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बुद्ध को निशाना बनाने वाले
विजय क्रांति
Updated Mon, 08 Jul 2013 09:19 PM IST
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रविवार की सुबह बोधगया के महाबोधि मंदिर परिसर में जो आतंकी धमाके हुए, वह एक चौंकाने वाली घटना है। इसे चौंकाने वाली घटना इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि कुछ ही दिन पहले अंतरराष्ट्रीय पत्रिका टाइम ने एक कवर स्टोरी छापी थी-द फेस ऑफ बुद्धिस्ट टेरर। उस लेख में म्यांमार के एक बौद्ध भिक्षु का चित्र देकर उन्हें को मुसलमानों के खिलाफ आतंकी चेहरा बताया गया था।
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उस उत्तेजक लेख में यह बताने की कोशिश की गई थी कि बौद्ध धर्म इस्लाम के खिलाफ है। वह लेख पढ़ते ही लगा था कि पश्चिम के कुछ रणनीतिककार बौद्ध धर्म एवं इस्लाम को एक दूसरे के आमने-सामने करने की कोशिश कर रहे हैं।
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दरअसल पश्चिम जगत में इस्लाम और ईसाई संप्रदायों के बीच लंबे समय से एक धार्मिक विवाद चल रहा है। पश्चिमी देश इस्लाम के नाम पर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वाले संगठनों को कमजोर करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना रहे हैं और उन्हें अन्य धर्मों के साथ विवाद में उलझाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि ईसाइयत के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले इन संगठनों की ताकत बंट जाए। इस हमले से लगता है कि इस्लामी आतंकी संगठन अपने विरोधियों की इस चतुर चाल को समझने में नाकाम रहे हैं और वे बौद्ध स्थल पर हमला कर बैठे हैं।
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अब तक की जांच के आधार पर हमारी सुरक्षा एजेंसियों ने इसके पीछे इंडियन मुजाहिदीन पर संदेह जताया है। इंडियन मुजाहिदीन इस्लामी आतंकवाद का घरेलू चेहरा है। कुछ लोग इस घटना को म्यांमार में मुस्लिमों के खिलाफ हुए अत्याचार की घटनाओं से जोड़कर देख रहे हैं। अगर इस आतंकी हमले को वाकई में म्यांमार की घटना के जवाब में अंजाम दिया गया है, तो मैं समझता हूं कि इससे बड़ी मूर्खता और कोई नहीं हो सकती। म्यांमार में मुस्लिमों एवं बौद्धों के बीच जो विवाद चल रहा है, उसके स्थानीय सामाजिक एवं आर्थिक कारण रहे हैं। उसके पीछे धार्मिक कारण उतने जिम्मेदार नहीं हैं, जितने सामाजिक व आर्थिक कारण। वहां की घटना से न तो हमारे देश के बौद्धों का कोई लेना-देना है और न ही दुनिया भर के बौद्ध संप्रदाय का। ऐसे में अगर कोई इस्लामी आतंकी संगठन म्यांमार की घटना का बदला भारत में लेना चाहता है, तो यह उसका आत्मघाती उतावलापन ही कहा जाएगा।
अगर महाबोधि मंदिर पर हमला करके इंडियन मुजाहिदीन या कोई अन्य इस्लामी आतंकी संगठन विभिन्न देशों में मुसलमानों पर हो रहे हमले के प्रति दुनिया का ध्यान आकर्षित करना चाहता है, तो इससे उसका उद्देश्य पूरा नहीं होता। उलटे उन संगठनों के प्रति जिन थोड़े से लोगों को यदि कोई हमदर्दी रही भी होगी, तो वे भी इस शर्मनाक एवं कायरतापूर्ण घटना के बाद उनके विरोधी बन जाएंगे। इससे पहले अफगानिस्तान में तालिबान ने बामियान में बुद्ध की प्रतिमा को बम से उड़ा दिया था, जिसकी दुनिया भर में भारी निंदा हुई थी। उस घटना के बाद भी बौद्ध समुदाय के लोग हिंसक नहीं हुए थे। लेकिन आतंकी संगठनों को फिर भी समझ में नहीं आया कि इस शांतिप्रिय समुदाय के सबसे पवित्र तीर्थ एवं प्रतीक स्थल पर हमले का कोई औचित्य नहीं है।
इस हमले से मुझे लगता है कि आतंकियों ने चीन के शिनजियांग प्रांत में आजादी की लड़ाई लड़ रहे मुस्लिम उइगुरों की लड़ाई को भी कमजोर करने का काम किया है। आज चीन जिसे अपना शिनजियांग प्रांत बता रहा है, उसका नाम पहले ईस्ट तुर्किस्तान था। वर्ष 1949 में चीन ने उस पर कब्जा जमा लिया और उसे नाम दिया, शिनजियांग, जिसका मतलब होता है-नया क्षेत्र। उसके दो वर्ष बाद चीन ने तिब्बत पर कब्जा जमाया। तिब्बत की आजादी की लड़ाई का नेतृत्व चूंकि दलाई लामा कर रहे थे, इसलिए वह संघर्ष शांतिपूर्ण चल रहा है, लेकिन चीन के औपनिवेशिक विस्तारवादी नीति के खिलाफ उइगुरों का आंदोलन हिंसक रहा है। उइगुरों के उस आंदोलन को पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देशों का समर्थन हासिल है। इस तरह के हमले शिनजियांग में चीन की दादागीरी एवं सरकारी हिंसा को और प्रोत्साहित करेंगे।
भले ही इस आतंकी घटना में दो बौद्ध भिक्षुओं के घायल होने के अलावा कोई बहुत बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन इसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा है। यह हमला एक ऐसे संप्रदाय के पवित्र तीर्थस्थल पर किया गया है, जो सदियों से दुनिया भर में शांति, अहिंसा, सत्य और करुणा का संदेश देता रहा है। इस्लाम धर्म में आस्था रखने वालों के लिए मक्का का जो महत्व है, वही महत्व दुनिया भर के बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए बोधगया का है। महाबोधि मंदिर बौद्धों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है, जहां करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध ने पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त किया था। यहां श्रीलंका, चीन, जापान एवं दुनिया भर के बौद्ध अनुयायी दर्शन के लिए आते हैं।
ज्यादातर इस्लामी आतंकी संगठन आत्मघाती हमला करते हैं, लेकिन लगता है कि महाबोधि मंदिर पर हमला करके उन्होंने अपनी विश्वसनीयता के लिए ही आत्मघाती कदम उठाया है। इस्लामी आतंकी संगठनों का नेतृत्व आम मुसलमानों के लिए भी परेशानी का सबब बन रहा है। इस्लाम के नाम पर वे जिस तरह से आतंकी घटनाओं को अंजाम देते हैं, उससे आम मुसलमानों के लिए परेशानी खड़ी होती है। इसलिए हमारे देश के आम मुस्लिम समाज को ऐसे आतंकी संगठनों से सावधान रहना चाहिए और धर्म के नाम पर उन्हें किसी भी तरह का समर्थन या मदद देने से परहेज करना चाहिए। इसके अलावा यह हमारे देश की सुरक्षा एवं जांच एजेंसियों के लिए भी एक सबक है कि वे सुरक्षा के मसले पर कोई कोताही न करते हुए अतिरिक्त सावधानी बरतें और अपने देश के किसी भी स्थल को दूसरे देशों के विवादों का रणक्षेत्र न बनने दें।