पर यहां दो की लड़ाई में तीसरे का सत्यानाश हो गया। चुनाव में जंग की स्थिति और फिर मिलकर सत्ता की मलाई खाने का खेल पहले विधानसभा चुनाव और फिर कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका चुनाव में सफल रहा। क्या यह शिवसेना-भाजपा के बीच सही मायने में अनबन की लड़ाई थी या फिर विपक्ष की जगह हथियाने के लिए नूरा-कुश्ती हुई? यह खेल ज्यादा दिनों तक चल पाना मुश्किल है। हालांकि आज यह खेल सफल रहा है। महाराष्ट्र के दिग्गज इस राजनीति के सभी संदर्भ और बदले मापदंड के अर्थ निकालने में व्यस्त हैं।
भाजपा की पहचान 'पार्टी विथ डिफरेंस' की रही है। लेकिन 2014 के बाद भाजपा की राजनीतिक शैली पूरी तरह बदल गई है। चुनाव जीतने की क्षमता को प्रमुखता दी जा रही है। भाजपा ने दलबदलू और विवादित पृष्ठभूमि के लोगों के लिए न केवल अपने दरवाजे खोल दिए हैं, बल्कि उन्हें निष्ठावान पार्टी नेताओं के आगे लाकर खड़ा कर दिया है। इससे चुनाव में भाजपा पर काफी टिप्पणी हुई। पार्टी के पुराने लोग नाराज हुए। परंतु मीडिया की टीका-टिप्पणी की परवाह किए बिना भाजपा ने 'एंटी सोशल इंजीनियरिंग' जारी रखी। चुनाव में साम, दाम, दंड, भेद सभी में कुशल उम्मीदवारों का चयन किया गया। उल्हासनगर में विवादित पप्पू कालानी के साथ गठबंधन हुआ। राजनीति में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति के खिलाफ हंगामा करने वाली पार्टी में आपराधिक व विवादित छवि के लोगों को शामिल करने के विरोध के बीच कहा जाने लगा था कि भाजपा को यह दांव उल्टा पड़ेगा। लेकिन आज पार्टी को इसका लाभ मिलता दिखाई दे रहा है। शायद देवेंद्र फडणवीस की 'क्लीन इमेज' के सामने ये सारी चीजें फीकी पड़ गई हैं।
ब्राह्मण-बनिया की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा ने बीते कई वर्षों में प्रयत्न कर अपना चेहरा बदला है। दिवंगत गोपीनाथ मुंडे ने ग्रामीण क्षेत्र से लेकर समाज के सभी घटक तक पार्टी का विस्तार किया। उनके निधन के बाद भाजपा पर एक बार फिर अपने मूल स्वरूप में लौट आने का आरोप लगाते हुए कुछ लोग पार्टी से दूर हुए। कुछ लोग खुद चले गए, तो कुछ लोगों को बाहर फेंक दिया गया। इससे तर्क लगाया जाने लगा था कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा। लेकिन भाजपा ने शिवसेना से गठबंधन तोड़कर अपने दम पर विधानसभा चुनाव लड़ने का जुआ खेला और बाजी मारी।
दस में से आठ महापालिका की सत्ता भाजपा के हाथ में आ गई है। बीएमसी में दोनों ही दलों ने महापौर पद पर दावा कर जादुई आंकड़ा जुटाने का प्रयास शुरू किया है। एनसीपी के नौ और मनसे के सात पार्षदों की भूमिका पर लोगों की निगाहें हैं। मनसे ने चुनाव से पहले शिवसेना के साथ मित्रता का हाथ बढ़ाया था, लेकिन शिवसेना ने झटक दिया। इस बदली परिस्थिति में मनसे भाजपा को समर्थन देकर शिवसेना से बदला लेगी या फिर लंबी राजनीति का विचार कर शिवसेना को समर्थन देगी, इस पर भी लोगों की नजर है। एनसीपी ने हालांकि भाजपा को समर्थन नहीं देने का निश्चय किया है, तो फिर क्या शिवसेना को समर्थन करेगी? यह अहम सवाल है। वहीं, कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति का विचार करते हुए तटस्थ रहना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में निर्दलियों को अपने पाले में कर महापौर का चुनाव जीतने का अवसर दोनों दलों के पास है। परंतु यदि भाजपा ने तोड़फोड़ कर बीएमसी में 20 साल से सत्तासीन शिवसेना को हटाने की कोशिश की, तो इसका असर राज्य सरकार पर पड़ेगा और शिवसेना फडणवीस सरकार से बाहर हो सकती है। ऐसे में भाजपा शायद ही इतना बड़ा खतरा मोल लेगी। संभावना यही है कि दोनों दल एक साथ आएंगे और सत्ता में भागीदार होंगे।
ग्रामीण क्षेत्र की अनेक समस्याओं और सरकार के प्रति नाराजगी के बावजूद भाजपा-शिवसेना को मिला जनादेश बड़बोले कांग्रेस-एनसीपी नेताओं के लिए कड़ा संदेश है। कांग्रेस और एनसीपी को अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए विश्वसनीयता बहाल करनी होगी और यह आशावाद त्यागना पड़ेगा कि दुर्घटनावश आई भाजपा की सरकार खुद चली जाएगी। साल दर साल सत्ता के आदी कांग्रेसजनों को जनता के लिए धूप में पसीना बहाने की आदत डालनी पड़ेगी। यही, चुनाव नतीजों का संदेश है।