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ट्रंप का टैरिफ और चिली का तांबा: कनाडा से भारत और ब्राजील से चीन तक झनझना गए बाजार... पुराने दिन लौट सकते हैं

Sun, 20 Jul 2025 06:28 AM IST
Anshuman Tiwari अंशुमान तिवारी
Updated Sun, 20 Jul 2025 06:28 AM IST
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सार
ट्रंप के टैरिफ का कहर तांबे पर टूट पड़ा है। अमेरिका में तांबे की आपूर्ति पर 50 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी लगेगी। चिली दुनिया का सबसे बड़ा तांबा उत्पादक है, जो विश्व को करीब 28 फीसदी तांबे की आपूर्ति करता है। तांबे की कीमतों में उतार-चढ़ाव चिली की सियासत को हिला देता है, क्योंकि चिली ‘बॉर्न विद कॉपर स्पून’ है। तांबे पर टैरिफ बढ़ने से कनाडा से भारत तक और ब्राजील से चीन तक पूरा तांबा बाजार झनझना गया। अब अमेरिका में तांबा महंगा हो गया है और शेष दुनिया में सस्ता। इससे सर्वाधिक नुकसान चिली को होगा, जिसकी अर्थव्यवस्था की धड़कन तांबा है। तांबे को लेकर अमेरिका बनाम चिली के वे पुराने दिन कभी भी लौट सकते हैं।
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tariff of Trump and copper in Chile Canada to India Brazil to China Markets shaken competition days may return
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एआई

विस्तार

यह काम केवल राजनेता ही कर सकते हैं कि जब आप सबसे ज्यादा भूखे हों, तब वे रोटी पर टैक्स लगा दें। कॉपर यानी तांबे के साथ यही  हुआ है। इलेक्ट्रिक वाहनों और नई बिजली आपूर्ति ग्रिड के लिए तांबे की मांग से तप रही दुनिया पर ट्रंप के टैरिफ फट पड़े। अमेरिका में तांबे की आपूर्ति पर 50 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी लगेगी।



कनाडा से भारत तक और ब्राजील से चीन तक पूरा तांबा बाजार झनझना गया। अब अमेरिका में कॉपर महंगा हो गया है और शेष दुनिया में सस्ता, क्योंकि जब तांबा अमेरिका में नहीं जाएगा, तो अन्य देशों में पहुंचेगा। इससे सबसे ज्यादा झटका किसे लगा? चिली को, दुनिया का सबसे बड़ा तांबा उत्पादक, विश्व का करीब 28 फीसदी कॉपर यहीं से आता है। कॉपर की कीमतों में उतार-चढ़ाव चिली की सियासत को हिला देता है, क्योंकि चिली ‘बॉर्न विद कॉपर स्पून’ है।


आइए, बैठिए टाइम मशीन में, चलते हैं चिली, यह देखने कि कॉपर ने किस तरह देश की सियासत को उलट-पलट दिया। टाइम मशीन हमें अटाकामा रेगिस्तान के ऊपर ले जा रही है। यह दुनिया का सबसे सूखा मरुस्थल है, जो 15 करोड़ साल पुराना है। साल में 15 मिलीमीटर बारिश भी यहां चमत्कार है। एक तरफ एंडीज की हिमाच्छादित चोटियां, दूसरी ओर ठंडा प्रशांत महासागर। लेकिन जरा नीचे तो देखिए...यह है चुक्कीकमाटा। दुनिया की सबसे बड़ी खुली तांबा खदान। 4.3 किमी लंबी, 3 किमी चौड़ी और 3,000 फीट गहरी। यह चिली की अर्थव्यवस्था की धड़कन है। टाइम मशीन की घड़ी बता रही है कि हम 1952 में पहुंच गए हैं। चुक्कीकमाटा की विशाल खदान चमक रही है, लेकिन मजदूरों का जीवन अंधेरे में है। अमेरिकी कंपनी अनाकोंडा माइनिंग खदान की मालिक है। खदान के पास मजदूरों का शहर है-मकान, स्कूल, सॉकर मैदान, लेकिन मजदूरों की दशा अच्छी नहीं है। उस युवा को देख रहे हैं आप, जो मोटरसाइकिल पर सवार है? सही पहचाना आपने... यह चे ग्वेरा हैं, जो अपनी मोटरसाइकिल डायरीज के लिए दक्षिण अमेरिका की यात्रा में चुक्कीकमाटा आए हैं। 24 साल का यह युवा डॉक्टर मजदूरों से मिल रहा है। उसे पता चलता है कि अनाकोंडा न्यूनतम वेतन देने से इन्कार करती है, जबकि कंपनी लाखों डॉलर कमा रही है। चे अपनी डायरी में लिखते हैं : ‘यह तांबा चिली का खून है, पर इसकी चमक विदेशी जेबों में जा रही है।’ याद रखिएगा कि चुक्कीकमाटा में चे ग्वेरा की यह यात्रा क्यूबा क्रांति की प्रेरणा बनेगी।

