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गुरु द्रोण की किताब
मनु पंवार
Updated Mon, 07 Sep 2015 08:54 PM IST
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शिक्षक दिवस के बाद कल गुरु द्रोणाचार्य मेरे सपने में आए। वैसे स्पष्ट कर दूं कि मेरा द्रोणाचार्य जी के गुरुकुल से कभी कोई वास्ता नहीं रहा है। हो सकता है कि नेटवर्क की गड़बड़ी की वजह से वह मेरे सपने में आ गए हों। द्रोणाचार्य ने जीवन में एक बड़ी गलती की थी। उन्होंने एकलव्य से अंगूठा मांग लिया था।
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मैंने द्रोणाचार्य से कहा, गुरुवर, होना यह चाहिए था कि पांडवों को कोचिंग देने के बाद आप किताब लिखते कि किसके इशारे पर आपने एक होनहार दलित बालक एकलव्य के साथ ऐसी साजिश की? इस पर बवंडर खड़ा हो जाता। दलित उत्पीड़न का मामला बनता। आपकी किताब की भारी डिमांड होती। न्यूज चैनलों और अखबारों में आप छाए रहते। उम्र भर रॉयल्टी को पेंशन की तरह खाते। फिर आप मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति के नायक होते।
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गुरु द्रोण ने कहा, पर मुझे तो राजकुमारों को अस्त्रविद्या सिखाने के लिए रखा गया था।
तब भी आप उन राजकुमारों की कुछ जानकारियां अपनी किताब में एक्सक्लूसिव के तौर पर तो डाल सकते थे। मसलन, आप की किताब में होता, भीम यों तो महाबली हैं, पर उनकी फिटनेस सही नहीं है। अर्जुन बहुत अहंकारी और ईर्ष्यालु हैं। नकुल-सहदेव को अपनी पर्सनैलिटी पर गुरूर है। युधिष्ठिर यों तो बड़े विद्वान और सत्यवादी हैं, पर अकेले सशरीर स्वर्ग कैसे चले गए, इसकी जांच होनी चाहिए। आपकी किताब हाथोंहाथ बिक जाती। अभी जब सरकारें शिक्षकों की योग्यता पर सवाल कर रही हैं, तब आपके साहस की दाद दी जाती कि गुरु द्रोण ने दिग्गज राजकुमारों की कमजोर कड़ियों को उघाड़ने का साहस किया था।
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देखो, मुझे राजनीति का ज्ञान नहीं है, पर शिक्षकों की योग्यता इस पर भी निर्भर करती है कि सत्ता उन्हें कितनी स्वतंत्रता देती है। तुम लोग महाभारत पर सीरियल बनाते हो, और धृतराष्ट्र और दुर्योधन को न जाने क्या-क्या बता जाते हो। लेकिन तुम्हारे सत्ताधीश क्या उस दौर के कलुष और षड्यंत्र से निकल पाए हैं?
मेरी आंखें खुल गईं। गुरु द्रोण का अता-पता नहीं था।