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सैन्य प्रमुख के मन की बात

Mon, 22 Jan 2018 09:27 AM IST
हर्ष कक्कड़
हर्ष कक्कड़ Updated Mon, 22 Jan 2018 09:27 AM IST
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The army chief has spoken
बिपिन रावत

सेना दिवस से पहले सेना प्रमुख ने मीडिया के सामने अपने विचार व्यक्त किए थे। उन्होंने कई मुद्दों पर अपनी बात रखी, जिसमें दोकलम विवाद से निपटने से लेकर भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए सेना को तैयार करने, पाकिस्तान की नापाक हरकतों से निपटने, कश्मीर में युवाओं की मानसिकता को प्रभावित करने में शिक्षा के असर से लेकर सैन्य कार्रवाई के दौरान शहीद या विकलांग जवानों के परिजनों के शिक्षा-भत्ते में कटौती का सरकार का फैसला शामिल था। उनकी कुछ टिप्पणियों की आलोचना हुई है। शिक्षा-भत्ते में कटौती के सरकार के फैसले के बचाव में दिए गए बयान से जहां पूर्व सैनिकों का वर्ग हैरान है, वहीं जम्मू-कश्मीर सरकार ने युवाओं की मानसिकता बदलने के लिए राज्य की शिक्षा प्रणाली पर दिए गए उनके बयान की कड़ी आलोचना की है। ऐसे ही, पाक सेना ने उनके उस बयान को चुनौती दी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि सेना को सीमा पार कर पाकिस्तान जाने का आदेश दिया जाता है, तो वह पाकिस्तान के परमाणु झांसे से डरेगी नहीं।


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सेना प्रमुख ने अपने मन की बात कही है, और जो भी उन्होंने कहा है, उसका पालन करेंगे। अपनी टिप्पणी के पक्ष में उनके पास मजबूत तर्क थे, क्योंकि वह जानते थे कि एक संस्थान के रूप में वह राष्ट्र के सामने सेना का दृष्टिकोण रख रहे हैं। वह बिल्कुल सही थे, जब उन्होंने कहा कि 'बेशक चीन मजबूत हो सकता है, मगर भारत भी कमजोर नहीं है।' दोकलम गतिरोध के दौरान भारत चीन के सामने डटकर खड़ा रहा और उसने सभी दबावों का सामना किया। भारत ने चीन की प्रतिकूल और धमकी वाली टिप्पणियों की अनदेखी करते हुए शांति और सम्मानपूर्वक मामले को निपटाया। विदेश मंत्रालय को समन्वय एजेंसी बनाने का सरकार का निर्णय उत्कृष्ट था, जिसने उसे संकट को सुलझाने में सक्षम बनाया। कमजोर संचार साधनों के बावजूद इसने चीनी घुसपैठ से राष्ट्र को बचाया। जब चीन ने सीमा की तरफ बढ़ना शुरू किया, तब भारतीय जवान भी सक्रिय हुए। इस क्षेत्र के राष्ट्रों द्वारा चीन की गोद में बैठने को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति उनकी चिंता वाजिब है, क्योंकि इससे खतरे की आशंका बढ़ती है। इससे सरकार की ‘पड़ोसी पहले’ की रणनीति की समीक्षा की भी जरूरत महसूस होती है, जो लड़खड़ाती दिखती है।

भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की भड़काऊ कार्रवाई का सख्ती से जवाब दिया है, जबकि घाटी में आतंकवाद-विरोधी अभियान उसने बढ़ाए हैं। भारतीय सेना के सीमापार हमलों पर पाकिस्तान ने सावधानी बरती, उसने न तो इसे स्वीकार किया और न ही हताहतों की संख्या घोषित की। हाल की रिपोर्टों में कहा गया है कि पाकिस्तान में भारत के आंकड़े से तीन से चार गुना ज्यादा लोग हताहत हुए और इसने आईएसआई को परेशान किया। सेनाध्यक्ष ने साफ-साफ कहा कि हम किसी दूसरे राष्ट्र से यह अपेक्षा नहीं करते कि वह हमारी तरफ से लड़ेगा। अपने खतरों से निपटने में हमें खुद सक्षम होना चाहिए। उन्होंने हाल ही में पाकिस्तान को दी गई अमेरिकी धमकी का जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान पर अमेरिकी दबाव के बावजूद पाकिस्तान की भारत-विरोधी नीति में बदलाव नहीं होगा। इसलिए हमें आधुनिक तकनीक के हथियार शामिल करने और गोलबारी की क्षमता व निरीक्षण की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।

सैनिकों के लिए जरूरी है कि वे हर स्तर पर निगरानी रखें। वे सूचनाओं के प्रभाव पर निर्भर नहीं रह सकते, खासकर तब, जब उनके पास प्रौद्योगिकी उपलब्ध है। हर सैनिक को इतना सक्षम बनाना चाहिए कि वह नतीजा दे सके। अगर विभिन्न साधनों से सूचनाएं प्राप्त की जा सकती हैं, तो सुरक्षा बलों को लंबी दूरी के बेहतर बंदूकों और संलग्नता की क्षमता की जरूरत होती है। युद्ध के दौरान गोला-बारूद को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए बेहतर परिवहन साधन चाहिए। सैनिकों को खुद भी शत्रुओं के हमले से सुरक्षा की जरूरत है, इसलिए उनके लिए बेहतर बुलेट प्रूफ उपकरण चाहिए। उन्होंने कहा कि अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए हमारे लिए ये चीजें अनिवार्य हैं।

दशकों से कश्मीर में सेना की संलग्नता रही है। किशोरावस्था से ही वहां बच्चों को सिखाया जाता है कि वे भारत का हिस्सा नहीं हैं और कश्मीर एक स्वतंत्र राज्य है। इस सोच का असर युवा मन पर पड़ता है, जो दीर्घकाल में हानिकारक है। इसलिए उन्होंने अपना सुझाव दिया, जो कश्मीर में सैन्य ढांचे से निकला था। इस सुझाव पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि राज्य धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौटे। उन्होंने आतंकवाद से छुटकारा पाने के लिए इस साल उत्तर कश्मीर पर ध्यान केंद्रित करने की योजना की घोषणा की। सेना की हालिया सफलता ने सरकार को राज्य के लिए एक वार्ताकार नियुक्त करने और फिर से नियंत्रण पाने में सफल बनाया है।

हालांकि शहीद या विकलांग सैन्य कर्मियों के परिजनों के शिक्षा-भत्ते में कटौती के सरकार के फैसले के समर्थन पर पूर्व सैनिकों की तरफ से सबसे ज्यादा आलोचना हुई। सोशल मीडिया पर प्रतिकूल टिप्पणियां की गईं। अधिकाश लोगों ने उनकी इस बात पर गौर नहीं किया, जिसमें उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों ने इस मुद्दे पर सरकार से अपील की है। वे इस समय दुरुपयोग की विसंगतियों का पता लगाने के लिए नीति की समीक्षा कर रहे हैं। जब तक इस पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, कटौती कायम रहेगी।

सैन्य शहीदों और विकलांग पूर्व सैनिकों के बच्चों के लिए स्कूल खोलने की घोषणा स्वागतयोग्य है, क्योंकि यह समग्र विकास के लिए बेहतर सुविधाएं देने के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराएगा। भारत की बढ़ती सैन्य शक्ति और उसके सैनिकों के पेशेवर रवैये को दुनिया भर में मान्यता मिल रही है। सैन्य प्रमुख ने सेना के विचारों और जरूरतों पर अपने मन की बात कही। यह सत्ता में बैठे लोगों का कर्तव्य है कि वे राष्ट्र हित में उनके शब्दों और विचारों को ध्यान में रखें और उनका सम्मान करें।

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