अरे उधर तो देखिए...कौन है वहां? हां...वह पाब्लो नेरुदा ही हैं। उनकी एक कविता चर्चा में है। नोबेल पुरस्कार के लिए उनकी मंजिल अभी दूर है, पर उनके साहित्य की बुनियाद चुक्कीकमाटा में रखी गई है। लोग बात कर रहे हैं कि कुछ वक्त पहले नेरुदा यहां आए थे, उन्होंने एक रात मजदूरों के साथ बिताई। उन्हें एक बच्चे की कहानी मिली है, जो खदान की धूल से बीमार था। नेरुदा की कविता नाइट इन चुक्कीकमाटा अनाकोंडा को ‘हरी राक्षसी’ कहती है। उनकी पंक्तियां गूंजती हैं :

In the clustered heights, beneath the moon of hardness-excavator-you open the mineral’s lunar craters.
 

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एआई

चे और नेरुदा की आवाजें मजदूर आंदोलनों को हवा देती हैं। हड़तालें शुरू होती हैं। चुक्कीकमाटा में अनाकोंडा के खिलाफ नारे गूंज रहे हैं। टाइम मशीन के कोआिर्डनेट्स बता रहे हैं कि अब हम 1966 में हैं। चुक्कीकमाटा सियासत के केंद्र में है। राष्ट्रपति एडुआर्डो फ्रे मोंतालवा ने तांबा खदानों का राष्ट्रीयकरण शुरू कर दिया है। कॉपर कॉरपोरेशन ऑफ चिली (कोडेल्को) का गठन होता है। चुक्कीकमाटा का आंशिक राष्ट्रीयकरण हो रहा है, मगर चिली के लोग पूछ रहे हैं कि अगर खदानें चिली की हैं, तो फिर अमेरिकी कंपनियों को हिस्सा क्यों मिल रहा है?

आप भी महसूस कर रहे हैं न आंदोलन की तपिश...महिलाएं आवाज लगा रही हैं, ‘तांबा चिली का है, न कि अनाकोंडा का।’ मजदूरों की हड़तालें तेज हो रही हैं। चुक्कीकमाटा राष्ट्रीयकरण की मांग का प्रतीक बन रही है।
अब हम 1970 में आ गए हैं। सैंटियागो में उतरिए। यहां बड़ी गहमा-गहमी है। सल्वाडोर अलांदे ‘चिलियनाइजेशन ऑफ कॉपर’ के नारे पर चुनाव जीत गए हैं। उनका वादा है पूर्ण राष्ट्रीयकरण। चुक्कीकमाटा पर अनाकोंडा का कब्जा समाप्त होने का एलान हो गया है। सरकारी कंपनी कोडेल्को खदान की मालिक है। सड़कों पर जश्न है। मजदूर कह रहे हैं, ‘यह तांबा हमारा है, हमारी धरती का खजाना।’

लेकिन अमेरिका नाराज है। अनाकोंडा का दावा है कि राष्ट्रीयकरण से उसे 50 करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ। व्हाइट हाउस में सियासी साजिशें शुरू होती हैं। चुक्कीकमाटा की यह जीत चिली और अमेरिका के रिश्तों को खराब कर रही है। अब हम चिली के एक काले दौर की ओर बढ़ रहे हैं। मशीन की घड़ी बता रही है कि यह 1973 का साल है। चुक्कीकमाटा खतरे में है। अगस्तो पिनोचे ने सत्ता हथिया ली है। सल्वाडोर अलांदे का तख्तापलट हो गया है। नेरुदा की कविताएं प्रतिबंधित हो गई हैं। चुक्कीकमाटा का मजदूर शहर उजाड़ दिया जाता है, क्योंकि खदान का विस्तार इसे निगल रहा है। मजदूरों को कालमा शहर में बसाया जाता है। पिनोचे तांबे की खदानों का निजीकरण नहीं करते। कोडेल्को चुक्कीकमाटा को चलाता रहता है, क्योंकि तांबा चिली की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

टाइम मशीन की घड़ी और आपके मोबाइल की घड़ी का समय अब एक हो गया है। हम 2025 में ट्रंप के युग में लौट रहे हैं। चुक्कीकमाटा की खदान आज भी चिली की धड़कन है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के 50 फीसदी तांबा टैरिफ ने नया संकट खड़ा कर दिया है। तांबे की कीमतें वैश्विक बाजार में गिर रही हैं, क्योंकि अमेरिका अब चिली का तांबा कम खरीदता है।

चिली की अर्थव्यवस्था, जो तांबे पर 40 फीसदी निर्भर है, डगमगा रही है। टाइम मशीन सैंटियागो में विश्राम करेगी। आप तांबे के भविष्य पर नजर रखिए। क्या तांबे की गिरती कीमतें चिली को मंदी में धकेलेंगी? कीमतों में 20 फीसदी की गिरावट से चिली की जीडीपी में दो से तीन फीसदी की कमी आ सकती है। तांबे को लेकर अमेरिका बनाम चिली के वे पुराने दिन कभी भी लौट सकते हैं। फिर मिलते हैं, अगले सफर पर...

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